Home » इंटरनेशनल » Trump & Modi: Two faces of one coin
 

ट्रंप और मोदी: एक सिक्के के दो पहलू पर कुछ जुदा-जुदा से

द कन्वर्सेशन | Updated on: 18 January 2017, 8:00 IST
QUICK PILL
  • 20 जनवरी से दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में एक नए राष्ट्रपति का कार्यकाल शुरू हो जाएगा. इसे अमेरिका में एक नए सियासी अध्याय की शुरुआत भी माना जा रहा है. नए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को आक्रामक, नस्लवादी और शुद्धतावादी माना जाता है. उनके बयान बार-बार इस बात का इशारा करते हैं कि दुनिया और अमेरिका अब पहले जैसी नहीं रहेगी.
  • लगभग इसी तरह के बदलाव और संक्रमण से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत भी गुजर रहा है. प्रधानमंत्री के रूप में भारत के पास एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने विचारों में बेहद आक्रामक, शुचितावादी और कट्टर रवैया दिखाते हैं. उनके कई विचार अक्सर भारत के विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था से अलग और खिलाफ जाते नजर आते हैं.
  • इन दो शख्सियतों में वैचारिक लिहाज से कई समानताएं है लेकिन सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक धरातल पर दोनों हस्तियां कई विरोधाभासी चरित्र समेटे हुए हैं. एक आकलन दोनों की समानताओं और विषमतां का:  

अमरीका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप का चुनाव एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में वैश्विक स्तर पर दक्षिणपंथ की स्थापना की तरफ़ इशारा करता है. इसलिए ट्रंप से दो साल पहले भारत की राजनीति में उभरने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की तुलना एक तरह से अपरिहार्य है. इन दोनों ही नेताओं में एक-दूसरे के प्रति सराहना और तालमेल का भाव देखा जा सकता है. 

दोनों ही नेता अपने वोटरों के बीच भारी लोकप्रिय हैं. मोदी हिंदु राष्ट्रवादियों के बीच और व्हाइट सुपरमेसिस्ट (गोरे लोग सबसे श्रेष्ठ) सोच को मानने वाले समर्थकों के बीच ट्रंप. दोनों ही नेताओं की मौजूदगी ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है. इनकी कार्य योजना में लोगों को बांटने वाली बातें गहरे तक मौजूद रहती हैं. इन सारी समानताओं के बावजूद, इनमें कई बेहद आधारभूत भिन्नताएं भी देखी जा सकती हैं.

समानताएं

सबसे पहले समानताओं की बात करते हैं. मोदी और ट्रंप दोनों ही बेहद समर्थ वक्ता हैं, जो कि अपने को श्रोताओं के साथ जोड़ना अच्छी तरह से जानते हैं. लच्छेदार, आलंकारिकता के साथ अपने भाषणों में वे लोगों में व्याप्त असंतोष को मौजूदा सरकार के साथ जोड़ना अच्छी तरह से जानते हैं. अपना एजेंडा लोगों के गले उतारने के लिए वे व्यंग्य और खिल्ली का भरपूर सहारा लेते हैं. दोनों ही अपने को एक ऐसे मजबूत नेता के रूप में पेश करते हैं जो हर समस्या का इलाज करना जानता है.

मोदी का पूरा चुनावी अभियान तथाकथित सफल गुजरात मॉडल की चर्चा से भरा रहता था. इस चर्चा में पश्चिम भारत के उस समृद्ध राज्य गुजरात के कायापलट का बखान किया जाता है जहां मोदी ने एक दशक से अधिक समय तक शासन किया. इसी तरह ट्रंप ने भी अपने कारोबारी कौशल को खूब गाना गाया. ट्रंप ने अपनी कई आर्थिक सफलताओं को रेखांकित करते हुए अपने को सफल डील करने वाले एक मजबूत लीडर के रूप में पेश किया. सबसे दु:खद यह कि, दोनों ही नेताओं ने अपना चुनावी अभियान धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के विरोध में चलाया.

बड़े कारोबारियों का समर्थन

दोनों ही बेहद चतुर रणनीतिकार हैं. उन्होंने फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली की कमियों का अपने फायदे के लिए जमकर दोहन किया. उन्होंने इस तरह की रणनीति बनाई कि उन्हें भले ही कुल लोकप्रिय वोटों में अल्पमत का समर्थन ही हासिल हुआ हो. मोदी और उनके गठबंधन को 40 प्रतिशत से कम लोकप्रिय वोट मिले जबकि ट्रंप को 46.7 प्रतिशत वोट हासिल हुए. इसके बावजूद उन्हें विधायिका में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और वे अपनी पार्टी को बेहतरीन जीत दिलाने में सफल रहे.

इन दोनों नेताओं में समानता का सबसे अहम बिंदु है कारोबरी हितों का समर्थन करना. मोदी और भारत के शीर्ष कारोबारियों में घनिष्ठ संबंध हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है. विशेषकर दो व्यापारिक घरानों अंबानी और अडाणी से मोदी के निकट संबंध तो जगजाहिर हैं.

आर्थिक और सामाजिक अल्पसंख्यक समूहों में इन नेताओं के प्रति अब भी संशय बना हुआ है

ट्रंप भी अमेरिका भर में फैली लगभग 500 के करीब बिजनेस इकाईयों से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं और बिजनेस हितों के प्रति उनका रवैया नरम है, यह साफ देखा जा सकता है. लेकिन दोनों ही नेताओं ने बड़े कारोबार से अपने संबंध को इतनी सावधानी से गढ़ा और पेश किया है कि वह दोनों देश के मध्यम वर्ग को रास आता है.

मोदी एक सुस्थापित राजनेता थे और उनके हालिया उभार के पीछे बड़े कारोबारी रहे हैं. ट्रंप भी प्रभावशाली लोगों से करीबी से जुड़े एक बिजनेसमैन हैं जिनकी शासन-प्रशासन में भी गहरी पैठ रही है, चाहे वह क्लिंटन का दौर रहा हो या बुश का. यह तथ्य मीडिया को बहकाने और पूर्वाग्रह पोषित जनभावनाओं का दोहन करने की इन नेताओं की क्षमताओं का प्रमाण है.

आर्थिक और सामाजिक अल्पसंख्यक समूहों में इन नेताओं के प्रति अब भी संशय बना हुआ है. निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि वे सभी लोग जिन्होंने इन नेताओं को वोट दिया है वे हिंदू श्रेष्ठता या गोरे राष्ट्रवादियों के समर्थक ही हैं. पर यह सही है कि आर्थिक और सामाजिक अल्पसंख्यक इन नेताओं से प्रभावित नहीं हैं. 

साल 2014 में मोदी की भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 24 प्रतिशत गरीबों और 31 प्रतिशत कामगरों ने समर्थन दिया था, जबकि 38 प्रतिशत उच्च वर्ग मोदी के साथ था. भारत की उच्च जातियों में 55 प्रतिशत ने मोदी को वोट दिया, जबकि मात्र 25 प्रतिशत दलितों के ही वोट मोदी को मिल सके. मुस्लिमों में मात्र सात प्रतिशत ने ही मोदी को वोट दिया.

सीएनएन के पहले एग्जिट पोल को देखें तो अमरीका के 2016 के राष्ट्रपति पद के चुनाव में अधिकांश सुविधा-संपन्न लोगों ने ट्रंप को वोट दिया जबकि गरीबों में अधिकांश ने ट्रंप के विरोध में वोट दिया. मोदी और ट्रंप उस सत्ता-प्रतिष्ठान के विरोध में अभिजन वर्ग की क्रांति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो कि अब विशेषाधिकार प्राप्त समूहों के हाथ से बाहर निकल चुका था.

भिन्नताएं

सामाजिक धरातल को जो अंतर मोदी और ट्रंप के बीच है, वह बहुत बड़ा है. मोदी का जन्म पश्चिम भारत के ग्रामीण क्षेत्र में एक किराना की दुकान चलाने वाले परिवार में हुआ था और वे रेलवे स्टेशन पर अपने पिता के साथ चाय बेचकर बड़े हुए हैं. जबकि ट्रंप का जन्म एक बेहद संपन्न परिवार में हुआ और उनको उनका भाग्य विरासत में मिला. इन दोनों के जीवन की यह यात्रा भारत और अमरीका में मौजूदा राजनीतिक तस्वीर के व्यापक अंतर को बयान करते हैं.

मोदी के पास निश्चित रूप से ट्रंप से ज्यादा राजनीतिक अनुभव है. भाजपा के अंदर मोदी का यह उभार, निश्चित रूप से प्रभावशाली है लेकिन इसे अपवाद नहीं कहा जा सकता. भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी गुजरात पर पूरे दो कार्यकाल तक शासन कर चुके थे. इस दौरान मोदी ने पार्टी के अंदर अपनी स्थिति मजबूत की. जबकि ट्रंप तो रिपब्लिकन पार्टी में भी किसी आउटसाइडर सरीखे हैं. 

मोदी अपने साथ एक बड़ा राजनीतिक बोझ लेकर चल रहे हैं, जिसमें एक यह भी है कि उनके कार्यकाल में 2002 में गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिमों का कत्लेआम हुआ और आरोपियों को उनका संरक्षण था, जिसका मोदी हमेशा विरोध करते आए हैं. ट्रंप पर इस तरह का कोई आरोप या अतीत का बोझ नहीं है.

इस तरह दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में आगे आने वाले दिनों में हम क्या होने की अपेक्षा कर सकते हैं, जबकि हम जानते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दो साल पहले क्या हुआ है? इस बहस में पड़ने वालों को हम यह बता सकते हैं कि गोरे श्रेष्ठतावादियों के भड़काऊ कदमों के बीच आने वाले दिनों में अमरीका में सामाजिक खाई और गहरी होगी. 

ठीक उसी तरह, जैसे मोदी के शासन में हिंदू श्रेष्ठता की वकालत करने वाला वर्ग पिछले दिनों बेहद मुखर और सक्रिय हुआ है, और आने वाले दिनों में वैमनस्य और भेदभाव का उभार देखा जा सकता है.

इसी तरह हम यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि गरीबों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति इनका रवैया और सख्त होगा. मोदी ने भारत की पुरानी सुरक्षा प्रणाली का मजाक यह कहते हुए उड़ाया है कि इससे दूसरों पर निर्भरता बढ़ती है. मोदी की नोटबंदी स्कीम ने भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक उन लोगों को प्रभावित किया है जो कि सबसे ज्यादा गरीब हैं. 

हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि ट्रंप प्रशासन भी गरीबों के खिलाफ ऐसी ही कोई लड़ाई छेड़ सकता है. लेकिन सबसे अहम यह कि आने वाले दिनों में हम अभिव्यक्ति को घुटता देखेंगे, जो कि दरअसल किसी भी लोकतंत्र की कसौटी है.

First published: 18 January 2017, 8:00 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी