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छोड़िए जंग की बात, पाकिस्तान को मिलेगा करारा जवाब अगर भारत ये समझौता कर दे रद्द

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 September 2016, 17:03 IST
(पीटीआई)

उरी हमले के बाद पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ लोग अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं. नौबत यहां तक पहुंच चुकी है कि अब पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए लोग जंग की बात करने लगे हैं.

लेकिन हकीकत यह है कि जंग से किसी मसले का हल नहीं निकल सकता. जहां एक ओर सरहद पार से पाकिस्तान भारत के खिलाफ ही साजिश रचने में जुटा है. वहीं एक समझौता ऐसा भी है, जिससे भारत की वजह से पाकिस्तान को मदद मिल रही है.

56 साल पहले भारत के साथ हुए इस समझौते की वजह से पाकिस्तान के नागरिकों का पेट भरता है, उनकी फसलें तैयार होती हैं. ऐसे में अगर भारत चाह ले तो बिना किसी जवाबी हमले के पाकिस्तान को घुटने टेकने में देर नहीं लगेगी. एक नजर समझौते और उसको रद्द करने से पड़ने वाले असर पर:

पीटीआई

इंडस वॉटर ट्रीटी रद्द तो काम तमाम 

भारत ने 1960 में पाकिस्तान के साथ इंडस वॉटर ट्रीटी की थी. इस संधि के मुताबिक, भारत अपनी 6 नदियों से पाकिस्तान को खुद से ज्यादा पानी दे रहा है. अगर इस समझौते को भारत रद्द कर देता है, तो पाकिस्तान की रीढ़ की हड्डी टूट जाएगी और वो भारत के साथ कई शर्त मानने को तैयार हो सकता है.

खुद से ज्यादा पानी पाक को देता है भारत

भारत ने वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में पाकिस्तान के साथ 19 सितंबर 1960 को कराची में इंडस वॉटर ट्रीटी की थी. इस संधि पर देश के पहले पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने दस्तखत किए थे.

इंडस वॉटर ट्रीटी के मुताबिक, भारत पाकिस्तान को अपनी सिंधु, झेलम, चिनाब, सतलुज, व्यास और रावी नदी का पानी देगा. इन नदियों का 80 फीसदी से ज्यादा पानी पाकिस्तान को मिलता है. 

ट्रीटी को रद्द करने से पड़ेगा असर 

अगर भारत ने इन नदियों का पानी बंद कर दिया, तो पाकिस्तान की कृषि पूरी तरह तबाह हो जाएगी. दरअसल पाकिस्तान में खेती बारिश पर नहीं, बल्कि इन नदियों के पानी पर ही निर्भर है. 

यही वजह है कि पाकिस्तान भारत के बगलियार और किशनगंगा पावर प्रोजेक्ट्स का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध करता है. ये प्रोजेक्ट्स बन जाने के बाद उसे मिलने वाले पानी में कमी आ जाएगी और वहां परेशानी बढ़ जाएगी.

ट्रीटी से 60 हजार करोड़ का नुकसान  

2005 में इंटरनेशल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट और टाटा वॉटर पॉलिसी प्रोग्राम भी इस ट्रीटी को खत्म करने की मांग कर चुके हैं. इनकी रिपोर्ट के मुताबिक, इस ट्रीटी की वजह से जम्मू-कश्मीर को हर साल 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो रहा है.

ऐसे में छह दशक पुरानी इस संधि के रद्द हो जाने के बाद जम्मू-कश्मीर की घाटी में 20000 मेगावाट से भी ज्यादा बिजली पैदा की जा सकती है.

तो फिर मत छेड़िए जंग की बात. पाकिस्तान से निबटने के लिए यह एक और विकल्प है, जिस पर भारत गंभीरता से विचार कर सकता है.

First published: 20 September 2016, 17:03 IST
 
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