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दुनिया को अशांति और असुरक्षा की आग में झोंक रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप

पिनाक रंजन चक्रवर्ती | Updated on: 2 February 2017, 8:24 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

यह अटकलें जोरों पर हैं कि अमरीका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने प्रचण्ड चुनावी अभियान के दौरान जो वादे किए थे, वे उन वादों को हकीकत में कैसे बदलेंगे. कोई भी इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं है कि ट्रम्प प्रशासन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से किस तरह निपटेगा. वह धीरे-धीरे और दृढ़तापूर्वक अपने पत्ते खोलते जा रहे हैं.

ट्रम्प को लेकर यह कहने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने गूढ़ सवालों की पहेली को छुपाकर या किसी आवरण में लपेटकर रखा है. उन्होंने एक झटके में अपनी नीतियों के रोडमैप का आभास दे दिया है. पद संभालने के तुरन्त बाद ही उन्होंने संवेदनशील मुद्दों पर 10 एक्जीक्यूटिव ऑडर्स जारी कर दिए. इन आदेशों में अप्रवास नीति, सीमा पर दीवार बनाना, स्वास्थ्य सुविधाएं और व्यापार की नीतियां शामिल हैं.

अप्रवास नीति पर अस्थाई रोक

राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी कर सात मुस्लिम बहुल देश, जिसमें पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के देश हैं, से अमरीका आने वाले शरणार्थियों और अप्रवासियों पर अस्थाई रोक लगा दी है. उनके इस आदेश से अमरीका के हवाईअड्डों पर अराजक स्थिति उत्पन्न हो गई. अस्पष्ट आदेशों के चलते हवाईअड्डे के अधिकारियों ने पर्यटकों का भी प्रवेश रोक दिया.

एक्जीक्यूटिव ऑर्डर में अधिकांश मुस्लिम देशों से आने वाले रिफ्यूजियों पर भी शिकंजा कसा गया है. ट्रम्प ने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों का नाम लेकर कहा है कि इन देशों से अमरीका आने वाले नागरिकों को वीजा जारी करने में कठोर मानक अपनाए जाएंगे. ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि ये देश अपने इलाके से आतंकियों का नेटवर्क चला रहे हैं या आतंकी संगठनों को समर्थन दे रहे हैं.

उनके इस कार्यकारी आदेश की अमरीकी जनता, उद्योग और अदालतों में कड़ी आलोचना हुई है. हॉलीवुड, अकादमिक क्षेत्र और आईटी की बड़ी कम्पनिय़ां जैसे गूगल, फेसबुक कर माइक्रोसॉफ्ट सभा ने इस कार्यकारी आदेश की कड़ी आलोचना की है. नई अप्रवासी नीति और और मुस्लिमों के प्रवेश को कड़ा करने के खिलाफ सड़कों पर व्यापक प्रदर्शन भी हुए हैं.

कई संघीय अदालतों ने कार्यकारी आदेशों के प्रावधानों, जिसमें वैध वीजा रखने वालों ग्रीनकार्ड धारकों और पर्यटकों का प्रवेश प्रतिबंधित किया गया है, पर अंतरिम रोक लगा दी है. इस स्थिति से हवाईअड्डों पर संदेह, तकलीफ, उथल-पुथल और अराजकता का माहौल उत्पन्न हुआ है.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस आदेश की व्यापक प्रतिक्रिया हुई है. हालांकि, यूरोप के देशों और आस्ट्रेलिया के कई दक्षिणपंथी समूहों ने ट्रम्प के इस कदम को अपना समर्थन दिया है. इन देशों ने मांग की है कि उनके देश में आने की कोशिश करने वाले मुसलमानों पर भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाए जाएं. 

अन्य कार्यकारी कार्रवाईयां

पद संभालने के तुरन्त बाद ट्रम्प ने जो कार्यकारी आदेश जारी किए है, वह उनके 100 दिन के विजन को परिलक्षित करते हैं जो उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में जारी किए थे कि वे अपने कार्यकाल के पहले सौ दिनों में क्या करेंगे.

अब तक उन्होंने जिन कार्यकारी आदेशों पर अपने दस्तखत किए हैं, उसमें मैकिस्को सीमा पर दीवार बनाना शामिल है ताकि मैकिस्को के रास्ते से अवैध प्रवासी उनके देश में न आ सकें. दीवार बनाने के वादे को अपने चुनाव अभियान में वह बार-बार दोहराते रहे हैं. इन आदेशों में कर्मचारियों की और ज्यादा सीधी भर्ती करना शामिल है. इस आदेश से और ज्यादा सरकारी नौकरियां पैदा होंगी.

आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर भी ट्रम्प ने नियामकों पर पुनर्विचार करने के आदेश जारी किए है. इसमें सैन्य और जनसुरक्षा के महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर मैन्यूफैक्चरिंग लाइसेंस, पाइपलाइनों में अमरीका निर्मित स्टील का उपयोग, ढांचागत परियोजनाओं (गैस और ऑयल पाइपलाइन समेत) पर पुनर्विचार की बात कही गई है. अन्य घरेलू मुद्दों में गर्भपात के लिए सरकारी फंडिंग, ओबामा के हेल्थकेयर प्रोग्राम को वापस लेना आदि शामिल है.

ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) यानी सामरिक भागीदारी से जुड़ा समझौता भी अस्वीकार कर दिया गया है और अमरीका ने सभी संधियों से अपने हाथ खींच लिए है. अमरीका अब किसी भी नई संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा. बताते चलें कि टीपीपी एक मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें 12 देश ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, चिली, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूजीलैंड, पेरू, सिंगापुर, अमरीका और वियतनाम शामिल हैं. व्यापार मुद्दों और मैकिस्को पर दीवार बनाने के मुद्दे पर आग भड़क उठी है.

उधर, सीमा पर दीवार बनाने को लेकर अमरीका और मैक्सिको के सम्बंधों में साफ तौर पर तनाव देखने को मिल रहा है. डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ट्वीट में कहा है कि दीवार बनाने की लागत का भुगतान मैकिस्को को करना होगा, पर मैकिस्को के राष्ट्रपति किसी भी तरह का भुगतान करने के प्रति अनिच्छुक हैं. मैकिस्को के राष्ट्रपति ने अपनी वाशिंगटन यात्रा भी निरस्त कर दी है, जबकि मैक्सिको के विदेश मंत्री लूइस विदेगरेय कई मुद्दों पर संधियों के लिए अमरीका में थे.

ट्रम्प के कार्यालय ने यह भी संकेत दिए हैं कि दीवार बनाने के लिए मैक्सिको से आयातित समानों पर भी 20 फीसदी का कर लगाया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा असर करदाताओं पर पड़ेगा. यह तो निश्चित है कि इससे तेल के दाम बढ़ेंगे और अमरीकी उपभोक्ताओं को इसका भुगतान करना पड़ेगा. ट्रम्प के कार्यालय ने यह नहीं कहा है कि कई विकल्पों में से आयात कर ही एकमात्र विकल्प है.

सवाल यह है कि क्या यह उथलपुथल सोची-समझी चाल है? क्या ट्रम्प जानबूझकर विचार कर के यह अराजकता, गड़बड़ी और तकलीफें पैदा कर रहे हैं ताकि उनका प्रशासन व्यापार और अप्रवास मुद्दों पर नई संधियां कर सके?

कई लोगों का मानना है कि यह उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. यदि ट्रम्प प्रशासन 'बाई अमरीकन और हायर अमरीकन' उद्देश्यों को लेकर छूट की मांग करता है तो नए व्यापार समझौता का दबाव निश्चित रूप से कनाडा और मैकिस्को पर पड़ेगा. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रम्प प्रशासन किस तरह से नाफ्टा के साथ फिर से मोल-तोल करेगा.

नाफ्टा से अलग होने का आघात सभी तीनों देशों-कनाडा, मैकिस्को और अमरीका की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा. अमरीका के लिए कनाडा और मैक्सिको सबसे बड़े निर्यात वाले देश हैं. अभी यह समझ से बाहर है कि नाफ्टा से अलग होने से अमरीका कैसे लाभ में रहेगा. 

बताते चलें कि नाफ्टा देशों के साथ व्यापार रोजाना 03 बिलियन डॉलर से अधिक का है. यहां यह याद रखना चाहिए कि 1930 के दशक में जो मंदी का दौर आया था, उसके पीछे निर्यात पर बिना सोचे-समझे दंडात्मक कर लगाना ही था. इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में मंदी आ गई और बाजार गिरता गया.

ट्रम्प की चीन नीति

ट्रम्प की चीन नीति कैसी होगी, यह अभी भविष्य के गर्भ में है. यदि वह अपने चुनावी वादों के अनुसार चलते हैं तो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रति वैश्विक चिढ़ ही उत्पन्न होगी. ट्रम्प ने अपने निशाने पर जापान और मैकिस्को को भी लिया है. यदि ट्रम्प अपनी संरक्षणवादी नीतियों को जारी रखते हैं तो इससे वैश्विक मंदी का खतरा निश्चित रूप से उत्पन्न होगा. इसका असर अमरीका के साथ ही सभी देशों पर सीधे पड़ेगा. इससे जीडीपी में गिरावट आएगी. टीपीपी का स्वरूप बिगाड़ देने का प्रभाव एशिया-प्रशान्त देशों के व्यापार पहलुओं पर पड़ेगा. इससे तो चीन के शोषण करने वाले दरवाजे और खुल जाएंगे.

भारत पर असर

ट्रम्प की नीतियों से रीजनल कम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप जिसमें एशिया प्रशान्त क्षेत्र के 16 देश, (10 एशियाई देशों के साथ ही भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया शामिल हैं) को बढ़ावा मिलेगा. भारत और चीन टीपीपी में नहीं हैं और अमरीका रीजनल कम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप से अलग हो गया है.

यदि यह मेगा ट्रेड डील अमल में आती है तो यह विश्व में सबसे बड़ा ट्रेडिंग ब्लॉक होगा. 3.4 अरब लोगों की आबादी के साथ जीडीपी 17 ट्रिलियन डॉलर की है. विश्व के 40 फीसदी व्यापार में इन देशों की हिस्सेदारी है. आरसीईपी पर बातचीत तीन सालों से चल रही है. चीन 'वन बेल्ट, वन रोड' और सिल्क रोड के लिए खरबों डॉलर का निवेश कर चुका है. आरसीईपी एशियाई और यूरोपीय देशों के लिए और ज्यादा आकर्षक साबित होगा.

चीन पहले से ही क्षेत्र में अपना भारी माल उतार रहा है और भारत चीन के साथ भारी व्यापारिक असंतुलन से जूझ रहा है. चीन के बाजार में भारत अपने उत्पादों और सेवाओं को लेकर कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. भारत को सेवा क्षेत्र में बेहतर लाभ मिल सकता है और वह इसकी आस में भी है. हालांकि, भारत ट्रम्प के राडार स्क्रीन पर नहीं है. जहां तक सेवा क्षेत्र में विपरीत व्यापार असंतुलन का सवाल है तो भारत आईटी और बीपीओ क्षेत्र में सीधे निशाने पर रहेगा.

पिछले दशक में अमरीका-भारत सम्बंध चढ़ाव पर रहे हैं. भारत की रक्षा जरूरतें तेजी से बढ़ती जा रही हैं. अमरीकी की ताकतवर सैन्य औद्योगिक लॉबी इसमें संतुलन की भूमिका निभा सकती है. पिछले दशक में अमरीका के लिए भारत सबसे बड़े रक्षा उपकरणों के साझेदार के रूप में उभरा है.

कॉरपोरेट लॉबी किस तरह से ट्रम्प के पंख कतर सकती है? अनेक लोगों का विश्वास है कि अमरीका की कॉरपोरेट लॉबी और ब्यूरोक्रेसी ट्रम्प के भयानक विचारों को लगे पंखों को कतर सकती है क्योंकि यदि ट्रम्प अपने विचारों के चलते सभी देशों से दुश्मनी मोल लेते चले जाते हैं तो आर्थिक उद्देश्य हासिल नहीं किए जा सकते.

इसका क्या परिणाम निकलेगा, यह तो भविष्य की बात है, पर हम वैश्विक राजनीति के एक ऐसे चरण में प्रवेश कर रहे हैं जहां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से संसार में सिरमौर बना देश अपनी नीतियों को लेकर मंथन कर रहा है. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमरीका अपने निशानों पर सभी को नचाता रहा है. बहरहाल, हम समय का ऐसा सूत्रपात होते देख रहे हैं कि भविष्य में किस तरह से वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक क्रियाकलाप आकार लेते हैं.

First published: 2 February 2017, 8:24 IST
 
पिनाक रंजन चक्रवर्ती @catchnews

फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली. भारत के पूर्व विदेश सचिव, बांग्लादेश के पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और थाईलैंड में पूर्व भारतीय राजदूत रह चुके हैं.

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