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अमेरिकी सरकार का इंटरनेट पर और अधिक नियंत्रण नहीं

साहिल भल्ला | Updated on: 3 October 2016, 7:08 IST

इंटरनेट अब थोड़ा बदलने वाला है. हालांकि इसके नतीजे फौरी तौर पर शायद न दिखे और न ही इसके इस्तेमाल के तरीके में कोई खास अंतर दिखे. लेकिन यह बदलाव महत्वपूर्ण है. शायद अब तक का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव. एक अक्टूबर, शनिवार, रात 12.01 एएम ईएसटी यानी ईस्टर्न स्टैंडर्ड टाइम पर इंटरनेट की दुनिया बदल जाएगी.

अमेरिकी सरकार अब इंटरनेट असाइन्ड नम्बर्स अथॉरिटी (आईएएनए) के अनुबंध से पीछे हट रही है. पिछले 20 सालों से भी अधिक समय से अमेरिका का इंटरनेट पर आंशिक नियंत्रण जारी था (1988 से अमेरिका ही सारे एड्रेस बुक का पहला प्रबंधक बना हुआ था) पर लगता है अब यह एकाधिकार खत्म होने वाला है. अनुबंध के अनुसार, ‘पिछले 20 सालों से इंटरनेट का प्रारूप और उसकी तरक्की की दिशा अमेरिका ने ही तय की है.’

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेकिा इंटरनेट का मालिक है. अब तक तो कोई इंटरनेट का मालिक नहीं है. यह एक तरह का खुला नेटवर्क है. बिट्स और इंटरनेट के कुछ अंश अलग-अलग सरकारों द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं.

इंटरनेट का मालिकाना हक

अब इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स (आईसीएएनएन) गैर लाभकारी संगठन के तौर पर इंटरनेट संभालेगा. जैसा कि फॉर्च्यून की वेबसाइट पर कहा गया है- ‘आईसीएएनएन कैलिफोर्निया का एक गैर लाभकारी संगठन शीर्ष स्तर के डोमेन नेम जैसे डॉट कॉम, डॉट नेट के डेटाबेस का प्रबंधन करता है. साथ ही उनके आपसी संवाद के न्यूमैरिक एड्रेस का भी, जो कम्प्यूटरों को आपस में जोड़ता है.'

अमेरिकी वाणिज्य विभाग की एक इकाई नेशनल टेलीकम्युनिकेशन एंड इंफोर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (एंटिआ) डोमेन नेम के लिए अधिकृत है. हालांकि 1998 से आईसीएएनएन ही मुख्य रूप से इंटरनेट चला रहा था और उन्हें इंटरनेट का पूरा नियंत्रण दिए काफी समय हो गया था.

1998 में एंटिआ ने कहा था कि वह बदलाव के प्रति प्रतिबद्ध हैं. 2014 में वाणिज्य विभाग ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि वह आईसीएएनएन के साथ काम करना चाहता है और बदलाव की योजना भी तैयार करेगा. अरसे से तय बदलाव का रास्ता अब साफ हो गया है. एनबीसी न्यूज ने लिखा, ‘आईसीएएनएन के अनुसार, इस बदलाव के निर्णय से पहले 33,000 से ज्यादा ईमेल किए गए और बैठकों में 800 घंटे से अधिक का समय लगा.'

अमेरिकी वाणिज्य विभाग इंटरनेट पर अपना नियंत्रण छोड़ देगा. बदलाव के इस निर्णय को टालने के लिए टेक्सास में एक मुकदमा दायर किया गया था, जिसे एक फेडरल जज ने खारिज कर दिया था. मुकदमें में दलील दी गई थी कि इससे डॉट मिल और डॉट जीओवी (सैन्य और सरकारी डोमेन) के प्रभावित होने की आशंका है.

क्रियान्वयन

आलोचकों का मानना है कि इस बदलाव से मुक्त संवाद पर रोक लग जाएगी. मुकदमें में एक दलील यह दी गई कि यह हस्तांतरण असंवैधानिक है और लागू करने से पहले इस पर कांग्रेस की मंजूरी लेनी आवश्यक है.

डोनाल्ड ट्रम्प और टैड क्रूज जैसे आलोचकों ने कहा, अधिकार के हस्तांतरण का मतलब है इसे चीन और रूस को सौंपना. बल्कि क्रूज ने सवाल किया कि क्या आईसीएएनएन अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन (अभिव्यक्ति की आजादी) का पालन करने को तैयार है, इसका साफ जवाब मिला नहीं.

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे इंटरनेट यूजर्स पर निगरानी करने वाला संगठन बदल जाएगा. अब यह एक मल्टी साझेदारी वाले गैर लाभकारी संगठन के हाथ में है. यह संगठन वेब के नेमिंग सिस्टम पर अकादमिकों, तकनीकी विशेषज्ञों, कम्पनियों, जनहित के समर्थकों, व्यक्तियों और राज्यांे की राय लेगा.

हालांकि हस्तांतरण अच्छा कदम है, एक बात यहां गौर करने लायक है. आईसीएएनएन और अमेरिकी वाणिज्य विभाग दोनोें ही इंटरनेट को नियंत्रित नहीं करते.

डीएनएस

डीएनएस का मतलब है डोमेन नेम सिस्टम और इंटरनेट इसे अगले स्तर ले जाने के लिए जरूरी है. डीएनएस जटिल नंबर को आसानी से याद रखे जाने वाले नाम देता है. गॉड ऑफ इंटरनेट जॉन पेस्टल डीएनएस के मूल कर्ता-धर्ता थे. जब इंटरनेट थोड़ा लोकप्रिय होने लगा पेस्टल इसे अकेले संभाल नहीं पाये. इसी वजह से आईएएनए बना.

आईएएनए का नियंत्रण 1998 में आईसीएएनएन को दे दिया गया था. आईसीएएनएन को स्वतंत्र संगठन माना गया लेकिन इस पर सरकार का नियंत्रण तो रहा ही.

आईएएनए के किसी भी कदम पर वाणिज्य विभाग का निर्णय अंतिम होगा. असली बहस की वजह यही है. भले ही इस अधिकार का प्रयोग कितना ही सावधानी से किया जाय, ये है तो महत्वपूर्ण.

शायद यह बदलाव अच्छा ही हो. खैर इंटरनेट की कम उम्र में यह महत्वपूर्ण कदम है.

First published: 3 October 2016, 7:08 IST
 
साहिल भल्ला @IMSahilBhalla

Sahil is a correspondent at Catch. A gadget freak, he loves offering free tech support to family and friends. He studied at Sarah Lawrence College, New York and worked previously for Scroll. He selectively boycotts fast food chains, worries about Arsenal, and travels whenever and wherever he can. Sahil is an unapologetic foodie and a film aficionado.

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