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100 दिनों में हुआ था 8 लाख लोगों का क़त्लेआम, लाखों औरतों का अपहरण कर बनाया सेक्स-स्लेव

कैच ब्यूरो | Updated on: 9 April 2019, 13:10 IST

जब इंसान ही इंसानियत की दुश्मन बन जाए और वहां की सरकार उसे कत्लेआम को प्रेरित करे तो उसका फल भीषण नरसंहार के रूप में सामने अाता है. ऐसा ही एक सुनियोजित नरसंहार 1990 के दशक में हुआ जिसमें 8 लाख से अधिक लोगों को बेहद निर्मम तरीके से मारा गया और लाखों औरतों का अपहरण कर उन्हें सेक्स-स्लैब बनाकर रखा गया. लोगों ने दूसरे समुदाय से आने वाले अपने पड़ोसी, रिश्तेदारों और यहां तक कि अपनी पत्नियों की धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी.

यह सामूहिक वध पूर्वी अफ्रीका स्थित देश रवांडा में हुआ. यहां तुत्सी और हूतू समुदायों के बीच हुए भयानक जनसंहार जिसे तुत्सी के खिलाफ नरसंहार के रूप में भी जाना जाता है, इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया.

 

नरसंहार के कारण

रवांडा की कुल आबादी में हूतू समुदाय का हिस्सा 85 प्रतिशत है लेकिन लंबे समय से तुत्सी अल्पसंख्यकों का देश पर दबदबा रहा था. 6 अप्रैल 1994 की रात रवांडा के तत्कालीन राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और पड़ोसी बुरुंडी के राष्ट्रपति केपरियल नतारयामिरा को ले जा रहे विमान को किगाली, रवांडा में गिराया गया था. इसमें सवार सभी लोग मारे गए ये दोनों नेता हूतू समुदाय से आते थे.

ये जहाज किसने गिराया था, इसका पुख्ता सबूत आज तक नहीं मिल पाया है. कुछ लोग इसके लिए हूतू चरमपंथियों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं (ताकि नरसंहार का बहाना मिल सके) जबकि कुछ लोग तुत्सी समर्थित रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) को.

तुत्सी समर्थित रवांडा पैट्रिएक फ्रंट को जिम्मेदार बता हूतू कट्टरवादियों ने अगले दिन 7 अप्रैल को कत्लेआम शुरू कर दिया और अगले 100 दिनों तक यानि 15 जुलाई 1994 तक अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों की नृशंश हत्या की गई.

रेडियो से हुआ एलान- तिलचट्टों को साफ करो

हूतू चरमपंथियों ने 'आरटीएलएम' नाम का एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया था, इससे चरमपंथियों को निर्देश देते हुए घोषणा की गई कि ''तिलचट्टों को साफ़ करो'' यानि तुत्सी समुदाय के लोगों को मारो. इस जननरसंहार से पहले बेहद गोपनीय तरीके से चरमपंथियों को हुतु बहुमत सरकार की आलोचना करने वालों के नामों की लिस्ट दी गई. 100 दिन की अवधि के दौरान हुतु बहुमत सरकार के लोगों ने निर्देश दिया था. किया गया था.

हूतू समुदाय से जुड़े लोगों ने अपने तुत्सी समुदाय के पड़ोसियों और रिश्तेदारों को मार डाला. यही नहीं, कुछ हूतू युवाओं ने अपनी पत्नियों को सिर्फ़ इसलिए मार डाला क्योंकि अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता.

पहचानपत्र देखकर ली जान

उस समय रवांडा के प्रत्येक व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था, इसलिए चरमपंथियों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी, और अपनी जान बचाकर भाग रहे तुत्सी लोगों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई.

ऐसे रुका नरसंहार

युगांडा सेना समर्थित, आरपीएफ़ अब सुव्यवस्थित होकर अपने लोगों को बचाने रवांडा लौटने लगे और धीरे-धीरे अधिक से अधिक इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया. 4 जुलाई 1994 को इसके लड़ाके राजधानी किगाली में प्रवेश कर गए. उसके बाद 15 जुलाई को ये ख़त्म हुआ. कई रिपोर्ट्स के अनुसार बदले की कार्रवाई में आरपीएफ़ ने भी लाखों हूतू लोगों की हत्या दी जिसके बाद उन्हें रवांडा छोड़कर भागना पड़ा. और सत्ता पर तुत्सी का कब्ज़ा हो गया.

First published: 9 April 2019, 13:10 IST
 
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