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मालदीव में सउदी अरब की घुसपैठ भारत के पड़ोस में वहाबी प्रभाव और कट्टरता लाएगा

बिनो के जॉन | Updated on: 7 March 2017, 1:22 IST

विमान से जाएं, तो मेल या मालदीव, त्रिवेंद्रम से एक घंटे की दूरी पर है. हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में स्थित मालदीव अपने मूंगा द्वीपों की खूबसूरती के लिए मशहूर है. इतिहास गवाह है कि उसे अपने अस्तित्व के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है. यह आधुनिकता के लिए भी मशहूर है. यहां अमीरों के लिए शानदार रिज़ॉर्ट्स हैं, जहां प्रीमियर लीग फुटबॉल खिलाड़ी और यूरो जेट-सेट, उसके लगून के खूबसूरत नीले पानी में मौज-मस्ती के लिए आते हैं.

मौसम विज्ञनियों ने एक दशक पहले घोषणा की थी कि मालदीव के सभी द्वीपों का तापमान तेजी से गरम होता जा रहा है. जल्द ही हिंद महासागर इन्हें निगल जाएगा क्योंकि ये द्वीप समुद्र की सतह से महज कुछ सेंटीमीटर की ऊंचाई पर हैं. उनकी मानें तो 2100 तक द्वीप के निर्जन होने की आशंका है.

चेताने वाली इस भविष्यवाणी के बावजूद इन द्वीपों पर विश्व की काली नजर है. यदि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और दूसरों पर हावी होने की चाहत बनी रही, तो जल्द ही छोटा-मोटा द्वीपीय देश तीन महाशक्तियों- भारत, चीन और सउदी अरब, की आपसी खींचतान का अखाड़ा बन जाएगा. इनमें 26 प्रवाल द्वीपों (का समूह) में से एक द्वीप को लीज पर लेने की होड़ मची हुई है.

सउदी की नज़र

सउदी अरब ने इसकी सबसे पहले पहल की है. इस हफ्ते सउदी अरब के राजा सुलेमान अपने लवाज़में (1500 लोग) सहित इस द्वीपीय देश की सैर पर आए, जिनके निकट भविष्य में लुप्त होने की आशंका है. वे एक द्वीप को लीज पर लेने का सौदा तय करना चाहते हैं. मालदीव बेशकीमती मोती है. चीन अपनी दुस्साहसी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की नीति के तहत हिंद महासागर के चारों ओर महत्वपूर्ण चौकियां बनाकर भारत को घेरना चाहता है. मालदीव लंबे समय से भारतीय पक्ष में रहा है, खासकर उस समय जब अब्दुल गयूम तीन दशक तक यहां राष्ट्रपति रहे. पर द्वीप धीरे-धीरे सशक्त प्रतिस्पर्धियों के हाथों में फिसलता नजर आ रहा है, जो इस इलाके में समुद्री प्रभुत्व चाहते हैं.

विपक्ष की मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) ने पिछले हफ्ते एक सख्त बयान जारी किया कि विदेशी शक्तियों को द्वीप लीज पर देने से सुरक्षा खतरे में पड़ेगी. यह पुराना कर्जा उतारने के लिए घर के गहने बेचना जैसा है. यह शेर को अपनी रोटी का हिस्सा देना जैसा ही खतरनाक होगा.

एमडीपी ने अपना द्वीप लीज पर देने की मालदीव की योजना का विरोध किया है और गहरी चिंता जताई है. पिछले हफ्ते जारी एक बयान में पार्टी ने कहा, ‘राष्ट्रपति यमीन ने हाल ही में फाफू प्रवाल सउदी अरब को बेचने की घोषणा की है, पर मालदीव या फाफू के लोगों से इस संबंध में राय नहीं ली. इससे जनता में रोष स्वाभाविक है. इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट की सूचना जनता को आज तक नहीं दी गई है.’

एमडीपी ने गंभीर चिंता व्यक्त की कि फाफू योजना के तहत देश के 26 प्रवालों में से एक पर विदेशी शक्ति को आने की अनुमति देने से सउदी अरब के उपनिवेशवाद का विस्तार होगा. एमडीपी संसदीय समूह ने पिछले हफ्ते कहा कि वे 2015 में पारित संवैधानिक संसोधन के विरुद्ध निर्णय देना चाहते हैं, जो विदेशी पार्टियों को मालदीव की जमीन पर हक की अनुमति देता है.

इसके पिछवाड़े में सउदी अरब द्वीप से जो भारत को खतरा है, उसके बारे में तो सब जानते ही हैं: उसके दक्षिण-पश्चिम समुद्र तट पर हाल ही में चरमपंथियों का हस्तक्षेप शुरू हो गया है. मानो उत्तर और बांग्लादेश की जिहादी फैक्ट्रियां कम पड़ रही थीं. फिलहाल सउदी अरब की नीयत साफ नहीं है. पर निश्चित रूप से द्वीप मॉल या रिसोर्ट बनाने के लिए जा रहे हैं.

सुलेमान की पहल के पीछे वास्तविक मकसद यह लगता है कि वह सउदियों की मौजूदगी, सउदी पैसा और सउदी सेना से अस्थिर मालदीव को एक अल्ट्रा इस्लामी स्टेट बनाना चाहते हैं. और ऐसा करते हुए वे इस द्वीप राष्ट्र की कमजोर सामाजिक-आर्थिक संरचना में वहाबी इस्लाम घोलना चाहते हैं.

मालदीव में इस्लाम

यहां कई राजनीतिक तख्तापलट अलग-अलग वजहों से आते रहे हैं. मालदीव मीलों लंबे महासागर के कारण गंदी नीयत वाली दुनिया से बचा हुआ है. यह भौगोलिक स्थिति धर्म के अनुकूल भी रही. 13 वीं सदी की शुरुआत में एक इस्लामिक यायावर यहां आया था, और उसने बौद्ध धर्म की बहुलता वाले इस देश का मास लेवल पर धर्म परिवर्तन करवाया. मोरक्को यात्री इब्न बतूता भी यहां आया था. जिस तरह से लहरें तटों पर आकर सब साफ कर जाती हैं, उसी तरह विजेताओं और यात्रियों ने द्वीप-समूह को चुनौती और अवसर के रूप में देखा. उनमें राजा सुलेमान सबसे हाल के हैं.

सउदी अरब के साथ वहाबीवाद आएगा, जो इस्लाम के कड़े और शाब्दिक अर्थ में देखें, तो जिहाद बढ़ने का मूल कारण है. एमडीपी ने मालदीव में तेजी से बढ़ते चरमपंथ को लेकर भी चिंता जताई है. ख़बर है कि 200 से ज्यादा मालदीव के लोग आईएसआईएस सहित आतंकी संगठनों के सहयोग से सीरिया और मध्य पूर्व के देशों में गए थे.

यही वास्तविक खतरा है. केरल अपने 30 फीसदी सुपठित और अधिसंख्य उदारवादी मुसलमान जनसंख्या के कारण मध्ययुगीन ट्रेंड से बचा हुआ है. यह ट्रेंड खाड़ी से उठ रहा है, जो केरल के बिलकुल समीप है. पर केरल भी कुछ बम विस्फोट और आईएसआईएस समर्थकों के साथ चरमपंथ का प्रयोग करता रहा है. एक साल पहले केरल का एक आईएसआईएस समर्थक राज्य से फरार हो गया था, जिसके बारे में ताजा ख़बर है कि वह अफगानिस्तान में पिछले हफ्ते एक ड्रोन आक्रमण में मारा गया.

इसलिए हिंद महासागर पार चरमपंथियों का पुल बनाना बड़ा आसान है, जिससे सुरक्षा खतरे में पड़ेगी. इससे केरल में सउदी पैसा और विचारधारा का प्रवाह होगा. केरल में, जहां मंदिर, चर्च, मस्जिद मुख्य उद्यम हैं. ये नेहरू की बड़े उद्यमों की विचारधारा को बढ़ाते हैं. उनके लिए यही आधुनिक भारत के मंदिर थे. केरल के उद्यम केरल को सांप्रदायिक रूप से विस्फोटक भी बनाते हैं. खाड़ी देशों के पैसों से बने कई बड़े मकबरे पहले से केरल में हैं.

मनमोहक मालदीव

जिस तरह महासागर पर प्राकृतिक विस्फोट से हीरे गिरते हैं, मालदीव अपने खूबसूरत मूंगे, आसमानी पानी वाले लगून और ताड़ की बहुलता वाले तट से आकर्षित करता है. अमीर इसके लगूनों में गहरे गोते का आनंद ले सकते हैं, पर वहां के लोग महज गरीब तमाशबीन हैं.

इसके दो या तीन लाख लोग अपनी आधारभूत चीजों के लिए ज्यादातर समय केरल के पास बिताते हैं. स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार और छोटे कारोबार के लिए. केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम, जहां से मालदीव के लिए पहली हवाई यात्रा दो दशक पहले शुरू हुई है, सबसे ज्यादा लाभ उसे है. इसलिए मालदीव में सउदी अरब के आने से खतरा तुरंत होगा.

दूसरी ओर क्या सउदी अरब अपने बंदरगाहों और चौकियों से, जो अब भारत को घेरे हुए हैं, हिंद महासागर में भारत का मित्र बनेगा, खासकर चीनी प्रभाव का विरोध करने के लिए? इसे जानने में भी थोड़ा वक्त लगेगा, पर भारत के पिछवाड़े में सउदी अरब के आने से आने वाले समय में खतरा बढ़ सकता है.

First published: 7 March 2017, 8:09 IST
 
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