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श्रीलंका में हुआ 'तख्तापलट' भारत के लिए हो खड़ी हो सकती हैं मुश्किलें

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 October 2018, 9:49 IST

भारत के पड़ोसी देश श्री लंका में कल का दिन संवैधानिक उथल पुथल से भरा रहा. भारत के लिए सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण श्री लंका में नाटकीय तरीके से कल नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति की गई. श्री लंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को कल प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. श्री लंका के वर्तमान राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी.

भारत के लिए श्री लंका की सत्ता में राजपक्षे का आना थोड़ा चिंताजनक है क्योंकि राजपक्षे को चीन समर्थक माना जाता है. हालांकि श्री लंका की सत्ता में राजपक्षे के आने की अटकलें काफी लंबे समय से लगाई जा रही थीं लेकिन सत्‍ता में वापसी के लिए क्या रास्ता अपनाएंगे ये बात साफ़ नहीं थी.

गौरतलब है कि वर्ष 2015 में भारत ने राजपक्षे को सत्‍ता से बेदखल करने के लिए अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल किया था. भारत ने ही सिरीसेना और विक्रमसिंघे के बीच एक समझौता कराया था. भारत ने यह कदम तब उठाया जब राजपक्षे का चीन के प्रति अतिरिक्त झुकाव दिखा. चीन ने सामरिक लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह को कई वर्षों के लिए लीज पर चीन को दे दिया.

इतना ही नहीं उस समय श्रीलंकाई राष्‍ट्रपति राजपक्षे ने चीन को कोलंबो के बंदरगाह बनाने और चीनी पनडुब्बियों के श्रीलंका के बंदरगाह तक प्रवेश की इजाजत दे दी. इसके बदले श्री लंका को चीन से भारी मात्रा में कर्ज दिया और आज तक श्री लंका चीन के कर्ज से उबर नहीं पाया है.

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अमेरिका ने याद दिलाया संविधान

इस घटना पर अमेरिका ने प्रतिक्रिया देते हुई कहा कि वह श्री लंका की घटनाओं पर नजर बनाए हुए है. अमेरिकी विदेश विभाग से एक ब्यान भी जारी किया, ''हम सभी दलों का आह्वान करते हैं कि वे संविधान के मुताबिक कार्य करें. हिंसा से दूर रहें और उचित प्रक्रिया का पालन करें. हम अपेक्षा करते हैं कि श्री लंका की सरकार मानवाधिकार, सुधार, जवाबदेही, न्‍याय और मेलमिलाप के वादे को पूरा करेगी.'' हालांकि भारत की तरफ से अभी इस घटनाक्रम पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है. लेकिन भारत का विदेश मंत्रालय भी इस मामले पर नजर बनाए हुए है.

श्री लंका में राजनैतिक संकट

श्री लंका में इस तरह से सत्ता के उलटफेर को लेकर देश में राजनैतियक संकट जैसे हालात हो सकते हैं. इस घटना को लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा, ''सिरिसेना का फैसला संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है क्योंकि संविधान के 19वें संशोधन के मुताबिक, बहुमत मिले बिना वह विक्रमसिंघे को पद से नहीं हटा सकते.''

First published: 27 October 2018, 8:47 IST
 
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