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उत्तर प्रदेश की जीत मोदी के वैश्विक क़द में इजाफा करेगी

विवेक काटजू | Updated on: 12 March 2017, 8:50 IST

पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में लोगों की निगाहें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश पर टिकी थी. विदेशी राजनीतिक विश्लेषकों की भी, क्योंकि उत्तर प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से भारत का सबसे महत्वपूर्ण राज्य है. उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिली सफलता मात्र ‘हवा का झोंका’ नहीं थी.

मोदी ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में अपना जलवा दिखाते हुए भारत की राजनीति में अपनी अजेय भूमिका पर मुहर लगा दी है. इससे उनके पहले से ही बढ़ चुके अंतरराष्ट्रीय कद में और इजाफा होगा.

आम तौर पर केवल भारतीय विश्लेषक ही राज्य विधानसभा चुनावों पर नजर रखते हैं लेकिन इन विधानसभा चुनावों पर भारत के पड़ोसी देशों से लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पैनी नजर थी.

इनमें कूटनीतिज्ञ और राजनेता, शिक्षाविद और व्यापार व वित्त जगत के विशेषज्ञ भी शामिल थे. उनकी दिलचस्पी दरअसल इस बात में थी कि इन चुनावों का देश के राजनीतिक भविष्य पर क्या प्रभाव होगा? साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक भविष्य पर भी. दूसरा, इन चुनावों से ही देश की राजनीतिक दिशा तय होनी थी.

हर हर मोदी

2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए सम्मानीय राजनेता बन गए. भारतीय प्रबुद्ध वर्ग के एक धड़े के कड़े विरोध के बावजूद पिछले तीन दशक में मोदी एकमात्र ऐसे राजनेता रहे, जिनके नेतृत्व में उनकी पार्टी को लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला.

इनमें से कई ऐसे देश विकास के पथ पर बढ़ते भारत के साथ अपने रिश्तों में दिलचस्पी लेते हुए मोदी के साथ सम्पर्क करने को आतुर नजर आए, जिन्हें पहले कुछ संकोच था.

मोदी ने उनका उत्साह के साथ स्वागत किया और अपनी ही तरह की विदेश नीति अपनाई. इसके अलावा उन्होंने क्षेत्र में और उसके बाहर के देशों में भी द्विपक्षीय दौरे किए. उन्होंने कई बहुपक्षीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लिया और संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्रों में भी. कुल मिलाकर वे अब तक 56 देशों की यात्रा कर चुके हैं.

मोदी कई अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध स्थापित कर चुके हैं. मोदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत बन कर उभरे जो महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखने के लिए पहचाने जाने लगे, जैसे कि जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में उनका संबोधन. आखिरकार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसी नेता की पहचान बन पाती है, जिसके पास विचार व्यक्त करने की सशक्त कला हो. परन्तु कोई भी नेता तभी ऐसा कर सकता है, जब उसे अपने देश की जनता का व्यापक समर्थन हासिल हो और सबसे महत्वपूर्ण है नेतृत्व की इस कठिन राह पर चलने की उनकी इच्छा शक्ति और विश्वास. इसी संदर्भ में विदेशी नेता नोटबंदी के राजनीतिक पहलुओं को भी देख रहे हैं.

इस लेख के लेखक ने अफगानिस्तान के एक शीर्ष राजनेता के साथ बात की तो भी यही बात सामने आई. उन्होंने मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा, 'मोदी ही ऐसा कर सकते थे. वे भारत का स्वरूप बदल कर रख देंगे.' स्वाभाविक है, उनका आशय नोटबंदी के आर्थिक और वित्तीय पहलुओं से था लेकिन उन्होंने मोदी की राजनीतिक सफलता को खुल कर रेखांकित किया.

भारत-पाक और भारत-चीन संबंध

क्या यूपी के चुनाव परिणामों से उत्साहित मोदी भारत-पाक संबंधों का इतिहास बदलने की दिशा में एक और प्रयास करेंगे? मोदी ने दिसम्बर 2015 में इस दिशा में पहल की थी लेकिन पाकिस्तानी सेना के जनरलों की हठधर्मिता के कारण उनके इन प्रयासों को धक्का लगा, जिसका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा. जाहिर तौर पर पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत के साथ संबंध सुधारने के इुच्छुक थे, हालांकि कश्मीर पर उनका रुख कड़ा था. अब पाकिस्तान में नए सेनाध्यक्ष आ चुके हैैं. हो सकता है कि मोदी अब कुछ सावधानी के साथ पाकिस्तान की तरफ नए सिरे से दोस्ती का हाथ बढ़ाएं.

हालांकि पाकिस्तानी सेना ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह अपनी सीमा से आतंकवाद को प्रश्रय नहीं देगा. उन्हें यह भी याद रखना होगा कि एक बार फिर पाकिस्तानी उनके प्रयासों को विफल कर सकते हैं.

विदेश नीति के मामले में चीन के साथ भारत के संबंधों पर भी मोदी की जवाबदेही बनती है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि चीन भारत में पांव पसारता जा रहा है, खास तौर पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के जरिये.

गौरतलब है कि 2016 में चीन ने मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी सूची में शामिल करने पर विरोध जताया था और उसके बाद न्यूक्लियर सप्लायर्स (एनएसजी) ग्रुप में भारत की सदस्यता का भी चीन ने विरोध किया था.

ऐसा संभव नहीं है कि उक्त दोनों मुद्दों पर मोदी चीन के आगे झुकेंगे, बल्कि चीन को अब यह समझना होगा कि उन्हें मोदी जैसे सशक्त भारतीय नेता के साथ संबंध सुधारने ही होंगे.

ट्रम्प फैक्टर

मोदी की विदेश नीति का एक अहम पहलू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ व्यक्तिगत स्तर पर अच्छे संबंध बनाना भी होगा. यूपी के चुनाव परिणाम इस दिशा में मोदी के लिए सहायक सिद्ध होंगे. ट्रम्प के लिए भी यह बेहतर होगा कि वे मोदी के नेतृत्व वाले भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत करें जो कि अमरिका के हर कदम का साथ देंगे.

बहुत से विकासशील देशों के साथ भारत के संबंध फिलहाल बहुत अच्छे नहीं हैं. भारत-अमेरिका के संबंध सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेंगे; इसमें भी संदेह ही है.

भारत के पड़ोसी देश अब मोदी का अधिक सम्मान करेंगे और उनसे डरेंगे. वे यह भी स्वीकार करेंगे कि उन्हें आने वाले कई सालों तक मोदी के साथ ही राजनीतिक संबंध निभाने होंगे. नेपाल भी अब मोदी के सामने अपना अड़ियल रवैया छोड़ने पर मजबूर होगा. चीन भी भारत के साथ दूरियां कम करने की कोशिश करेगा. मालदीव के साथ भी द्विपक्षीय संबंधों की राह सुगम होगी.

भारत के राजनीतिक परिदृश्य का आकलन करते हुए विदेशी विश्लेषक यूपी में राहुल गांधी की राजनीतिक विफलता भी देख पा रहे हैं, जो राहुल गांधी की अपरिपक्व समझ और कांग्रेस को नकारे जाने का एक और संकेत है. पंजाब की जीत को देखते हुए हो सकता है विदेशी मीडिया उन्हें बिल्कुल नजरंदाज ना भी करे, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाएगा.

अपने बड़े-बड़े दावों के बावजूद आप पार्टी का कद पंजाब में कम रह गया और अरविंद केजरीवाल पर विदेशी राजनीतिक जानकारों का ध्यान शायद ही जाए. यूपी जीतने के बाद मोदी, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी सरीखे नेताओं की श्रेणी में आ गए हैं. अब विदेशी राजनीतिक विश्लेषक मोदी को भारत के दीर्घकालिक सर्वोच्च नेता के तौर पर नजरंदाज नहीं कर सकते.

First published: 12 March 2017, 8:50 IST
 
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