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राष्ट्रपति यामीन की तानाशाही ख़त्म करने के लिए मालदीव के नेता एकजुट

रवि जोशी | Updated on: 31 March 2017, 8:47 IST

घटनाएं तेजी से बदल रही हैं. मालदीव असाधारण रूप से इसका गवाह है. राष्ट्रपति अब्दुल्ला गयूम यामीन की तानाशाही के खिलाफ नागरिकों का संघर्ष फिर से आकार ले रहा है. इस ऐतिहासिक सच्चाई को महसूस किया जा सकता है. देश के नेताओं ने गत 24 मार्च को राष्ट्रपति यामीन के अत्याचारी और भ्रष्ट शासन से ऊबकर मालदीव्स यूनाइटेड अपोजीशन (एमयूओ) नाम से एक संयुक्त गठबंधन बनाया है. ऐसा गठबंधन बनना सबसे ज्यादा असम्भव कार्य था.


तथ्य तो यह है कि राष्ट्रपति यामीन के बड़े भाई मौमून अब्दुल गयूम (प्रोग्रेसिव पार्टी के अध्यक्ष), जो सबसे ज्यादा समय तक राष्ट्रपति पद पर रहे हैं, ने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद (माल्दीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष) और यामीन सरकार में उनके पूर्व गठबंधन सहयोगी तथा उनकी कैबिनेट के पूर्व मंत्री कासिम इब्राहिम (जम्हूरी पार्टी के नेता) के साथ एक अन्य गठबंधन सहयोगी शेख इमरान अब्दुल्ला के साथ हाथ मिला लिया है. इन लोगों ने साहस और निर्भीकता के साथ उन मुद्दों पर आवाज उठाई है जिन चुनौतियों का सामना देश कर रहा है.

ये लोग मालदीव में लोकतंत्र की बहाली की दिशा में एकजुट होकर काम करने पर सहमत हुए हैं. उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने तथा मालदीव के लोगों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण का वादा किया है.

 

 

 

समान राजनीतिक दृष्टिकोण

 

चारों नेता और उनके दल अन्य मुद्दों के साथ जिन महत्वपूर्ण मामलों पर एक साथ काम करने को सहमत हुए हैं, वे मुद्दे इस प्रकार हैं-

1- इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों का संरक्षण, स्वतंत्र, सार्वभौमिक और राष्ट्रवाद.

2- देश की जमीन, समुद्र और प्राकृतिक संसाधनों के मालिकाना हक की हिफाजत करना.

3- देश को विपदा में डालने वाले राजनीतिक अनबनों का समाधान निकालना.

4- नागरिकों के रद्द किए गए सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की बहाली.

5- मालदीव में स्वंतत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना, राजनीतिक दल जिस उम्मीदवार को चुनाव लड़ने की अनुमति दें. (यह मोहम्मद नशीद के उस दावे को सीधा संदर्भित हैं जिसके बारे में उनका दावा है कि वह अपनी पार्टी के निश्चित रूप से पसंद हैं और झूठे मामले में उन्हें फंसाया गया है, के चलते वे चुनाव लड़ने से वंचित नहीं होंगे).

6- सभी नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना जिन्हें राजनीति प्रेरित आरोपों में जांच या ट्रायल अथवा दोषी पाए जाने पर गिरफ्तार किया गया है.

7- सरकार में भ्रष्टाचार और गबन की घटनाओं को रोकना.

चारों नेताओं ने मालदीव के लोगों के लिए कॉमन पॉलिटिकल विजन बनाया है और इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए हैं. वे संसद में अपने प्रतिनिधित्व का इस्तेमाल करने तथा समान उद्देश्यों को हासिल करने के लिए राजनीतिक एकजुटता पर सहमत हुए हैं

 

 

यामीन से चिढ़ने की वजह

 

यहां देखा जाना जरूरी है कि वह वजह क्या है जिसके चलते विभिन्न राजनीतिक दलों और अलग-अलग विचारधाराओं को मानने वाले नेता, जो राष्ट्रपति यामीन के साथ जुड़े रहे हैं और उनके अलग अनुभव रहे हैं, अब एकसाथ उन्हें हटाने के लिए आ खड़े हुए?

नशीद और कासिम इब्राहिम को मनमौजी और स्वेच्छाचारी राष्ट्रपति के साथ रहने पर सीधा नुकसान उठाना पड़ा है. स्पष्ट तौर पर उनकी लोकप्रियता वर्ष 2013 में कराए गए चुनावों में राष्ट्रपति यामीन से ज्यादा थी.

पूर्व राष्ट्रपति नशीद ने 2013 में धूर्तता और चालाकी से हासिल किए गए लोकप्रिय जनादेश में पराजय को स्वीकार करने का निश्चय किया था. (न्यायपालिका ने चुनावी रेजल्ट्स को अमान्य घोषित कर रखा था जबतक कि नतीजे यामीन के पक्ष में नहीं आ गए थे). इसके बाद मार्च 2015 में नशीद को आतंकवाद के आरोप में जेल भेज दिया गया था. वर्ष 2016 की शुरुआत में वह किसी तरह चिकित्सीय आधार पर लंदन जाने में सफल हो सके. बाद में उन्हें यूनाइटेड किंगडम में शरण दी गई. नशीद वर्तमान में पड़ोसी देश श्रीलंका से मालदीव की घटनाओं का संयोजन कर रहे हैं.

 

राजनीतिक प्रतिशोध


कासिम इब्राहिम ने राष्ट्रपति यामीन के बड़े भाई मौमून अब्दुल गयूम के अनुरोध पर वर्ष 2013 में यामीन का प्रारम्भिक रूप से समर्थन किया था. वह उनकी कैबिनेट में वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुए थे. वह एक साल से कम समय में भी कैबिनेट से अलग हो गए क्योंकि उन्हें अहंकारी और सत्ता के मद में चूर राष्ट्रपति द्वारा अपमानित किया जाना पसन्द नहीं आया.

बाद में जब वह वर्ष 2015 की शुरुआत में नशीद के समर्थन में आए तो वहां उनकी स्थिति एक कैदी जैसी हो गई जहां वह कुछ कर नहीं सकते थे. उनके निकटतम दोस्त और पूर्व रक्षा मंत्री के घर पर छापा मारा गया. उनके दोस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. यह कासिम इब्राहिम को चेतावनी का संकेत था.

जब राष्ट्रपति उनकी लोकप्रियता को किसी भी तरह कुचल न सके तो यामीन ने उनके विशालकाय कारोबारी साम्राज्य को नुकसान पहुंचाने का निश्चय किया और उन पर 100 मिलियन डॉलर का अर्थदंड लगा दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि पर्यटन उद्देश्यों की खातिर आइलैंड की जो भूमि विकसित करने के लिए उन्हें आवंटित की गई थी, उसे उन्होंने कथित रूप से विकसित नहीं किया और इसके चलते देश को नुकसान उठाना पड़ा है.

तथ्य तो यह है कि यह अर्थदंड इसलिए लगाया गया क्योंकि कासिम इब्राहिम ने श्रीलंका के राष्ट्रपति सिरीसेना से मुलाकात की थी. इससे किसी को कुछ नुकसान नहीं हुआ था. कासिम इब्राहिम को तभी क्षमा किया गया जब उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति (जो राष्ट्रपति यामीन के लिए धन संग्रहकर्ता के रूप में जाने जाते थे) से एक समझौता किया और लिखकर दिया कि वह राजनीति छोड़ देंगे.

राष्ट्रपति यामीन इससे भी संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए आयु तय करने वाला एक विधेयक संसद में पेश किया जिससे कासिम इब्राहिम स्वतः ही वर्ष 2018 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने से वंचित हो जाएंगे.

 

स्वेच्छाचारी कामों की लम्बी श्रंखला

 

उनके स्वेच्छाचारी कामों की श्रंखला में सबसे नया काम वह रिपोर्ट है जिसमें सऊदी रायल फैमिली के सदस्यों को फाफू प्रवाल द्वीप बेचने या लीज पर देने का प्रस्ताव किया गया है. इस प्रस्ताव पर सऊदी के शाह सलमान की एक अप्रैल को मालदीव की होने वाली यात्रा के दौरान हस्ताक्षर होने थे.

लेकिन यह यात्रा अचानक स्थगित कर दी गई. अप्रत्याशित रूप से एमडीपी और एकजुट हुए विपक्ष की अगुवाई में प्रदर्शन होना शुरू हो गए. सत्तारूढ़ पार्टी के एक असावधान सांसद की मीडिया में की गई टिप्पणी से समझौते की यह बात जगजाहिर हो गई कि संसद में चर्चा बिना ही यह डील कर ली गई. अब बार-बार स्थानीय परिषदों के चुनाव स्थगित किए जा रहे हैं. 5 मई को होने वाले चुनाव को तीसरी बार स्थगित किया गया है.

 

अभी 27 मार्च को विपक्ष के कई सदस्यों को सेना ने बाहर उठाकर फेंक दिया

सत्तारूढ़ पीपीपी फैमिली अब चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त काउंसलर्स नहीं जुटा पा रही है. राष्ट्रपति की पार्टी (पीपीएम) के काफी लोग विपक्ष के साथ आ गए हैं. उनके पुत्र फारिस मौमून ने भी संसद के स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला दिय़ा. अविश्वास प्रस्ताव पर 27 मार्च को वोटिंग होनी थी. देखा गया कि अप्रत्याशित रूप से सादे कपड़ों में सेना के लोग आए और संसद के विपक्षी सदस्यों को जबरन उठाकर बाहर ले गए. पाशविक और बर्बर सेना के सहारे अविश्वास प्रस्ताव गिर गया.

तथ्य तो यह है कि राष्ट्रपति यामीन अब संसद में अपने सभी गठबंधन सहयोगियों को खो चुके हैं. उन्हें विपक्ष से निपटने के लिए सेना पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इससे यही झलकता है कि कैसे आशाहीन हालात हैं.

 

भारत विरोधी नीतियां

 

नवम्बर 2013 से जब से उन्होंने सत्ता संभाली है, उन्होंने भारत के प्रति कोई मित्रता नहीं निभाई है. उन्होंने पहला काम तो यह किया कि पूर्ववर्ती सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को हवाईअड्डे के निर्माण का जो ठेका दिया था, उसे रद्द कर दिया. उनका दूसरा काम 'मेरिटाइम सिल्क रूट' में शामिल होने की घोषणा करना था. चीन के राष्ट्रपति शी जेनपिंग ने 'वन बेल्ट वन रूट' के नाम से इसका सूत्रपात किया था. चीन को आइसलैंड आवंटित करने का उनका यह फैसला इसलिए था क्योंकि चीन वहां नौसेना का ठिकाना बनाना चाहता था. यह इलाका दक्षिण भारत के नजदीक है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले पर नाखुशी जताते हुए मार्च 2015 में मालदीव की होने वाली प्रस्तावित यात्रा निरस्त कर दी. (इस माह की शुरुआत में पूर्व राष्ट्रपति नशीद को आतंकवादी रोधी अधिनियम के तहत 13 साल की सजा सुनाई गई है) लेकिन हमारे विदेश सचिव की बार-बार की यात्राओं से भी कुछ नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत विदेश नीति का पहला परीक्षण मालदीव था. इसकी घोषणा भी जोर-शोर से की गई थी. लेकिन जब प्रदर्शन का वक्त आया तब न तो हमारे अभियान में मजबूती दिखी और न ही हमारी अभिव्यक्ति में खरापन.

लेकिन अब जबकि मालदीव में 'लोकतंत्र अभियान' चल रहा है और वह मजबूती और समर्थन के लिए भारत की तरफ ताक रहा है, तब क्या नई दिल्ली अपनी रुचियों और सिद्धान्तों पर दृढ़ता दिखाएगा (यह दुर्लभ मामलों में से एक है जहां दोनों पक्ष टकराएंगे) या वह साधारण तरीके से अपने कंधे सिकोड़ लेगा और कहेगा कि यह एक आंतरिक मामला है. हम इसमें दखलंदाजी नहीं करते.

 

First published: 31 March 2017, 8:47 IST
 
रवि जोशी

Retired diplomat, presently a Visiting Fellow, Observer Research Foundation.

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