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अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप नहीं नफ़रत की जीत हुई है

अलीशा मथारू | Updated on: 10 November 2016, 7:35 IST

'एक बुरे सपने से जागने पर पता चला कि यह सच है. डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह दिखा दिया है कि जिस उम्मीदवार से वे पहले नफरत करते थे, आखिरकार उसे जिता दिया है.' ये शब्द अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री, 2016 में राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार और डोनाल्ड ट्रंप से शिकस्त खाई हिलेरी क्लिंटन के हैं. 

हिलेरी क्लिंटन जो वाक़ई अमेरिकी राष्ट्रपति के पद के लायक थीं लेकिन उनकी तक़दीर में जीत नहीं थी. उन्होंने सरकार में रहते हुए अपने देश की कई साल सेवा की है और वह अमेरिकी इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति बनने वाली सबसे मज़बूत उम्मीदवार भी थीं. मगर तमाम ख़ूबियों के बावजूद वह हारीं. उन्हें हराया डोनाल्ड ट्रंप ने.

ट्रंप जो एक सफ़ल अमेरिकी कारोबारी हैं, जिन्हें उनकी महिला विरोधी टिप्पणियों और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन से लेकर दबंग तानाशाहों सद्दाम हुसैन और किम जोंग उन की तारीफों के लिए जाना जाता है. उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को शिकस्त दी है.

तरक्की और ओबामा को ठुकराया

सबसे बुरी बात यह है कि वे उस बराक ओबामा से यह पद ग्रहण कर रहे हैं जिन्होंने अपने देश के नागरिकों की तमाम उम्मीदें पूरी कीं. बेशक़ वे हर कसौटी पर खरे नहीं उतरे लेकिन विश्व के शीर्ष नेताओं में उनकी गिनती की जाती है. सज्जन, मजाकिए, परिवार के आदर्श मुखिया और शांत स्वभाव के ओबामा ने अपने अंदाज़ से पूरे विश्व का दिल जीता.

वे सही बातों के लिए हमेशा तत्पर रहे. उनके नेतृत्व में लाखों अमेरिकियों ने स्वास्थ्य बीमा अपनाया. वित्तीय संस्थाओं की लूट-खसोट से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए नए नियम बनाए. मध्य पूर्व से कई सैनिकों को वापस बुलाया और ओसामा बिन लादेन के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के आदेश दिए. उन्होंने जलवायु परिवर्तन का खतरा कम करने के लिए कई देशों को एकजुट करने में भी महती भूमिका निभाई.

मगर ट्रंप को चुनकर मतदाताओं ने ओबामा के पिछले आठ साल में किए गए उल्लेखनीय कार्यों को नकार दिया. उन्होंने ऐसे इन्सान को ठुकराया जिसने समय के अनुरूप सही कदम उठाए. 20 लाख लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के दायरे में शामिल किया, जलवायु परिवर्तन को एक चुनौती के रूप में लिया और करों में सर्वाधिक कटौती का आह्वान किया. जातीय समूहों से जुड़े लोगों के जबरन प्रत्यर्पण और देश में प्रवेश कर रहे समस्त कट्टर धार्मिक गुटों पर प्रतिबंध लगाने को कहा. 

इससे अधिक यह प्रगति की रफ्तार और महिलाओं को नकारना भी कारण है. क्लिंटन को ठुकराते हुए ऐसे उम्मीदवार को जिताकर मतदाताओं ने यह निश्चित किया है क्लिंटन की संभ्रांतवादी छवि और निजी कमजोरी ट्रंप की मानवीय कमजोरियों से ज्यादा खराब है.

डेमोक्रेट्स के गढ़ में जीत

यह स्थिति और ज्यादा खतरनाक है कि वे फलोरिडा, ओहायो, विस्कोंसिन और यहां तक कि पेंसिलवेनिया जैसे राज्यों में भी अभूतपूर्व अंतर से जीते जहां 1984 के बाद कोई रिपब्लिकन उम्मीदवार विजयी नहीं हुआ था. ऐसे में स्पष्ट तौर पर नारीवाद का मुद्दाा कहीं था ही नहीं.

देश ने अपने को स्वत: को जातिवादी और लिंगभेद बरतने वाला साबित किया है जिससे क्लिंटन जैसी योग्य उम्मीदवार को करारी हार का सामना करना पड़ा. यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने यह भी वादा किया था कि अगर वे राष्ट्रपति चुने गए तो हिलेरी क्लिंटन को जेल में डाल देंगे.

इस मोड़ पर अमेरिका को शर्मिंदगी महसूस करने के कई कारण हो सकते हैं. अधिकांश अमेरिकी यह पता लगाने में विफल रहे कि उनका नया राष्ट्रपति कैसा होना चाहिए. यह हकीकत को नजरअंदाज कर घृणा फैलाने का नतीजा है. ट्रंप के स्त्री विरोधी आरोपों खिलाफ आगे आ रही असंख्य महिलाओं को समझने में मतदाता विफल रहे.

उनकी ओर से लगाए गए आरोपों के चलते ये महिलाएं सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा हुई. दूसरी ओर अपनी मुंहफट बयानबाजी और अनर्गल टिप्पणी के चलते ट्रंप को अप्रत्याशित लाभ मिला. इस विस्मयकारी जीत से इतना तो स्पष्ट है कि अंकों का कोई महत्व नहीं है. स्वीकृत रेटिंग, चुनावी पूर्वानुमान और मतदान की अन्य विशेषताएं कोई मायने नहीं रखती.

प्रत्येक आयु वर्ग के अश्वेत मतदाताओं का स्पष्ट समर्थन क्लिंटन को मिल रहा था लेकिन श्वेत महिलाओं में समर्थन का स्तर शिक्षा की वजह से बंटा हुआ नजर आया. कॉलेज स्तर की शिक्षित महिलाएं क्लिंटन की समर्थक थीं जबकि इससे कम पढ़ी-लिखी अधिकांश महिलाएं ट्रंप को पसंद करती थी. ऐसा लग रहा था कि ट्रंप श्वेत मतदाताओं का वोट नहीं ले पाएंगे परंतु ग्रामीण श्वेत मतदाता सभी प्रमुख राज्यों में उनके पक्ष में वोट दे आए. उनके लिए पितृसत्ता और जातीय वर्गीकरण के अलावा असहिष्णुता और तरक्की के कई मायने हैं. ट्रंप ने अपनी लुभावनी अपीलों से श्वेतों की पीड़ा को उभारने  का काम किया. 

ट्रंप काल

अपने विजयी भाषण मे उन्होंने शुरुआत ही यह कहते हुए की कि वे 'अमेरिका को फिर महान' बनाएंगे. इसके दोहरे अर्थ साफ हैं. एक तो यह कि देश को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे देखा जाना चाहिए और दूसरी ओर असली अमेरिका का मतलब श्वेत अमेरिका के साथ-साथ सांस्कृतिक वर्चस्व भी है.

ट्रंप ने लोगोंं में भय फैलाते हुए यह आशा जगाई कि डेमोक्रेट और लिबरल इसके लायक नहीं हैं. इसलिए रिपब्लिकन पार्टी अब अधिकारिक तौर पर एकमात्र स्वाभिमानी श्वेत पार्टी  है. वह सरकार की तीनों शाखाओं को काबू में रखने में सक्षम है जबकि लिबरल की उपलब्धि पिछले आठ सालों में इन्हें कुचलने की रही है. उनकी उपेक्षा से शायद पूरे विश्व में भी उनकी यही हालत होती. यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप ने कई बार गर्व के साथ परमाणु युद्ध छिड़ने की बात भी कही थी और अब ट्रंप युग का आगाज हो चुका है.

First published: 10 November 2016, 7:35 IST
 
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