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कुदरत का कद नापने की कोशिश, यूएई बनाना चाहता है बारिश वाला पहाड़

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 May 2016, 9:23 IST

आप इस जगह का नाम और इसकी खासियत के बारे में सुन कर शायद हैरान हो जाएं, लेकिन यकीन मानिए इसमें कुछ भी काल्पनिक नहीं है. ब्रिटेन के वेल्स में बसा हुआ एक गांव है एग्लिविश. पिछली सर्दियों में इस गांव में लगातार 85 दिनों तक बारिश होती रही. हालांकि यह ब्रिटिश रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया.

एग्लिविश में इतनी बारिश बेवजह नहीं है. यहां हवा में काफी नमी होती है. यह हवा अटलांटिक महासागर से उठकर आगे बढ़ती है और वेल्स की पहाड़ियों तक पहुंचती है. जल वाष्प की नमी समेटे यह हवा जैसे-जैसे ऊपर उठती है, हवा नमी के भारी कणों को पकड़ कर रखने की क्षमता कम होती जाती है. 

यही जल वाष्प घनी होकर एग्लिविश में बारिश बनकर बरसती है. बारिश के विज्ञान की बात करें तो पहाड़ियों की वजह से ही बारिश का निर्माण होता है. पहाड़ की वजह से हवा में नमी भी बढ़ती है और उन्हीं से टकराकर बारिश होती है. भारत में भी हिमालय पर्वत की श्रृंखलाएं सदियों से भारतीय भू-भाग पर इसी चरणबद्ध तरीके से बारिश करवाती आ रही हैं.

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द कंवर्सेशन

इस वैज्ञानिक तथ्य ने अब यूनाइटेड अरब अमीरात में कुछ नया करने की लालसा को जगा दिया है. दुनिया की सबसे बड़ी इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा और मानव निर्मित टापू  द पाम एंड द वर्ल्ड के बाद अब वो अपने यहां एक पहाड़ बनाने की सोच रहे हैं. अरब जैसे रेतीले देशों में मानसून की बारिश करवाने की गरज से और मीठे पानी की सतत आपूर्ति के लिए.

अमीरात की सोच है कि मानव निर्मित पहाड़ से समुद्र से उठी नम हवा को रोकने और उसे ठंडा होने में मदद मिलेगी. बाद मेें इन्हीं बादलों से छोटी छोटी बूंदें बनकर अरब की धरती पर बरसेंगी और रेगिस्तान में भी हरियाली होगी.

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ऑक्सफोर्ड मार्टिन स्कूल के फेलो टिम क्रूजर जियो इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ हैं. इन दिनों वे ग्रीनहाउस गैसों को वायुमण्डल से निकाल कर या सूरज की रोशनी के एक हिस्से को वापस अंतरिक्ष की ओर भेज कर धरती के वातावरण को ठंडा रखने की महत्वाकांक्षी योजना और उसकी व्यावहारिकता पर काम कर रहे हैं. इसी वजह से उनसे यूएई की इस कृत्रिम पहाड़ वाली योजना पर भी राय मांगी गई है. 

उनके मुताबिक ये योजना जियो इंजीनियरिंग है या नहीं ये विवाद का मसला है लेकिन बारिश कराने लायक पहाड़ों का निर्माण अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. ये सोच दरअसल इंसानी अभिमान और महत्वाकांक्षा के पहाड़ पर खड़ी है.

कुछ लोग इस योजना को रेगिस्तान में पानी पहुंचा कर कुदरत के ऊपर इंसानी जीत के जश्न के रूप में देखते हैं लेकिन कुछ इसको प्रकृति के खिलाफ मानव का छुद्र गुरूर मानते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि यह कुदरती सीमाओं से पार पाने की कोशिश है. उनका तर्क है कि आखिरकार ठंडे स्थानों पर जरूरी गर्मी के लिए भी इंसान ने ऐसे उपाय कर रखे हैं, इसी तर्ज पर बेहद गर्म इलाकों मेें खुद को ठंडा रखने के उपाय भी इंसान ने कर रखे हैं.

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सबके अपने अपने मत हैं. कोई हारेगा, कोई जीतेगा. यह भी हो सकता  है कि यह योजना सिरे ही न चढ़ सके. इस तरह के मामलों का निर्णय सिर्फ नफे या नुकसान के संकुचित दायरे में नहीं किया जा सकता. किसी देश की सीमाओं के भीतर बारिश के लिए बनाया गया पहाड़ कहीं किसी दूसरे देश की सरहद में बाढ़ या सूखे की वजह भी बन सकता है.

इन सारी आशंकाओं के बीच क्या यूएई ऐसे पहाड़ बनाने में कामयाब होगा? तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों को अगर बड़ी समस्या न भी माना जाए तो क्या समाज इसे अपनाएगा? क्या इस योजना के कर्ता धर्ताओं को प्रकृति की सूरत को इतने बड़े पैमाने पर बदलने की छूट है? क्या देश की सरकार को कुदरती नियमों में इस कदर दखल देने की छूट होनी चाहिए? या इतना कहने भर से सब सवाल पीछे छूट जाएंगे कि इस प्रोजेक्ट की सफलता रेगिस्तान में पानी का सपना पूरा कर देगी?

टिम कहते हैं, "इसके बाद भी मेरे अनुमान से एग्लिविश हमेशा एक बरसाती इलाका रहेगा और तमाम प्रयासों के बाद भी यूनाइटेड अरब अमीरात एक सूखा इलाका बना रहेगा."

(यह लेख द कंवर्सेशन डॉट कॉम से लिया गया है)

First published: 15 May 2016, 9:23 IST
 
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