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सऊदी अरब हमलाः क्या अब आईएस के खिलाफ इस्लामिक एकता देखने को मिलेगी?

विवेक काटजू | Updated on: 8 July 2016, 7:18 IST
(एएफपी)

इस्लामिक साल का पवित्र रमजान महीना, इस साल खासतौर पर बर्बर और हिंसक रहा. तुर्की से लेकर बांग्लादेश, सऊदी अरब, अफगानिस्तान तक फिदायीन ने हमले किए और बड़ी संख्या में निर्दोष और असहाय लोग मारे गए. विडंबना यह कि ये सभी इस्लामिक मुल्क हैं और यह कृत्य इस्लाम के नाम पर ही किया गया, वह भी इस्लामिक कलेंडर के रमजान माह में, जब हरेक मुसलमान आत्मविश्लेषण, आत्मशुद्धि में तल्लीन रहता है और दीनी कामों में लगा रहता है.

4 जुलाई को सऊदी अरब में तीन अलग-अलग जगह हमले हुए. जेद्दाह में अमरीकी दूतावास और पूर्वी शहर अल-कातिफ (जहां शिया समुदाय के लोगों की बहुसंख्यक आबादी है) में शिया मस्जिद को निशाना बनाया गया. तीसरा हमला इस्लाम के पवित्र स्थलों में से एक मदीना में पैगंबर की मस्जिद के बाहर हुआ. 

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मक्का के बाद सभी मुसलमानों के लिए यह दूसरी सबसे पवित्र जगह है. मदीना में हुए हमले का प्रभाव व्यापक रूप से विश्व के सभी मुसलमानों पर पड़ा है क्योंकि यह मस्जिद मोहम्मद साहब से जुड़ी हुई है. सौभाग्य से हमलवार मस्जिद के भीतर तक नहीं पहुंच पाए वरना सभी इस्लामिक समुदायों में गहरी अशांति फैल जाती.

हमले की जिम्मेदारी का दावा

इस्लामिक देशों में रमजान माह में हुए ज्यादातर हमलों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली है. अभी यह साबित नहीं हो सका है कि ये दावे सच हैं या केवल प्रचार पाने के लिए किए गए हैं. निश्चित रूप से सऊदी अरब में शिया बहुसंख्यक इलाकों को आईएस लगातार निशाना बनाता रहा है. ऐसे में जेद्दाह और अल-कातिफ के हमलों को आश्चर्य की नजर से नहीं देखा जा सकता. 

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हालांकि मदीना पर हुआ हमला एक अलग तरह का है जिससे पूरे इस्लामिक समुदाय में चिन्ता व्याप्त हो गई है. फिर भी यह यह संभावना जताई जा रही है कि यह उसी का काम है. यदि यह तय हो जाता है तो यह उसकी इस्लामी सोच की चरमसीमा है. इससे तो लाखों मुसलमानों में घृणास्पद तरीके से आईएस के प्रति तिरस्कार की भावना उत्पन्न होनी चाहिए.

आईएसआईएस और सऊदी अरब का संबंध

कई विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब की भूमिका शुरुआती दौर से इराकी सुन्नी संगठनों का समर्थन करने की रही है जिससे आईएसआईएस का आकार बढ़ा. अबू बकर अल-बगदादी ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया और अरबी प्रायद्वीप की रॉयल फैमिली पर आरोप मढ़ दिया. 

ऐसा होने पर भी जब एक बार खिलाफत बढ़ गई तो सऊदी आधिकारिक रूप से आईएस को निजी फंड से उपकृत नहीं कर सकते. अभी भी यही माना जाता है कि आईएस को धन सऊदी से ही. यहां ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि मदीना हमले के तुरंत बाद ही ईरान के विदेश मंत्री जरीफ ने इस्लामिक एकता का आह्वान कर डाला.

यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि इससे सऊदी और ईरान के रिश्तों में गर्माहट आएगी. ऐसे हालात होना अभी दूर की कौड़ी है.

आईएसआईएस पर दबाव

आईएसआईएस काफी दबाव में है. उसका खजाना भी कम होता जा रहा है विशेषकर तेल की बिक्री से. महत्वपूर्ण तो यह है कि तुर्की इसमें बदलाव लाता दिखता है. देश का जो नजरिया हैं उससे आईएस को अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिलती है. इसे बदलने की जरूरत है. 

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ज्यादा महत्वपूर्ण तो यह है कि आज सोशल मीडिया का जमाना है. इसकी वैश्विक पहुंच से कुछ मुस्लिम युवा इसके जाल में फंसकर हिंसा को अपना लेते हैं. अंतरराष्ट्रीय सहयोग से इसे नेस्तनाबूद किए जाने की जरूरत है जिसका अभी तक अभाव रहा है. अब समय आ गया है कि सभी देश और समाज विशेषकर इस्लामिक संसार इस मुद्दे पर विचार करे, चिंतन करें कि क्या हो रहा है.

इस मुद्दे पर लेखक के विचार

आम तौर पर इस्लामी दुनिया और कुछ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय में इस तरह की हरकतों को लेकर गहरी अशांति दिखाई देती है. हालांकि उनकी वेदना और दुख के और कई कारण हैं. कई मामलों में तो कई कारणों से उन्हें भुला दिया जाता है. 

इन्हीं सब अपरिहार्य कारणों से उनमें न सिर्फ गैर-मुस्लिमों के प्रति हिंसक प्रवृत्ति भड़कती है बल्कि उनके खिलाफ भी, जो मुसलमान हैं लेकिन उनके समूह को धर्म से बाहर का समझा जाता है.  

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इस तरह की भावनाएं सबसे पहले युवाओं के बीच फैलती हैं, बाद में यही विचार उनके हिंसा करने के औजार बन जाते हैं. भावनाओं से खेलने वाले इन धार्मिक संगठनों के साथ ही राज्यों और अक्सर दोनों के प्रतीकात्मक संबंध का यह गठजोड़ बन जाता है.

ऐसा ही इराक और सीरिया, अफगानिस्तान और तुर्की के बाद अब बांग्लादेश में हुआ है. यह मूर्खता अक्सर अक्षम्य होती है जैसे कि अमरीका का इराक पर धावा बोलना. उससे काफी लोग प्रभावित हुए. अब जरूरत है इस्लाम के पूर्व का गौरव लौटाने की. यही सब मूल कारक और पहलू रमजान में हिंसा के कारण बने हैं.

First published: 8 July 2016, 7:18 IST
 
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