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ट्रंप की जीत: अमरीका की हार

कुमार प्रशांत | Updated on: 12 November 2016, 8:23 IST
QUICK PILL
  • अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव हम सबकी दिलचस्पी का विषय इसलिए नहीं होता है कि वह कोई महाशक्ति है. 
  • हमारी दिलचस्पी इसलिए होती है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व के कई-कई सवालों पर हमारी सदा की तनातनी के बाद भी अमरीका कई अर्थों में दुनिया की आशाओं का केंद्र है. 
  • उसका लोकतंत्र के समर्थन में खड़े रहना और दुनिया भर के प्रगतिशील तबकों, विचारों और धाराओं से जुड़े रहना बहुत मतलब रखता है. 

हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड जॉन ट्रंप के बीच ऐसा कोई धागा नहीं जो हमें जोड़ता हो. हां, जहां तक हिलेरी क्लिंटन का सवाल है, एक धागा जरूर था जो हमें किसी हद तक उनकी तरफ खींचता था और वह था उनका औरत होना! यह वैसा ही है जैसे सड़ी-गली राजनीतिक व्यवस्था में ही किसी मायावती के लिए मन का एक कोना जरा गीला होना! नहीं तो हिलेरी क्लिंटन अपने पति राष्ट्रपति क्लिंटन के काल में भी और फिर ओबामा के विदेशमंत्री के रूप में भी कभी प्रेरणादायी या सामान्य अमरीकी नौकरशाह से अलग कुछ रही नहीं हैं. 

उनकी पराजय के पीछे भी इन्ही तत्वों का हाथ रहा है कि वे देश में उत्साह नहीं जगा सकीं, आशा का संचार नहीं कर सकीं. वे ट्रंप की जुमलेबाजियों का कोई प्रभावी जवाब नहीं तैयार कर सकीं. अपने चुनाव के खर्च के लिए उन्होंने पैसा बहुत जमा किया लेकिन विश्वास नहीं कमाया. शायद कहीं यह भाव भी रहा कि उन जैसी अनुभवी राजनीतिज्ञ के सामने राजनीति से अनजान ट्रंप को कहीं टिकेंगे भी क्या! शायद यह भी कहीं रहा कि वे ऐसी अकेली उम्मीदवार हैं जिनके समर्थन में दो-दो राष्ट्रपति मैदान में हैं! सो राष्ट्रपति बनने की कोशिश में दो-दो राष्ट्रपतियों को पराजित करवा कर, वे दो-दो बार पराजित हुईँ. 

अमेरिका, इतिहास के आईने में

लेकिन ट्रंप की कहानी देखने के लिए हम बहुत नहीं फिर भी थोड़ा पीछे चलते हैं. 1988-89 में अमरीका ने अपने 40वें राष्ट्रपति के रूप में चुना था रोनाल्ड रीगन को. कभी हॉलिवुड में अभिनेता रहे और फिर गवर्नर रहे रीगन की इसके अलावा दूसरी कोई विशेषता नहीं थी कि वे जाने-पहचाने चेहरे थे और फिल्मी संवादनुमा शैली में बातें करते थे. 

यहां से अमरीकी राष्ट्रपतियों के पतन की एक नई कहानी शुरू होती है. फिर 41वें राष्ट्रपति के रूप में उप-राष्ट्रपति जॉर्ज हरबर्ट वाकर बुश चुने गये. 43वें राष्ट्रपति के रूप में इनके स्वनामधन्य पुत्र जॉर्ज वाकर बुश चुने गये. 

रीगन से शुरू हो कर 2009 तक के कालखंड को हम अमरीका के सबसे भौंडे काल में गिन सकते हैं जब अमरीका का आर्थिक रुतबा और उसकी राजनीतिक नेतृत्व-क्षमता रसातल में पहुंचती गई. सोवियत संघ के बिखरने के बाद अमरीकी वर्चस्व बनाने की फूहड़ कोशिशों में सारी दुनिया में युद्ध भड़काने, आतंकवाद को संगठित स्वरूप देने और फिर ओसामा बेन लादेन तथा दूसरे आतंकी संगठनों का भूत खड़ा करने आदि का यही काल है.

यही काल है जब आतंकी वर्ल्ड टावर पर हवाई जहाज दे मारते हैं और अमरीका घुटनों के बल झुकता-गिरता दिखाई देता है.

राष्ट्रपति बुश की पहली प्रतिक्रिया किसी चूहे-सी बदहवास होती है और फिर किसी पागल हाथी की तरह वे अफगानिस्तान, ईराक आदि पर हमला करते हैं और सारी दुनिया को आंखें दिखाते हैं. 'जो हमारे साथ नहीं, वह आतंकवादियों के साथ' जैसी कबिलाई मानसिकता जगाने वाला अमरीका यहां से उभरता है. इस अमरीका के पास संसार को देने-कहने को कुछ नहीं था. 

बौना नेतृत्व राष्ट्र-मन को लिलिपुट के नाप का बना देता है. इसी दौर में भारत अमरीका के लिए नया पाकिस्तान बनने की रजामंदी दिखाता है. यह अटलबिहारी वाजपेयी काल था. फिर तो मनमोहन-काल आया और अब मोदी-काल ! हम कहां से चल कर कहां पहुंचे हैं !! 

अमरीका का यह युद्धोन्मत्त काल आम अमरीकी को मौत और निराशा से अलग कुछ दे नहीं सकता था. बैंकों-बीमा कंपनियों का अभूतपूर्व भ्रष्टाचार अमरीका की चूलें हिला गया और आर्थिक मंदी ने जड़ पकड़ ली. अमरीकी आर्थिक सत्ता कभी इतनी खोखली नहीं दिखाई दी थी जितनी बुश-काल के इस अंतिम दौर में दिखाई दी. महंगाई, बेरोजगारी और उत्पादन में गिरावट का यह काल अमरीका का आत्मविश्वास हिला गया. 

बराक ओबामा में उम्मीद

ऐसे में बराक ओबामा सामने आए. एक अश्वेत अमरीकी ने अमरीका की कमान संभालने की सोची, यही काफी था कि सफेद चमड़ी के अभिजात्य का ढोंग ढोने वाला अमरीका उसे कुचल-मसल देता ! लेकिन लस्त-पस्त अमरीका में इतना बल बचा कहां था ! निराशा की इसी गर्त में से ओबामा ने आशा की हांक लगाई. यह बुझती लौ की बत्ती बढ़ाने जैसा काम था. श्वेत अमरीका देखता रहा और बाकी का अमरीका ओबामा के साथ हो लिया ! 

ओबामा ने सारा बल लगा कर मतदाताओं के सामने जो अमरीका खड़ा किया वह युद्धों से बाहर निकलने, मंदी और बेरोजगारी से छूटने और सामाजिक न्याय की मांग करने वाला अमरीका था. श्वेतवादियों ने ओबामा के रूप में उभरता यह खतरा नहीं देखा, ऐसा नहीं था. वे अंत-अंत तक कोशिश करते रहे कि यह अश्वेत आदमी सफल न हो लेकिन बात उनके बूते की रह नहीं गई थी. ओबामा जीते और अमरीका खड़ा हुआ.

ओबामा दूसरी बार भी राष्ट्रपति चुने गये हालांकि उन्हें इस बार पहले से कम समर्थन मिला. इसमें ओबामा की अपनी विफलताएं भी थीं, अमरीकी समाज व प्रशासन की सड़ांध भी थी लेकिन यह भी था, और खूब था कि सारे श्वेतवादियों के अपनी मोर्चाबंदी कर ली थी. लेकिन यह सारा प्रसंग तो ओबामा-काल की समीक्षा का है. अभी हम देख तो यह रहे हैं न कि ट्रंप का उभरना और जीतना कैसे हुआ, तो ट्रंप ने उन सारे धागों को काटना शुरू किया जिन्हें ओबामा ने जोड़ा था. 

ट्रंप की एंट्री

ट्रंप का पूरा अभियान उस तर्ज पर चला जिस तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने का अपना अभियान चलाया था. ट्रंप ने भी अपने समाज की आंतरिक बीमारियों को खूब उभारा और उसका दोष कुछ खास समुदायों पर थोप दिया. उन सारी ताकतों को खुलेआम धमकी दी जो ओबामा-काल में उभरे थे. 

उन्होंने अमरीका को याद दिलाया कि यह सफेद चमड़ी वालों का देश है जिस पर कालों का, संसार भर से आ जुटे अश्वेतों का, मुसलमानों का दवाब बहुत बढ़ गया है; उन्होंने अमरीका को उस शान की याद दिलाई जब दुनिया उसकी ठोकरों में हुआ करती थी. 

उसने अमरीका को पूंजी की ताकत की याद दिलाई और कहा कि इसका बल हो तुम्हारे पास तो तुम बादशाह हो और संसार की किसी भी औरत को किसी भी तरह, कहीं भी दबोच सकते हो. यह किसी ट्रंप की निजी जिंदगी को नंगा करने जैसी बात नहीं है. पैसे को भगवान मानने वाला यह वह दर्शन है जो श्वेत अमरीका को घुट्टी में पिलाया जाता है. ट्रंप की जीत के साथ ही वह अमरीका हार गया है जिसे अब्राहम लिंकन से ले कर बराक ओबामा तक ने बनाने की कोशिश की थी.

70 साल के ट्रंप बहुत अमीर ठेकेदार व्यापारी हैं जिनका भवन निर्माण का धंधा है. वे टीवी की दुनिया में चमकते-दमकते दिखाई देते रहे हैं. अमरीका ने जिस आदमी को अपना 45वां राष्ट्रपति चुना है, वह अमरीकी समाज का गंभीर अध्येता, राजनीतिक-सामाजिक कर्मी कभी नहीं रहा है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वह अमरीकी समाज का हिस्सा ही नहीं रहा है. वह उस अमरीका को जानता, मानता और चाहता रहा है जो डॉलर की ताकत से शिखर पर विराजता है. 

इसलिए औरतों का समाज, कालों का समाज, अश्वेतों का समाज, गरीबों का समाज से लेकर असीमित उपभोग, पर्यावरण का नुकसान, आर्थिक विषमता, अपराध की दुनिया, हथियारों की होड़, अमरीकी समाज का बंदूक-प्रेम आदि कुछ भी ट्रंप की दुनिया का हिस्सा नहीं है. चिंता इस बात की नहीं है कि वे अनुभवहीन हैं बल्कि इस बात की है कि वे इन अनुभवों से परे हैं. वे जिन विश्वासों के साथ बड़े हुए हैं और जो अब उनके अपने विश्वास हैं, वे सभी आज अमरीका में और आज के संसार में प्रतिगामी विश्वास हैं. ऐसा राष्ट्रपति अमरीका के लिए भी और संसार के लिए भी बोझ बनेगा.  

सबका साथ सबका विकास

जीत के बाद अचानक ट्रंप की बातें बदल गईं. वे कह रहे हैं कि अब चुनाव पूरा हुआ तो यह घाव भरने का समय है. घाव दिए किसने और क्यों, इस बारे में कुछ न कहते हुए वे 'सबका साथ सबका विकास' कह रहे थे. मंच पर कुछ और मंच के नीचे व पर्दे के पीछे कुछ की त्रासदी हम लंबे समय से झेल रहे हैं. अब अमरीका व संसार की बारी है. 20 जनवरी 2017 के बाद ट्रंप अपने पत्ते चलना शुरू करेंगे और तब हम देखेंगे कि उनके पास कितने ट्रंप कार्ड हैं.                                                                                                    

First published: 12 November 2016, 8:23 IST
 
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