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दक्षिण अफ्रीका ने अपना विवेकवान हीरो खोया, अलविदा अहमद कथरादा!

शिव शंकर मुखर्जी | Updated on: 31 March 2017, 16:09 IST

भारतीय मूल के दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी नेता अहमद कथरादा का गत 28 मार्च को 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया. कथरादा रंगभेद विरोधी संघर्ष में भाग लेने वालों में एक आइकन थे. रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले इस अप्रितम योद्धा को पूरे विश्व से श्रद्धाजंलि देने का तांता लगा हुआ है. वह उन ख्यातिप्राप्त आठ लोगों में से एक थे जिन्हें 1964 में रिवोनिया ट्रायल में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी और उन्हें रोबेन द्वीप में रखा गया था. दक्षिण अफ्रीका नेता नेल्सन मंडेला भी उनके साथ इसी जेल में थे. मंडेला का 2013 में निधन हो गया है. इस कुख्यात जेल में रहने वाले अब सिर्फ दो लोग डेनिस गोल्डबर्ग (83) और एन्ड्र्यू मलानगेनी (91) ही जीवित बचे हैं.

मदीबा के बेहद क़रीबी


कथरादा ने अपनी जिन्दगी के 26 साल और तीन महीने रोबेन द्वीप जेल और पोल्समूर जेल में बिताए. इसमें से 18 साल वह रोबेन द्वीप में नेल्सन मंडेला के साथ रहे. जब वह 34 साल के थे जब उन्हें सजा हुई थी. 60 साल की उम्र में उन्हें तब ही रिहा किया गया जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद से मुक्ति मिली.

उनका मदीबा (नेल्सन मंडेला को लोग इसी नाम से सम्मान देते हैं) के साथ लम्बा साहचर्य रहा. उनको मर्मस्पर्शी ढंग से दी जाने वाली श्रद्धांजलियों में सम्भवत: एक हृदयस्पर्शी श्रद्धांजलि वह है जो मदीबा की पूर्व पत्नी विनी मंडेला ने दी है. उनके शब्द रंगभेद विरोधी संघर्ष के दोनों महारथियों के बीच के सम्बंधों पर रोशनी डालते हैं.

 

विनी ने अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि मुझे वही दुख है जो अपने मित्र मदीबा के जाने के बाद हुआ था. मदीबा का जब निधन हुआ तो वह अपनी आत्मा का एक हिस्सा कैथी के पास छोड़ गए थे. वह हमारे परिवार के विस्तारित सदस्य और अभिन्न अंग थे. इसलिए मैं वही दुख का अनुभव कर रही हूं. लगता है कि जैसे इतिहास का एक अध्याय खत्म हो गया है.


दक्षिण अफ्रीकियों के लिए वह कैथी थे और जो उनसे काफी छोटे थे, उनके लिए 'अंकल कैथी' थे. 12 वर्ष की उम्र में वह यंग कम्युनिस्ट लीग द्वारा चलाए जाने वाले रंगभेद विरोधी यूथ क्लब में शामिल होकर युवा नेता और एक्टिविस्ट बने थे. उन्होंने अपनी जिन्दगी के सबसे अच्छे साल जेल में गुजारे. जिन लोगों ने उन पर अत्याचार किया था, उनके प्रति भी अन्य लोगों की तरह उनकी कोई दुर्भावना नहीं रही.

 

कैथी के साथ मेरी यादें


एक भारतीय राजनयिक के रूप में सेवा के दौरान मैंने अपने जीवन के दशक इस रीजन में व्यतीत किए हैं. अपनी इस प्रोफेशनल लाइफ की वजह से मुझे दक्षिण अफ्रीका में रंगविरोधी आइकन कहे जाने वाले लोगों को जानने-समझने का मौका मिला. मैं 1980 के दशक में जाम्बिया में इनमें से अनेक लोगों से मिला. यहां ओलिवर ताम्बो के नेतृत्व में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का निर्वासित मुख्यालय था, बाद में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. निश्चित रूप से कैथी जेल में थे. मैं वर्ष 2000 में दक्षिण अफ्रीका के लिए भारत का उच्चायुक्त बनकर केपटाउन आया. यहां आने के तुरन्त बाद ही मैं पहली बार यहां कैथी से मिला.


कैथी केपटाउन में ही रहते थे. राष्ट्रपति के रूप में मदीबा का पांच साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्होंने 1999 में संसद की अपनी सीट छोड़ दी थी. लेकिन कैथी रोबिन आइसलैंड काउंसिल के मुखिया बने रहे थे. संयोगवश, मदीबा की कैबिनेट में कैथी केवल दो दिन ही मंत्री रहे. उनके पास सुधारात्मक सेवाएं विभाग था. जब मॉंगोसुथू की अगुवाई वाली इंकाथा फ्रीडम पार्टी मदीबा की सरकार में शामिल हो गई तब पार्टी ऐसा मंत्रालय चाहती थी जो गृह और सुरक्षा से जुड़े हों.

 

कैथी को समझाने-बुझाने की कोई जरूरत नहीं थी. उन्होंने अपना पोर्टफोलियो छोड़ दिया. उन्हें मदीबा के राजनीतिक और संसदीय सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया. असल में वे मदीबा के दाहिने हाथ थे ही. वह महसूस करते थे कि वह इस पद रहकर नीतियों को और ज्यादा अमलीजामा पहना सकते हैं.

 

कैथी के साथ रॉबिन आइसलैंड घूमना


मेरे और मेरे परिवार के लिए वे दिन यादगार दिन बन गए हैं जो मौका कैथी ने हमें और हमारे परिवार को दिया. हम लोग उनके साथ रहे. हम पुराने लोगों के साथ एक बार फिर थे. यह सुविधा जिन अन्य लोगों को दी गई थी, उनमें फिदेल कास्त्रो और मार्गेट थैचर भी थीं. बाद में अन्य़ देशों ने जो रुख अपनाया, उसे लेकर उनमें मिश्रित भावना थी. वास्तव में पश्चिम के पूरे नेतृत्व के बारे में. उनके लिए वे रंगभेद शासन के समर्थक थे. लिबरेशन के बाद उनका जो स्वर बदला, वह उनके हिप्पोक्रेसी, पाखंड की ऊंचाई थी.

जब हम जेल की बिल्डिंग के पास से गुजर रहे थे तो एक अन्य प्रसिद्ध कैदी इन्द्रीस नायडू ने उन दिनों को कभी न भूलने वाला अनुभव बताया.

दर्द और दुख, जेल में रंगभेद के भेदभाव की निरन्तरता, क्रूरताएं, न्यूनतम मानव गरिमा के लिए निडर लड़ाई और उन सभी के साथ, साहस, सौहार्द और निरंतर आशावाद जैसी चीजों ने उनके भीतर निरंतरता बनाए रखी. 'लॉंग वाक टू फ्रीडम' नामक पुस्तक में नदीबा ने कैथी को यह कहते हुए उद्धृत किया है जेल में एक मिनट एक साल की तरह लगता है और एक साल एक मिनट की तरह से गुजर जाता है.

कैथी ने कहा था कि जेल में बंद होने को लेकर उन्हें बहुत अफसोस नहीं था कि वह परिवार और बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं. उनका दिल आनन्द के उस समय उछाल मारने लगता था जब वे जेल रक्षकों के बच्चों में से एक को अपना बना लेते थे. हमारी उनसे बातचीत में एक चीज लगभग हमेशा रहती थी कि वह कैद में अपनी पूरी जिन्दगी का सामना कैसे कर पाते थे, वह भी ऐसी हालत में जब उनमें से किसी को सफलता की कोई उम्मीद ही नहीं थी.

उन्होंने अन्य लोगों की तरह जेल में अध्ययन किया, जेल में रहकर ही चार डिग्रियां लीं. डिग्री लेने वालों में वर्तमान राष्ट्रपति जैकब जुमा भी थे. एएनसी के प्रशासनिक मामलों में दक्ष और मदीबा के संरक्षक वाल्टर सिसुलू ने कई मायनों में उन्हें अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया. कैथी ने बताया था कि उनका मानना था कि उनके संघर्ष की सफलता तय है और सफलता मिलने के बाद वे शासन करने में सक्षम हो सकें.

 

कैथी एक क्रांतिकारी की तरह उज्ज्वल पक्ष देखते थे. जेल के बारे में उनका कहना था कि जेल उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छी थी! लगभग क्रूर शासन ने उन्हें कठिन बना दिया. एक बार, उन्होंने कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया जो वे सार्वजनिक रूप से कई बार कह चुके थे. उन्होंने कहा था कि वे जेल में 'सुरक्षित' थे क्योंकि रंगभेद शासन की पुलिस उन पर हमला नहीं कर रही थी और उन्हें गोली नहीं मार रही थी. मेरी सबसे कीमती और यादगार चीज वह है जो कैथी ने द्वीप के दौरे के बाद हमें दी थी. वह चीज है मदीबा के जेल कमरे की कुंजी (चाभी) की प्रतिकृति.

 

 

एक राष्ट्र के विवेकवान रक्षक

 

हाल ही में कैथी ने भ्रष्ट कारनामों में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति याकूब ज़ुमा की कड़ी आलोचना की थी और एक खुला पत्र लिखकर उनसे इस्तीफा देने को कहा था. उनकी पत्नी बारबरा होगन भी उनकी तरह ही वर्तमान राष्ट्रपति की कट्टर आलोचक हैं. राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि राष्ट्रपति 'अपने परिवार की इच्छा की खातिर' उनके अंतिम संस्कार में भाग नहीं लेंगे. सरकार का प्रतिनिधित्व उप राष्ट्रपति साइरिल रामाफोसा करेंगे. कहना न होगा कि अपनी जिन्दगी के आखिरी क्षण तक वह महान मित्र और बड़े भाई बने रहे.

First published: 31 March 2017, 8:52 IST
 
शिव शंकर मुखर्जी @ShivMjee

The writer was India's High Commissioner to the United Kingdom, South Africa and Namibia, and Ambassador to Nepal and Egypt.

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