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पीएम दावुतोगलु का इस्तीफा तुर्की में लोकतंत्र के लिए है खतरे की घंटी

अलीशा माथुर | Updated on: 9 May 2016, 8:05 IST

तुर्की में लोकतंत्र धीरे धीरे कोमा में जा रहा है. देश के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोगान पूरी तरह देश की सत्ता को अपने हाथों में ले लेना चाहते हैं.

गुरुवार को तुर्की के प्रधानमंत्री अहमद दावुतोगलु ने 22 मई को पद छोड़ने की घोषणा कर दी. माना जा रहा है कि उन्हें ये इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया है क्योंकि एर्दोगान के साथ उनके तीखे मतभेद उभर आए थे.

एर्दोगान तुर्की के संविधान में आमूलचूल बदलाव करना चाहते हैं. जिसके बाद राष्ट्रपति की शक्ति खतरनाक स्तर तक बढ़ जाएगी.

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छह मई को एर्दोगान ने साफ कर दिया कि तुर्की संसदीय व्यवस्था को राष्ट्रपति प्रणाली में बदलने का उनका इरादा बदला नहीं है. अगर ऐसा होता है तो देश की सत्ता की बागडोर अकेले एर्दोगान के हाथों में होगी.

तुर्की में 2010 से संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने को लेकर बहस जारी है. एर्दोगान के ताजा संदेश को इस बाबत अब तक का सबसे स्पष्ट संदेश माना जा रहा है.

दावुतोगलु के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही एर्दोगान के साथ उनके मतभेद उभरने लगे थे

एर्दोगान ये बदलाव संसदीय तरीके से लाना चाहते हैं. इसके लिए 550 सदस्यों वाली तुर्की संसद में उन्हें 330 सासंदों के समर्थन की जरूरत होगी.

2003 में एर्दोगान ने शासन चलाने के लिए अपनी जो टीम बनाई थी दावुतोगलु उसके अहम सदस्य थे. अकादमिक जगत से जुड़े दावुतोगलु को उन्होंने पहले अपना विदेश नीति सलाहकार बनाया. 2009 में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. 2014 में दावुतोगलु को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. इसके बाद से ही दोनों के बीच मतभेद उभरने लगे.

एर्दोगान जब प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति बने तो दावुतोगलु को उनका स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना गया. हालांकि उसके बाद भी सत्ता की कमान एर्दोगान के हाथों में ही थी.

दोनों के बीच पहला मतभेद तब हुआ जब दावुतोगलु ने एर्दोगान परिवार और उसके करीबी राजनीतिक सहयोगियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के निराकरण के लिए एक भ्रष्टाचार निरोधक प्रस्ताव दिया. एर्दोगान ने इसे जल्दबाजी बताते हुए रद्द कर दिया.

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दावतोगलु तुर्की के कुर्दिश अल्पसंख्यकों के संग युद्ध को लेकर भी ज्यादा उत्साहित नहीं थे. कुर्दिश लड़ाकों ने पिछले साल ही विद्रोह किया था.

उसके बाद दोनों के बीच आतंकवाद-निरोधक कानून को लेकर मतभेद हो गए. देवुतोगुल ने उन सैकड़ों अकादमिशियनों का समर्थन किया  जिन्हें एर्दोगान की कुर्दिश नीति के विरोध के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था.

दावुतोगलु का यूरोपीय यूनियन के साथ शरणार्थियों से जुड़ा समझौता करने की कोशिश दोनों के संबंधों की ताबूत का आखिरी कील बनी. इस प्रस्ताव के तहत तुर्की ग्रीस से अपने शरणार्थियों को बुलाने पर राजी था. बदले में उसे छह अरब डॉलर की आर्थिक मदद और तुर्कों को यूरोप की वीज़ा-मुक्त यात्रा की सुविधा मिलती.

मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने 1923 में आधुनिक और लोकतांत्रिक तुर्की की नींव रखी थी

एर्दोगान इस समझौते को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं थे. जबकि दावुतोगलु की टीम इसमें पूरी तरह लगी हुई थी.
 
इस समझौते के लिए तुर्की को अपनी नीतियों में कई बदलाव करने होते. जिनमें आतंकवाद-निरोधक कानून के मनमाने प्रयोग पर रोक भी शामिल था. इसके बदले तुर्कों को यूरोप जाने के लिए वीज़ा नहीं लेना पड़ता. अगर ऐसा होता तो इसे तुर्क युवाओं में जबरदस्त लोकप्रियता मिल सकती थी.

बुधवार को यूरोपीय कमीशन ने तुर्कों को वीज़ा-मुक्त यूरोप यात्रा का अधिकार देने की अनुशंसा की. अगले ही दिन एर्दोगान ने तुर्की के आतंकवाद-निरोधक कानून में कोई भी बदलाव करने से इनकार कर दिया. जिससे मामला खटाई में पड़ गया.

लोकतंत्र पर खतरा


पिछले कुछ साल से एर्दोगान तानाशाह की तरह बरताव करते रहे हैं. उन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शनों को निर्ममता से कुचला, पत्रकारों को गिरफ्तार करके उनपर मुकदमा चलवाया और ट्विटर तथा यूट्यूब जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों पर पाबंदी लगाई.

न्यू यॉर्कर के पश्चिम एशिया संवाददाता डेक्सटर फिलकिंग ने मार्च में अपने एक लेख में लिखा था, "अगर एर्दोगान अब तक तानाशाह नहीं बन चुके हैं तो, वो तानाशाह बनने की राह पर तेजी से बढ़ रहे हैं."

तुर्की को एक समय पश्चिम एशिया का सबसे आधुनिक और लोकतांत्रिक देश माना जाता था. मुस्तफा कमाल अतातुर्क (तुर्की के राष्ट्रपिता) के नेतृत्व में तुर्की में 1923 में आधुनिक लोकतंत्र की स्थापना की थी. अब ऐसा लग रहा है कि एर्दोगान को तुर्की के इतिहास में लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए याद किया जाएगा.

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First published: 9 May 2016, 8:05 IST
 
अलीशा माथुर @almatharu

Born in Bihar, raised in Delhi and schooled in Dehradun, Aleesha writes on a range of subjects and worked at The Indian Express before joining Catch as a sub-editor. When not at work you can find her glued to the TV, trying to clear a backlog of shows, or reading her Kindle. Raised on a diet of rock 'n' roll, she's hit occasionally by wanderlust. After an eight-year stint at Welham Girls' School, Delhi University turned out to be an exercise in youthful rebellion before she finally trudged her way to J-school and got the best all-round student award. Now she takes each day as it comes, but isn't an eternal optimist.

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