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सिप्ला के खिलाफ न्यायालय का फैसला: पेटेंट और पेशेंट के लिए इसके मायने

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने फेफड़ों के कैंसर की दवा पर रॉश कंपनी के पेटेंट के दावे को सही ठहराया है. 
  • रॉश की एक खुराक की कीमत 4800 रुपये है जबकि सिप्ला की एर्लोसिब 1600 रुपये में मिलती है. हालांकि मरीजों के लिए राहत की बात ये है कि मार्च 2016 में रॉश का पेटेंट समाप्त हो जाएगा.

लगातार दूसरी बार दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्विटजरलैंड की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी के पेटेंट को बरकरार रखा है. यह ड्रग पेटेंट को लेकर किए जाने वाले भविष्य के फैसलों के लिए एक मिसाल बन सकता है. साथ ही तमाम छोटी-छोटी दवा कंपनियों पर इस फैसले का व्यापक असर हो सकता है.

शुक्रवार, 27 नवंबर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने टार्सेवा द्वारा विपणन की जाने वाली फेफड़ों के कैंसर की दवा (रासायनिक फार्मूला: एर्लोटिनिब हाइड्रोक्लोराइड) पर रॉश के पेटेंट के दावे को सही ठहराया. रॉश ने आरोप लगाया था कि भारत की दवा कंपनी सिप्ला ने पेटेंट कानून का उल्लंघन करते हुए उसकी दवा एर्लोसिब की बिक्री जारी रखी. 

जहां रॉश टार्सेवा की एक खुराक का दाम 4800 रुपये है, सिप्ला की एर्लोसिब 1600 रुपये में मिलती है. हालांकि मरीजों को ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि मार्च 2016 में रॉश का पेटेंट समाप्त हो जाएगा.

लेकिन कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, रॉश द्वारा अन्य कई न्यायालयों में स्थानीय दवा निर्माताओं के खिलाफ दायर किए गए इसी तरह के 10 मामलों पर इस फैसले का असर पड़ेगा. 

रॉश ने हैदराबाद की कैंसर विशेषज्ञता वाली दवा कंपनी नैटको फार्मा, डॉ. रेेड्डीज लैबोरेटरीज लिमिटेड और मुंबई की ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल्स लि. पर भी एक ही दवा के लिए मुकदमा दायर किया है. 

वर्ष 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह ने कहा था कि सिप्ला पेटेंट कानून का उल्लंघन नहीं कर रही है क्योंकि उक्त दवा का सिप्ला द्वारा बनाया जाने वाला वर्जन "बेसिक कंपाउंड का एक वैरिएंट" था. वह रॉश द्वारा कराए गए पेटेंट से अलग था.

इसके बाद रॉश ने एक खंडपीठ में इसकी अपील की जिसने शुक्रवार को 2009 के फैसले को किनारे रखते हुए रॉश के पेटेंट को बरकरार रखा. 

पेटेंट नई खोजों को बढ़ावा देता है

शोध कार्यों पर मोटा पैसा खर्च करने वाली बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए यह एक सकारात्मक फैसला है. अंतरराष्ट्रीय पेटेंट वकील और दवा कंपनियां हर बार इस मुद्दे पर बहस करते हैं कि आमतौर पर शोध के लिए खर्च की गई रकम को वसूलने के लिए पेटेंट एक जरिया होते हैं. 

लेकिन भारत के पेटेंट कानून में एक पेंच है. यह पेंच है पेटेंट एक्ट का सेक्शन 3(डी).

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पेटेंट एक्ट की धारा 3 (डी) का पेंच

इसके मुताबिक, "किसी पूर्व ज्ञात पदार्थ के एक नए रूप की खोज, जो उसके ज्ञात प्रभावों में कोई वृद्धि न करता हो," किसी दवा को पेटेंट कराने का एक वैध कारण नहीं हो सकता. 

सिप्ला ने यह तर्क दिया था कि रॉश का पेटेंट वैध नहीं है क्योंकि उसने पहले से ही कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही दवा के एक अतिरिक्त कंपाउंड 'एर्लोटिनिब हाइड्रोक्लोराइड' से इसे विकसित किया था.

न्यायालय में सिप्ला के इस तर्क के जवाब में न्यायाधीश ने कहा, "हम प्रावधान 3(डी) को एक सकारात्मक धारा के रूप में देखते हैं." संक्षेप में सिप्ला के पास इस विशेष प्रावधान पर बहस करने के लिए कोई आधार नहीं है.

दवा कंपनियों के एक समूह इंडियन फार्मास्यूटिकल एलायंस के महासचिव डीजी शाह कहते हैं, "यह फैसला एक महत्वपूर्ण संकेत है कि भारत का अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कानून, पेटेंट्स को गंभीरता से लेता है."

मरीजों के लिए इसका मतलब

फेफड़े या अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित मरीज, जिनके लिए यह दवा बहुत जरूरी है, को इसके दामों में बढ़ोतरी से चिंता करने की जरूरत नहीं है. हालांकि, भविष्य के मद्देनजर यह फैसला निश्चित रूप से मरीजों के पक्ष में नहीं जाएगी.

अदालत ने दवा के दाम को संज्ञान नहीं लिया और वकीलों ने तर्क दिया कि इसके दाम इतने अधिक नहीं है कि यह पेटेंट का खंडन करते हों. इस मामले में सिप्ला एक आदेश से बच गया. जिसका मतलब कि वह अपनी दवा की बिक्री जारी रख सकती है क्योंकि रॉश का पेटेंट मार्च 2016 में समाप्त होने वाला है. हालांकि, नैटको और ग्लेनमार्क जैसी स्थानीय दवा निर्माताओं पर रॉश का यह मुकदमा काफी प्रभाव डालेगा. 

इस माह की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अमेरिका की मर्क कंपनी के डायबिटीज की एक दवा पर पेटेंट को बरकरार रखा था. जिसका मतलब था कि ग्लेनमार्क द्वारा बनाए गए सस्ते विकल्प की अब उपलब्धता नहीं होगी.

यदि ऐसे फैसले आदर्श बन जाते हैं तो जेनेरिक वर्जन्स के गायब होने से जीवन रक्षक दवाओं के दामों में निश्चित रूप से बढ़ोतरी दिखेगी.

First published: 30 November 2015, 10:52 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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