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नेपाल की तराई में सुलगता असंतोष

सीके लाल | Updated on: 11 February 2016, 8:36 IST
QUICK PILL
  • नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को दी गई श्रद्धांजलि में सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने यह विचार व्यक्त किया कि नए क़ानून का क्रियान्वयन स्वर्गीय प्रधानमंत्री कोइराला को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी.
  • प्रधानमंत्री केपी ओली जल्द ही भारत की यात्रा कर सकते हैं, नई दिल्ली और काठमांडू में इससे जुड़ी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली संसद में सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष सुशील कोइराला (1939-1916) के निधन ने अब देश के सभी राजनीतिक एजेंडों को पीछे छोड़ दिया है. पिछले साल सितंबर में दिवंगत कोइराला ने संसद के नेता और सरकार के मुखिया के रूप में लगभग सभी मधेसी पार्टियों द्वारा मसौदा दस्तावेज के खिलाफ आपत्तियों के बावजूद नेपाल के संविधान 2015 का ऐलान किया था. 

मधेसी समर्थकोंं का कहना है कि नए संविधान से उनके अधिकारों को बहुसंख्यक दबा रहे हैं. साथ ही बहुसंख्यक अब मधेसियों को दिए गए जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व, सही अनुपात में सत्ता की हिस्सेदारी और राज्य के पुनर्गठन के वादे से भी मुकर गए हैं. 

विवादास्पद संविधान को स्वीकारे जाने के कारण दक्षिणी नेपाल के तराई-मधेस मैदानों में मची हलचल अभी भी जारी है. करीब छह महीनों में भेदभावपूर्ण संविधान के खिलाफ तमाम रैलियों और प्रदर्शनों के चलते सुरक्षा एजेंसियों ने पांच दर्जन मधेशी प्रदर्शनकारियों को गोली मार दी है. 

इस बीच रक्सौल-बीरगंज सीमा पर जारी धरना सुर्खियों में रहा जहां से लगभग 135 दिनों तक काठमांडू में जरूरी माल-असबाब की पहुंच बाधित रही. तमाम घटनाओं के बीच बीते शुक्रवार को भारत-नेपाल सीमा पर बने मैत्री पुल से प्रदर्शनकारियों को दूर हटाया गया और इसके तुरंत बाद यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट (यूएमडीएफ) को नाकाबंदी हटाए जाने की घोषणा करने के लिए मजबूर किया गया.

बावजूद इसके जो खतरा है वो मैदानों के मधेसियों और पहाड़ों की जनजातियों के लिए बहुत वाजिब है

इस बीच तराई-मधेस में विरोध प्रदर्शन के अलावा शासन की अन्य प्राथमिकताएं भी हैं. अपने शोक संदेश में सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने यह विचार व्यक्त किए कि नए क़ानून का क्रियान्वयन स्वर्गीय प्रधानमंत्री कोइराला को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी. यह दृढ़ संकल्प शायद बहुमत को आश्वस्त करने के इरादे से दिया जा रहा है कि देश में कुछ भी बदलने नहीं जा रहा है.

बावजूद इसके जो खतरा है वो मैदानों के मधेसियों और पहाड़ों की जनजातियों के लिए बहुत वाजिब है और दोनों ही इस बात की उम्मीद लगाए हुए हैं कि संविधान संशोधन के जरिये उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा.

इस विवाद को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए भारत सरकार ने एक उच्च स्तरीय राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल को काठमांडू में वहां के नेताओं से बातचीत की प्रक्रिया को फिर से बहाल करने के लिए भेजा था. इसमें मुख्य विपक्षी पार्टियों और सत्ताधारी दल के नेताओं के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी शामिल रहीं. इस यात्रा की शुरुआत सुशील कोइराला के निधन की घोषणा होने के कुछ ही घंटों के भीतर हुई.

श्रद्धांजलि सभा के बाद इस उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल को नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या भंडारी और प्रधानमंत्री केपी ओली ने मुलाकात के लिए बुलाया. ऐसा लगता है कि भारत सरकार की रुचि मौजूदा तराई मधेसी विवाद में समाप्त हो चुकी है और वह मौजूदा वक्त की नजाकत को देखते हुए दोनों देशों के रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहती है. 

प्रधानमंत्री ओली जल्द ही भारत की यात्रा कर सकते हैं और दोनों देशों की राजधानियों में इससे जुड़ी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. यह सब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सलाह को किनारे रखते हुए किया जा रहा है जिसमें उन्होंने नेपाल को सलाह दी थी कि सभी पक्षों को भरोसे में लेते हुए आगे बढ़ें. कोई भी यह समझ नहीं पा रहा है कि इस नाकाबंदी की क्या जरूरत थी. 

अपूर्ण लक्ष्य

नेपाली मीडिया में आर्थिक प्रतिबंध और नाकाबंदी के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद रक्सौल-बीरगंज सीमा पर कुछ ही दिनों के अंदर यह नाकाबंदी दम तोड़ने लगी थी. इसकी तीन प्रमुख वजहें रही. 

पहला, कस्टम पोस्ट पर नेपाल के हिस्से में ट्रकों की गिनती सामान्य पायी गई और भैरावां, नेपालगंज और बिराटनगर जैसे शहरों में जरूरी सामानों की आपूर्ति एकदम सामान्य पायी गई. दूसरा, काठमांडू के राजमार्ग पर ट्रकों के जाम की असल वजह चितवन नेशनल पार्क और थोरी के चोर रास्तों को नेपाली सेना द्वारा पूरी तरह से सील करना रहा.

अंतिम बात, जहां कहीं आपूर्ति में थोड़ी बहुत कमी थी भी वहां पर लोग स्वेच्छा से बढ़ी हुई कीमतों को चुकाने के लिए तैयार थे. हालांकि यह कमी बनावटी थी. कई मामलों में यह भी देखने को मिला कि खुद सरकारी एजेंसियां भी इसे बढ़ावा दे रही थीं. जनवरी के अंत तक तथाकथित नाकाबंदी मजाक बन कर रह गई थी. लोग इसका इस तरह से मजाक उड़ाने लगे कि रेस्त्रां में नाकाबंदी का मेनू आ गया, सड़कों पर जाम को भी नाकाबंदी जाम कहा जाने लगा. 

शायद नई दिल्ली ने भी अपनी नीति पर पुनर्विचार किया और उसे लगा कि लंबे वक्त तक ऐसी स्थिति उसके लिए भी नुकसानदेह हो सकती है. लिहाजा भारत सरकार ने अपनी चिंताओं को यूडीएमएफ के नेताओं तक पहुंचा दिया. बिहार सरकार भी चंपारण और मोतिहारी के व्यापारी वर्ग के भारी दबाव में थी क्योंकि इस कथित नाकाबंदी की वजह से रक्सौल-बीरगंज सीमा से होने वाला व्यापार उत्तर प्रदेश के गोरखपुर-बहराइच सीमा की तरफ शिफ्ट हो सकता है.

यूडीएमएफ के नेता जब लालू यादव से पटना में मिले तो उन्होंने शायद इस चिंता से उन्हें अवगत कराया था. दूसरी तरफ इस दौरान नेपाल का सत्ताधारी वर्ग इस बात पर दृढ़ रहा कि विरोधियों को हर कीमत पर पूरी तरह से थका देना है. 

नागरिकता में भेदभाव जो इस विवाद की सबसे बड़ी जड़ थी, उसमें अभी भी कोई बदलाव नहीं किया गया

एक बार नेपाल के सत्ताधारी वर्ग ने काठमांडू में जब यह महसूस कर लिया कि नई दिल्ली का धैर्य और यूडीएमएफ का दवाब अगर ज्यादा दिनों तक खिंचा तो उसके लिए आगे मुसीबत खड़ी हो सकती है. जैसा की अनुमान था यूडीएमएफ के नेता उसी तरह लड़ रहे थे जैसे किसी हारी हुई सेना के सेनापति आपस में लड़ते हैं. 

सद्भावना पार्टी के चेयरमैन राजेंद्र महतो जिन्होंने रक्सौल-बीरगंज मैत्री सेतु को जाम कर रखा था उनपर आरोप लगने लगा कि उन्होंने इस जाम को खत्म करवाया. उनका तर्क यह था कि या तो सभी प्रवेश मार्गों पर जाम लगाया जाए या सभी को खोल दिया जाए. 

महतो के इस तर्क से फेडरल सोशलिज्म फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेंद्र यादव और तराई मधेसी सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष महेंद्र यादव सहमत नहीं थे. तराई मधेसी डेमोक्रेटिक पार्टी के मुखिया और यूडीएमएफ के प्रतिष्ठित नेता महंत ठाकुर भी इससे नाखुश थे. कहने का मतलब यह है कि मधेसी आंदोलन से जुड़ी सभी पार्टियों के बीच जबर्दस्त उठापटक मची थी.

इसका उल्टा हमें काठमांडू में देखने को मिल रहा था जो कि इस घटनाक्रम को अपनी जीत के तौर पर देखते हुए उत्सव मना रहा था. भले ही यह खुशी थोड़े वक्त के लिए ही रही हो. तराई के मधेसियों में असंतोष का भाव बना हुआ है और इसके अप्रत्याशित नतीजे सामने आ सकते हैं. इसका दुष्प्रभवा नेपाल की राजनीतिक स्थिरता पर पड़ेगा.

अधूरी इच्छाएं

बहुचर्चित संविधान संसोधन को एकतरफा पास कर दिया गया और जो पक्ष इससे नाराज और असंतुष्ट थे उनकी शिकायतें जस की तस बनी रहीं. भारत ने तुरंत ही इसका यह कहते हुए समर्थन किया कि यह बदलाव सही दिशा में लिया गया कदम है. जबकि यह नए बदलाव मधेसी और जनजातियों की पुरानी चिंताओं को दूर करने में असफल रहे. नागरिकता में भेदभाव जो इस विवाद की सबसे बड़ी जड़ थी, उसमें अभी भी कोई बदलाव नहीं किया गया है. 

भौगोलिक दायरे को जनप्रतिनिधित्व का मुख्य आधार बनाया गया. इसके आधार पर मधेसी इलाकों में केवल 20 जिले आते हैं जबकि पहाड़ी इलाकों में 50. लेकिन इन 50 जिलों में नेपाल की आधी से कम आबादी रहती है और बाकी इन 20 जिलों में. नेपाल के उच्च सदन में स्थितियां और भी बुरी हैं. मधेसियों का केवल एक प्रांत है और एक प्रांत से सिर्फ आठ प्रतिनिधि चुने जाने की सीमा है. इसमें भी जनसंख्या को नजरअंदाज कर दिया गया है. इसका नतीजा यह हुआ है कि मधेसी हमेशा के लिए एक छोटे समुदाय के रूप में सीमित हो गए हैं. इसे इस तरह से देखा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश और सिक्किम बराबरी की संख्या में राज्यसभा में सांसद भेजें, जोकि तार्किक नहीं है. 

इस संशोधन में सभी समूहों के आनुपातिक समावेश का जो लक्ष्य था वो भी पूरा नहीं हुआ. इस संसोधन से सिर्फ नाममात्र की चीजें ही बदलेंगी और असल नियंत्रण नेपाल के मौजूदा सत्ताधरियों के पास ही रहेगा. इससे भी बड़ी बात यह रही कि विरोध कर रही मधेसी पार्टियों के साथ जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे उसके मुताबिक प्रांतों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण का मामला जस का तस बना हुआ है. इसकी गारंटी भारतीय उच्चायुक्त ने भी मधेसियों को दी थी. 

मधेसी पार्टियों के नेता लगातार यह कह रहे हैं कि वे बार-बार खोखले वादों पर भरोसा नहीं करेंगे. इस बार के संशोधन से तो मौजूदा सत्ताधारी वर्ग ने मधेसियों के लिए कोई सम्मानजनक रास्ता भी नहीं छोड़ा है. 

इसे इस तरह से देखा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश और सिक्किम बराबरी की संख्या में राज्यसभा में सांसद भेजें, जोकि तार्किक नहीं है

यह गफलत लंबे वक्त तक बने रहने की आशंका है. अपने अस्तित्व के लिए मधेसी पार्टियों को अपने क्षुद्र राजनीतिक हितों से ऊपर उठना पड़ेगा और मधेसियों के हितों को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाना होगा. फिलहाल भले ही यह नाकाबंदी और विरोध थमता दिख रहा हो लेकिन जब तक मधेसियों की शिकायतें बनीं हुई हैं. इनके दोबारा से सिर उठाने की संभावनाओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता. 

इसमें हिंसक संघर्ष की भी बहुत संभावना है. एक किशोर जो कि तराई के इलाके में ई-रिक्शा चलाता है पिछले रविवार को किसी से बातचीत कर रहा था, "हमारे हाथ में सिर्फ लाठी है, सरकार के हाथ में बंदूक है. असमान ताकत के रहते समान अधिकार की कल्पना असंभव है. हमें भी बराबरी के लिए बंदूक चाहिए." 

अभी भी बहुत देर नहीं हुई है. जब प्रधानमंत्री ओली भारत के दौरे पर दिल्ली आएंगे तब उन्हें प्यार से इस बात को समझाना होगा कि हिंसक टकराव की जो संभावनाएं हैं वे इतिहास का हिस्सा भले ही न बन पाएं लेकिन वह आने वाले वक्त में शांति और साझा संस्कृति के लिए बड़ा खतरा हैं.

First published: 11 February 2016, 8:36 IST
 
सीके लाल @CatchNews

The writer is a noted journalist and political columnist from Nepal.

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