Home » इंटरनेशनल » Storm warning: how Donald Trump may derail the climate change fight
 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत में जलवायु परिवर्तन की लड़ाई की हार छिपी है

निहार गोखले | Updated on: 20 November 2016, 8:26 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • पेरिस समझौते में अमेरिका ने वादा किया था कि वह 2005 के स्तर को 2025 में 26-28 प्रतिशत तक घटा देगा. 
  • मगर डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2012 में ही ट्वीट कर दिया था कि अगर वह अमेरिका के राष्ट्रपति बनते हैं तो पेरिस समझौते को ख़त्म करके अलग हो जाएंगे. 
  • माना जा रहा है कि अमेरिका के बाहर निकलने से अन्य देशों को ग्लोबल वार्मिंग कम करने के प्रयासों को बहुत बड़ा झटका लग सकता है.

नवम्बर 2012 में डोनाल्ड ट्रंप के सबसे चर्चित ट्वीट्स में से एक यह था, 'ग्लोबल वार्मिंग का विचार चीन ने चीन के लिए दिया था ताकि अमेरिका में निर्मित उत्पाद को गैर-प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया जाए.' चार साल बाद अब वही ट्रंप यूनाइटेड स्टेट्स के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति हैं. अब सवाल यह है, 'क्या ट्रंप अभी भी जलवायु परिवर्तन की चिंता को मज़ाकिया अंदाज़ में झांसा देना समझते हैं?'

अपने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने कहा था कि अगर वह राष्ट्रपति बने तो वह पेरिस समझौते को खत्म कर देंगे जिस पर दिसम्बर 2015 में 196 देशों ने दस्तख़त किए थे ताकि ग्लोबल वार्मिंग-2 डिग्री सेल्सियस के अंदर ही बनी रहे. हाल ही में समाचार एजेंसी रॉयटर ने अफवाहों के आधार पर एक खबर दी थी कि ट्रंप अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को वापस लेने की योजना बना रहे थे.

जलवायु परिवर्तन पर हुए यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन को बाहर निकलने में साल भर लग गया. दूसरी ओर अगर हम पेरिस समझौते की तरफ देखें तो उसमें चार साल लग गए. अब इन अफवाहों को बल मिल रहा है कि ट्रंप अपनी यह घोषणा किसी भी दिन कर सकते हैं.

हम भविष्य में किस ओर जा रहे हैं? ट्रंप के राष्ट्रपति बन जाने से अब मोरक्को के मर्राखेज में होने वाले यूएनएफसीसीसी के सम्मेलन को लेकर चिंता बनी हुई है. इस सम्मेलन में वे देश भाग ले रहे हैं जिन्होंने पेरिस समझौते पर दस्तख़त किए थे. ये देश इसलिए बैठक कर रहे हैं कि इसे कैसे क्रियान्वित किया जाए.

चिन्ता के विषय वाले बिन्दु

ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाला अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. साल 2010 में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अमेरिका का उत्सर्जन प्रतिशत 15.6 फीसदी था जबकि चीन का 22.7 फीसदी था. पेरिस समझौते में अमेरिका ने वादा किया था कि वह 2005 के स्तर को 2025 में 26-28 प्रतिशत तक घटा देगा.

हालांकि, यह वादा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. अगर ट्रंप यह सोच लेते हैं कि उन्हें पेरिस समझौते को जारी नहीं रखना है तो इसका सीधा प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ वैश्विक लड़ाई पर पड़ेगा.

पहले से ही वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड का स्तर भयानक रूप से 400 पीपीएम को पार कर चुका है. अगर हम सभी देशों के उत्सर्जन कम करने के वादों को जोड़ दें तो ग्लोबल वार्मिंग पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा. ग्लोबल वार्मिंग का ज़हर उसी तरह फैल रहा है, जैसे उसने तीन डिग्री सेल्सियस के ख़तरनाक स्तर को पार किया था. अगर अमेरिका इस लड़ाई से बाहर निकल जाता है तो सभी देशों को इस स्तर को दो डिग्री सेल्सियस पर लाना ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा.

वित्त की व्यवस्था

अमेरिका का इतिहास सबसे बड़े उत्सर्जक वाले देश के रूप में रहा है. इसका मतलब यह है कि वह 18वीं सदी से ही सबसे ज्यादा उत्सर्जन कर रहा है. और यही उत्सर्जन आज की तारीख तक जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक बना हुआ है. इसी कारण से, अमेरिका जैसे देश भारत जैसे देशों को धन और प्रौद्योगिकी देते हैं जो पहले से ही क्लाइमेट चेंज जैसे असर से जूझ रहे हैं. ये देश कार्बन फ्रेन्डली अर्थव्यवस्था को चलाने में भी मदद करते हैं.

ग्रीन क्लाइमेट फंड के लिए अमेरिका ने 3 बिलियन डॉलर से 100 बिलियन डॉलर तक देने का वादा किया है. अमेरिका ने द्विपक्षीय समझौतों के साथ ही बहुउद्देशीय एजेंसियों जैसे इंटरनेशनल मॉनीटरी फंड के जरिए भी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष के लिए फंड देने पर प्रतिबद्धता जताई है. 

इसका मतलब यह है कि अमेरिका के बाहर निकलने से अन्य देशों को ग्लोबल वार्मिंग कम करने के प्रयासों को बहुत बड़ा झटका लग सकता है. एक्शन एड इंडिया में इंटरनेशनल क्लाइमेट पॉलिसी मैनेजर हरजीत सिंह का कहना है कि पेरिस समझौते से जो लाभ मिलना था और इसके लिए जो मूड बना था, वह प्रभावित हुआ है. अमेरिका की गैर मौजदूगी में सिंह ने यह भी कहा कि अन्य देशों को भी यूरोपियन यूनियन की तरफ देखना चाहिए और फंडिंग को मजबूत बनाना चाहिए.

इस बीच यह भी पता चला है कि ट्रंप क्लाइमेट निगोशियेन्स से अमेरिका को अलग कर सकते हैं. स्वच्छ ऊर्जा कम्पनियों के साथ ही अन्य देशों ने भी यह कहा है कि वे इस लड़ाई के लिए अपना पूरा योगदान देंगे. अमेरिका के लगभग 400 व्यापारिक घरानों ने ट्रम्प को खुला पत्र लिखकर कहा है कि वे पेरिस समझौते से न हटें और कार्बन कम करने की नीतियों को जारी रखें.

पत्र में यह भी कहा गया है कि पेरिस समझौते के क्रियान्वयन से व्यापारियों को प्रोत्साहन मिलेगा, वे सक्षम होंगे और निवेशक जो अभी वर्तमान में लो-कार्बन में करोड़ों डॉलर का निवेश करते हैं, वो खरबों डॉलर में बदल जाएगा जिससे पूरी दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा सुलभ होगी और सभी के बीच समृद्धि आएगी.

चीन आज कार्बन उत्सर्जन में दुनिया का सबसे बड़ा केन्द्र है. उसने भी इस चिन्ता के बारे में अपने सुर मिलाए हैं और मुंहतोड़ जवाब दिया है कि जलवायु परिवर्तन पर चीन का दूर-दूर तक धोखा देने का कोई इरादा नहीं है. 

चीन के उप-विदेश मंत्री लियू झेनमिन ने 16 नवम्बर को कहा है कि अगर आप जलवायु बदलाव पर मध्यस्थता के इतिहास को देखें तो वास्तव में, इसकी शुरुआत 1980 के दशक के आखिर में रीगन और सीनियर बुश के कार्यकाल के दौरान रिपब्लिकन्स के सहयोग से आईपीसीसी (इंटरगवर्मेन्टल पैनल ऑन क्लाइमेटचेंज) ने की थी.

First published: 20 November 2016, 8:26 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

पिछली कहानी
अगली कहानी