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दो शरीफों के बीच फंसा पाकिस्तान

तिलक देवाशर | Updated on: 22 July 2016, 8:17 IST
(मलिक/कैच न्यूज)

दुनिया के किसी देश में शायद ही सेना प्रमुख के मुंह से निकले हुए शब्द और उनकी शारीरिक भाषा उतना महत्व रखते हों जितना पाकिस्तान में रखते हैं. वहां जब किसी नए सेना प्रमुख की नियुक्ति या फिर मौजूदा सेवारत सेना प्रमुख के सेवा विस्तार की बात आती है तो टीवी चैनलों पर आने वाले टाॅक शो और प्रिंट मीडिया में अजीब सी हलचल मच जाती है.

सभी में इस मुद्दे के गुण-दोष की अपने-अपने हिसाब से व्याख्या करने के लिये ‘रक्षा एवं सुरक्षा विशेषज्ञों से रायशुमारी की होड़ मच जाती है. ऐसे परिदृश्य में अगर पाकिस्तान के प्रमुख शहरों और विशेषकर छावनियों में एकाएक सैंकड़ों की संख्या में ऐसे पोस्टर नजर आएं जिनमें मौजूदा प्रमुख से ‘‘आगे आने’’ की अपील की गई हो, जिसका सीधा सा मतलब देश में मार्शल लाॅ लागू करने की मंशा, तो आप लोगों के बीच बढ़ रहे उन्माद की कल्पना कर सकते हैं.

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हाल के दिनों में पाकिस्तान की कुछ प्रांतीय राजधानियों और कई अन्य शहरों में, विशेषकर पंजाब में, ऐसा ही देखने को मिला जब रातोंरात सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ की बड़ी तस्वीरों वाले पोस्टर सड़कों पर लगे मिले. उनमें उन्हें उद्धृत करते हुए लिखा था, ‘‘जाने की बात हुई पुरानी, खुदा के लिये अब आ जाओ.’’

ये पोस्टर सिर्फ तीन वर्ष पूर्व चुनाव आयोग के पास पंजीकृत होने वाले अनजान से राजनीतिक दल ‘‘मूव आॅन पाकिस्तान’’ द्वारा लगाए गए थे. इस पार्टी की कमान फैसलाबाद के रहने वाले एक व्यवसायी मोहम्मद कामरान के हाथों में है जो फैसलाबाद, सरगोधा और लाहौर में कई स्कूलों का संचालन करते हैं.

पंजाब में रातोंरात सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ की बड़ी तस्वीरों वाले पोस्टर सड़कों पर लगे मिले

मीडिया के साथ बातचीत के दौरान पार्टी के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि वह लोग मार्शल लाॅ लागू करने की गुजारिश नहीं कर रहे हैं, जैसा कि समझा जा रहा है. चूंकि देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार और विपक्ष के बीच तनातनी वाले हालात बने हुए हैं ऐसे में उनका इरादा सिर्फ सेना प्रमुख को एक संवैधानिक सरकार स्थापित करने और दोनों पक्षों के बीच हस्तक्षेप करना है ताकि देश को राजनीतिक अराजकता से बचाया जा सके.

यह वही दल है जिसने फरवरी 2016 में भी एक पोस्टर अभियान के माध्यम से सेना प्रमुख से नवंबर में होने वाली अपनी सेवानिवृति पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था. जनरल शरीफ ने 25 जनवरी 2016 को आईएसपीआर ट्वीट के माध्यम से अपने इरादे स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘‘मैं सेवा विस्तार में यकीन नहीं रखता और नियत तारीख पर सेवानिवृत हो जाऊंगा (यानी 28 नवंबर 2016).’’

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पीएमएलएन सरकार के चुप्पी साध लेने के बाद ट्वीट के माध्यम से यह साफ करने की जिम्मेदारी सेना के प्रवक्ता और आईएसपीआर के ले जनरल असीम बाजवा के कंधों पर आ गई कि सेना प्रमुख की तस्वीरों वाले किसी भी पेास्टर से सेना या उससे संबद्ध किसी भी संगठन का कोई लेना-देना नहीं है.

जाहिर है कि वे इसके अलावा और कुछ कह या कर भी नहीं सकते थे.

इन पोस्टरों के सामने आते ही कईयों की भृकुटियां तन गईं और यह बहुत जल्द ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. कुछ दिन पूर्व ही देश में हंगामा मचाने वाले पनामा पेपर लीक मसले के बाद हाल ही में लंदन से दिल की सर्जरी करवाकर लौटे पीएम नवाज शरीफ की मुश्किलों में इश पोस्टरबाजी ने और इजाफा कर दिया है.

कुछ लोगों ने इस घटना के तार पाकिस्तान का दौरा करने वाले अमरीकी सीनेटर जाॅन मैक्केन के उस बयान से जोड़ने का प्रयास किया जिसमें उन्होंने कहा था कि जनरल शरीफ निश्चित ही पाकिस्तानी सेना का नेतृत्व करते रहेंगे.

मैं सेवा विस्तार में यकीन नहीं रखता और नियत तारीख पर सेवानिवृत हो जाऊंगा : राहिल शरीफ

मुख्य विपक्षी दल पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने इन पोस्टरों को पहले से ही परेशान नवाज शरीफ की एक चाल के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया. उनका कहना था कि पीएम विरोध करने वालों को यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि अगर विपक्ष सड़कों पर उतरकर सरकार की जवाबदेही निश्चित करने का प्रयास करता है तो सेना राजनेताओं को घर का रास्ता दिखा सकती है. इस संदर्भ में माना गया कि सरकार जानबूझकर पनामा लीक्स की जांच रोकने के प्रयास कर रही है जिनमें पीएम शरीफ के परिवार के शामिल होने का आरोप है.

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किसी भी लोकतांत्रिक देश में संविधान को उखाड़ फेंकने की मांग करने वाले किसी भी व्यक्ति या संस्थन के खिलाफ बिना समय गंवाए तुरंत मामला दर्ज कर लिया जाता. लेकिन पाकिस्तान में सरकार ने उस समय तक इंतजार करना मुनासिब समझा जब तक कि आईएसपीआर ट्वीट नहीं किया कि इन पोस्टरों से सेना या उससे संबद्ध किसी भी संगठन का कोई वास्ता नहीं है और इसके बाद ही मामला पंजीकृत किया गया.

एक मुख्य चीज जो इन पोस्टरों की तरफ ध्यान देने को मजबूर करती है वह यह है कि देश के सैन्य और नागरिक प्रशासन के बीच हमेशा से ही रिश्ते बेहद नाजुक स्थिति में रहे हैं. यहां लगातार यही वाक्य सुनने को मिला है कि ‘‘यह दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं,’’ जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं.

वजीरिस्तान में कुछ आतंकियों को खत्म करने के लिये जनरल शरीफ द्वारा प्रारंभ किया गया आॅपरेशन जर्ब-ए-अज्ब और कराची की बेहाल कानून-व्यवस्था की स्थिति से सफलतापूर्व निबटने के चलते उनकी लोकप्रियता में काफी इजाफा हुआ है. यह तथ्य देश की नवाज शरीफ की असैन्य सरकार के बिल्कुल विरोधाभासी है. इसका सबसे जीवंत उदाहरण यह है कि शरीफ के इलाज के लिये सात हफ्तों तक लंदन में रहने के दौरान पाकिस्तानी राजनीति जस की तस रही, सिर्फ टीवी चैनलों के अलावा किसी को भी प्रधानमंत्री की कमी महसूस नहीं हुई, कह सकते हैं कि किसी ने भी उनकी अनुपस्थिति पर ध्यान भी नहीं दिया.

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हालांकि जनरल शरीफ को आतंकवाद से संबंधित ‘‘खेल के नियम’’ और ‘‘माहौल को बदलने’’ का श्रेय दिया जा रहा है. ध्यान देने योग्य बात यह है कि वे सिर्फ सेना द्वारा विदेशी और घरेलू नीति के संबंध में की गई गड़बड़ियों को ठीक करने का प्रयास कर रहे है. हालांकि उनकी यह कार्रवाई चुनिंदा स्थानों पर ही हो रही है और लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क इन कार्रवाइयों से अभी भी बचे हुए हैं. इसी प्रकार जिहादी आतंकवाद की नर्सरी माने जाने वाले पंजाब को भी इस कार्रवाई से दूर रखा गया है.

पाकिस्तान में सैन्य और नागरिक प्रशासन के बीच हमेशा से ही रिश्ते बेहद नाजुक स्थिति में रहे हैं

खैर जो भी हो, पाकिस्तान में मार्शल लाॅ और लोकतंत्र के बीच सिर्फ देश की आर्थिक स्थिति ही नहीं है जिससे निबटना सेना की क्षमता के बाहर है बल्कि सेना प्रमुख का चरित्र और उनकी प्रतिष्ठा भी है.

अपनी कही हुई बातों पर टिकने के लिये जाने जाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध जनरल राहिल शरीफ ने नियत तारीख पर ‘घर वापसी’ का ऐलान करके साफ कर दिया है कि उनके लिये अब अपना रास्ता बदलना लगभग असंभव है.

ये पोस्टर पाकिस्तानी जनता की उस असहाय मनोस्थिति को भी दर्शाते हैं कि वह खुद को कैसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच फंसा पा रही है. साथ ही उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि जनरल शरीफ ही वह व्यक्ति हैं जो उन्हें इससे बाहर निकाल सकते हैं. हालांकि इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि ऐसी परिस्थितियों में कहीं उनके मन में यह बात न घर कर जाए कि वे एक देवदूत के समान हैं और देश का भाग्य सिर्फ उनके ही हाथों में है.

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इस संदर्भ में ध्यान देने लायक बात यह भी है कि जनवरी के आईएसपीआर के ट्वीट में जनरल शरीफ ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी- ‘पाकिस्तान का राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है और हर कीमत पर इसकी रक्षा की जाएगी.’ पाकिस्तानी सेना की शब्दावली में ‘राष्ट्रीय हित’ सिर्फ देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा तक ही सीमित नहीं होता है, बल्कि इसकी पहुंच देश की अंदरूनी राजनीति में भी बराबर होती है.

सभी सैन्य शासकों- अयूब, याह्या, जिया और मुशर्रफ- ने सिर्फ ‘सर्वोच्च राष्ट्रीय हित’ के नाम पर सत्ता पर कब्जा किया, न की किसी अंदरूनी या बाहरी खतरे के चलते. इसके अलावा सैन्य नेतृत्व के बारे में एक कहावत यह भी है कि जनरल तब तक जंग का मैदान नहीं छोड़ते जब तक लड़ाई खत्म नहीं हो जाती. अब जब आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अधूरी है तो क्या जनरल शरीफ ऐसे ही जा सकते हैं, और उम्मीद की सकती हैं कि उनका उत्तराधिकारी भी उनके पदचिन्हों पर ही चलेगा?

नवाज शरीफ का इतिहास दोहराने का प्रयास इस खतरे को और अधिक बढ़ा रहा है. प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान असुरक्षित नवाज को लगा कि सेना प्रमुख जनरल असलम बेग उनकी सरकार को गिराने का प्रयास कर रहे हैं और उन्होंने संभावित तख्तापलट से निबटने का प्रयास किया.

इसी क्रम में उन्होंने असलम बेग की सेवानिवृति से चार महीने पहले ही आसिफ नवाज जंजुआ को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. इसके चलते आसिफ 16 अगस्त 1991 को सेवानिवृत होने से पहले एक अपंग प्रमुख की तरह काम करते रहे.

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इस बार भी इस प्रकार की अपुष्ट खबरें आ रही हैं कि नवाज अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिये ऐसा ही कुछ करने की योजना बना रहे हैं. अगर वे ऐसा करते हैं और समय से पहले जनरल शरीफ के उत्तराधिकारी की घोषणा करते हैं तो उनका यह कदम सेना में असंतोष की दरारें पैदा कर सकता है. ऐसा इसलिये क्योंकि बेग के बिल्कुल उलट जनरल शरीफ सेना और जनता दोनों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. ऐसी स्थिति आने पर निश्चित ही जनरल शरीफ के पास बेहद सीमित विकल्प होंगे और वे अपनी व्यक्तिगत साख के मुकाबले सेना के संस्थागत हितों को तरजीह देंगे.

अब यह पूरी तरह से नवाज शरीफ के हाथों में है कि वे दोबारा अपनी पुरानी गलतियों को दोहराते हैं या पाकिस्तान को एक बार फिर सेना के हाथों में जाने से बचाते हैं.

First published: 22 July 2016, 8:17 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

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