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ट्रम्प या क्लिंटन? उम्मीदवार से महत्वपूर्ण भारत-अमेरिका संबंध

द कन्वर्सेशन | Updated on: 8 November 2016, 17:01 IST
(हिंदू सेना)
QUICK PILL
  • क्या अमेरिकी मतदाता अपने देश के लिए पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में हिलेरी क्लिंटन को मौका देगा?
  • या अमेरिकी विवादास्पद अरबपति डोनाल्ड ट्रम्प को अपना अगला राष्ट्रपति बनाएगी?
  • मगर उम्मीदवारों की जीत से ज़्यादा ज़रूरी है कि इनके संबंध भारत के साथ कैसे होंगे?

भारत ने पिछले दो दशकों में अमेरिका के साथ रिश्ते बेहतर बनाए हैं. लिहाज़ा, भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह इन चुनावों पर पैनी नजर रखें. अभी दो साल पहले बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी ने 2020 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य निर्धारित किया था. भारत सरकार को उम्मीद है कि अमेरिका की नई सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पहल करेगी. भारत को यह उम्मीद भी है कि अमेरिकी सरकार इसकी महत्वाकांक्षी योजना 'स्मार्ट सिटी’ के तहत अजमेर, विशाखापत्तनम और इलाहबाद के लिए सहायता करेगी.

भारत-अमेरिका संबंध

मोदी सरकार ने अमेरिका की इच्छा पर भारतीय परमाणु बीमा पूल बनाकर सिविल लायबिलिटी न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010 संबंधी उसकी चिंताओं का भी समाधान कर दिया है. इसके मुताबिक, किसी भी तरह की दुर्घटना की स्थिति में वित्तीय जवाबदेही न्यूक्लियर ऑपरेटर की होगी. इससे परमाणु सहयोग बेहतर बनाने की राह का एक बड़ा रोड़ा हट गया है. अब अमेरिका की बारी है कि वह इस समझौते को जल्द से जल्द लागू करे.

हालांकि रक्षा क्षेत्र में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है. (2015 में 14 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का रक्षा व्यापार हुआ) भारत को मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए भी अमेरिकी मदद की जरूरत है.

जहां तक सुरक्षा का सवाल है, भारत को विवादास्पद क्षेत्रों में चीन की स्थिति को लेकर चिंता है. (जैसे, पूर्वोत्तर में अरूणाचल है और उत्तर पश्चिम में लद्दाख.) और पाकिस्तान व चीन में बढ़ता आपसी सहयोग भी इसके लिए परेशानी का सबब है. पाकिस्तान के हथियार का 63 फीसदी माल चीन से भेजा जाता है.

भारत को लगता है कि अमेरिका की दक्षिण एशिया में उपस्थिति इसके लिए फायदेमंद साबित होगी. भारत यह भी जानता है कि अत्याधुनिक अमेरिकी हथियारों और तकनीकी सहायता के बिना वह सेना का आधुनिकीकरण नहीं कर सकता.

आतंकी समस्या का समुचित समाधान करने में विफल रहे पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भी भारत को अमेरिका के साथ सुरक्षा वार्ता और सैन्य अभ्यास करने की जरूरत है. दक्षिण एशिया में तेजी से बदलते सुरक्षा परिदृश्य के बीच यह और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. सितम्बर में जम्मू-कश्मीर में हुए उरी हमले के बाद से हालात और बदतर हुए हैं. 

ट्रम्पः भारत के परम मित्र?

भारतीय-अमेरिकी समुदाय से वोट बटोरने के लिए ट्रंप ने अपने प्रचार के अंतिम दिनों में काफी कुछ कहा. उन्होंने मोदी को 'महान' बताया. साथ ही, यह भी कहा कि 'वे हिन्दुओं के बड़े फैन हैं'. हिन्दू राष्ट्रवाद के बहाने ट्रम्प भारतीय-अमेरिकी समुदाय को रिझाना चाहते हैं. साथ ही उरी हमले की कड़ी निंदा करके उन्होंने यह जताने की कोशिश की है कि अगर वे अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो वे सीमा पार से फैलाए जा रहे आतंकवाद पर पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रवैया अपनाएंगे. कारोबारी होने के नाते ट्रम्प के भारत के साथ वैसे भी व्यापारिक हित जुड़े हैं, क्योंकि मुंबई में प्रीमियम लोकेशन पर उनके भव्य बिजनेस टॉवर बन रहे हैं. 

आव्रजन नीति

इन सबके बावजूद भारतीयों के आव्रजन के सवाल पर ट्रम्प के विचार चिंतित करते हैं. अमेरिका के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार ट्रम्प पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो वे आव्रजन नीतियों को सख्त बनाएंगे और एच 1 बी वीजा धारकों को दिए जाने वाले न्यूनतम वेतन को बढ़ाएंगे. इससे भारतीय व अन्यों के लिए रोजगार की संभावनाएं कम हो जाएंगी.

अमेरिकी आव्रजन जनगणना के अनुसार, वर्ष 2013-14 में अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में 103,000 भारतीय छात्रों को जगह मिली. चीनी छात्रों के बाद अमेरिका में पढ़ने वाले अंतर्राष्ट्रीय छात्रों में भारत का स्थान दूसरा है. ट्रम्प की एक और बात भारत के लिए चिंता का विषय है, वह है ट्रम्प का अमेरिका में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक का आह्वान और भारत में मुस्लिमों की संख्या दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले दूसरे नंबर पर सर्वाधिक है. 

अंततः रूस के प्रति डोनाल्ड ट्रम्प का नरम रवैया उन्हें चीन के प्रति अमेरिका की नीति की समीक्षा करने पर मजबूर कर सकता है. अगर ऐसा होता है तो सुरक्षा के लिहाज से भारत पर इसका असर गंभीर हो सकता है. 

क्लिंटन का पूरब प्रेम

1995 में चूंकि हिलेरी क्लिंटन भारत यात्रा पर आ चुकी हैं. भारत से उनकी अलग तरह की निजी घनिष्ठता है. माना जाता है कि हिलेरी ने उस वक्त जब उनके पति बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो भारत-अमेरिका संबंधों को प्रगाढ़ करने में अहम भूमिका निभाई थी. इसके बाद ही 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किए थे. 

क्लिंटन ने सीनेट भारत सम्मेलन की सह अध्यक्षता की थी और भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते का समर्थन किया था. बाद में 2009-2013 के बीच अमेरिका की विदेश मंत्री रहते हुए भी हिलेरी क्लिंटन ने दोनों देशों के संबंध मजबूत बनाने की कोशिश की थी.

भारतीय सामरिक विशेषज्ञ दोनों देशों के बीच उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र आपसी सहयोग बढ़ाने में क्लिंटन के योगदान की सराहना करते हैं. उनके प्रयासों से ही जुलाई 2009 में दोनों देशों के बीच सामरिक वार्ता हुई. राष्ट्रपति ओबामा की एशिया के साथ नीति के तहत हिलेरी ने भारत के साथ अमेरिका के संबंध मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. और चेन्नई में 2011 में दिया गया हिलेरी का भाषण भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने की दिशा में एतिहासिक क्षण बन गया. 

क्लिंटन की प्रचार प्रमुख जॉन पोडेस्टा ने कहा, क्लिंटन दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगी. और भारत के साथ बेहतर आर्थिक संबंध क्षेत्र में उसका प्रभुत्व जमाने में सहायक होंगे. लेकिन उनके प्रतिद्वंदी डोनाल्ड ट्रम्प ने आरोप लगाया है कि परमाणु सौदे के समर्थन के लिए भारतीय नेताओं ने क्लिंटन को पैसा दिया था.

भारत में असर

भारतीय अमेरिकी समुदाय में क्लिंटन की छवि काफी अच्छी है. खासतौर पर युवाओं में. बेशक वे अपने प्रतिद्वंदी रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के मुकाबले भारत को कहीं बेहतर ढंग से जानती-समझती हैं. लेकिन साथ ही यह भी सच है कि ट्रम्प ने हाल ही भारतीय-अमेरिकी समुदाय के वोटरों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

भारत और हमारे रणनीतिकार अबकी बार इस बात में कम रूचि लेते दिखाई दे रहे हैं कि कौन जीतेगा. अब तक न तो सत्ताधारी भाजपा और न ही प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका चुनाव पर कोई बात की है. भारत में विशेषज्ञों और रणनीतिकारों में आम अवधारण यही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव कोई भी जीते लेकिन भारत-अमेरिका संबंध और मजबूत बनाने के लिए दोनों देशों को ही लगातार प्रयास करना चाहिए.

First published: 8 November 2016, 17:01 IST
 
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