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सऊदी अरब से दूरी बनाने में देर कर दी ओबामा ने

रवि जोशी | Updated on: 27 April 2016, 0:16 IST
QUICK PILL
  • पिछले दो साल में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और सऊदी अरब के नेताओं के बीच बस दो मुलाकातें हुई हैं.
  • अमेरिका ने आतंकवाद के बढ़ावे में सऊदी अरब की भूमिका को स्वीकार करने में देर कर दी.

पिछले दो साल में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और सऊदी अरब के नेताओं के बीच महज दो मुलाकातें हुई हैं.

दूसरी मुलाकात 20 अप्रैल को तब हुई जब ओबामा गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की बैठक में शामिल होने के लिए सउदी गए. इससे पहले वो वाशिंगटन में मिले थे.

पश्चिम एशिया में ओबामा की विदेश नीति में आने वाले बदलाव से सउदी शाह सलमान चिंतित हैं. सलमान को ये बात अच्छी नहीं लग रही है अमेरिका ईरान पर बम बरसाने के बजाय उसे मुख्यधारा की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में वापस ला रहा है.

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अजीब बात है कि जो सउदी अरब अमेरिका के रहमो-करम पर निर्भर माना जाता है वो वहां की विदेश नीति को निर्देशित करना चाहता है.

ओबामा और सउदी अरब के बीच गतिरोध 2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान शुरू हुआ. ओबामा ने मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक का समर्थन करने के बजाय उन्हें गद्दी छोड़ने के लिए कह दिया था. किसी भी तानाशाह या शाह को ये बात बुरी लगेगी.

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उसके बाद सउदी प्रशासन ने बहरीन में हो रहे प्रदर्शन के खिलाफ भारी बल प्रयोग किया. अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स उस समय वहां के दौरे पर थे. उन्होंने ये बहरीन के शाह का ये तर्क मानने से इनकार कर दिया कि इस प्रदर्शन के पीछे ईरान का हाथ था.

ईरान पर हमले के लिए सउदी की बेचैनी को समझने के लिए रॉबर्ट गेट्स की आत्मकथा 'ड्यूटी- मेमॉयर्स ऑफ ए सेक्रेटरी एट वार' पढ़ी जा सकती है. अपनी जीवनी में उन्होंने सउदी के तत्कालीन शाह अब्दुल्लाह से अपनी जुलाई 2007 में हुई मुलाकात के बारे में बताया है. गेट्स के अनुसार पहली बार किसी विदेशी नेता के साथ बैठक में उन्होंने अपना 'आपा खो दिया.' शाह अब्दुल्लाह चाहते थे कि अमेरिका ईरान पूरा सैन्य हमला कर दे. गेट्स लिखते हैं कि बात जितनी आगे बढ़ती जा रही थी मुझे उतना ही गुस्सा आता जा रहा था.

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ऐसे ही कारणों से ओबामा ने खाड़ी की रियासतों को "फ्री-राइडर" कहा था. उनके इस जुमले से सऊदी के तत्कालीन शाह और उनके विदेश मंत्री तुर्की अल-फैसल नाराज हुए थे.

लेकिन ओबामा और गेट्स दोनों ये बात भूल गए कि पहले खाड़ी युद्ध (1990-91 के दौरान, जार्ज बुश सीनियर तब राष्ट्रपति थे) में अमेरिका ने जो भी खर्च किया था उसे अपने सहयोगी देशों से वसूल लिया था.

अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के अनुसार खाड़ी युद्ध की अनुमानित लागत 61 अरब डॉलर थी. कुवैत, सऊदी अरब और खाड़ी रियासतों ने 36 अरब डॉलर, जर्मनी और जापान ने 16 अरब डॉलर की मदद की थी.

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ऐसे में सउदी शाह के यह सोचने के लिए माफ किया जा सकता है कि उनके पास युद्ध का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त पैसा है इसलिए अमेरिका ईरान पर हमला कर देगा.

ध्यान देने की बात है कि पहले खाड़ी युद्ध में एक लाख इराक़ी सैनिक मारे गए थे. जबकि 383 अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान देनी पड़ी थी.

सीरिया का सवाल


सउदी और अमेरिका के बीच गतिरोध के कुछ अन्य कारण भी हैं. इनमें सबसे अव्वल है सीरिया पर अमेरिका द्वारा हवाई हमला न करके बसर अल-असद को सत्ता से बेदखल न करना.

लीबिया में मजबूरन दखल देकर मुआमार अल-गद्दाफी को सत्ता से बेदखल करके अमेरिका को सबक मिल चुका था. गद्दाफी के गद्दी से हटने के बाद लीबिया नाना प्रकार के आतंकियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया.

पहले खाड़ी युद्ध में कुवैत, सउदी अरब और खाड़ी रियासतों ने 36 अरब डॉलर अमेरिका को दिए थे

ओबामा ने सीरिया पर बमबारी भले न की हो लेकिन वो ढाई लाख सीरियाई नागरिकों की मौत को नहीं रोक सके. वो क़तर, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की को सीरिया में छद्म युद्ध लड़ने के लिए प्रशिक्षित लड़ाके भेजने से नहीं रोक सके.

ओबामा ने कुख्यात आतंकी समूह इस्लामिक स्टटे या डाएश को रोकने की भी पर्याप्त कोशिश नहीं की क्योंकि उनके सहयोगी देशों ने सीरिया और इराक़ में इस समस्या को बढ़ाने में मदद की थी. 

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अमेरिका के कॉम्बैटिंग टेररिज्म सेंटर के अनुसार इस्लामिक स्टेट के लिए 2013-14 में लड़ने वाले 4188 विदेशी आतंकियों में सबसे अधिक सउदी अरब के थे. वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले में शामिल आतंकियों में 15 सऊदी नागरिक थे.

क्या इसके बाद भी अमेरिका को सउदी अरब और आंतक के संबंध के लिए सुबूत चाहिए? कहना न होगा, आतंक को पनाह देने में पाकिस्तान तेजी से अपना नंबर एक का स्थान छिन रहा है.

सउदी अरब से अमेरिका को पहले ही दूरी बना लेनी चाहिए थी. इराक़, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान युद्ध का अंत अमेरिका के लिए अच्छा नहीं रहा.

इसराइल बनाम फ़लस्तीन, शिया बनाम सुन्नी, राजशाही बनाम गणतंत्र, नरमपंथी बनाम चरमपंथी जिहादी के बीच जो परंपरागत टकराव है वो पिछले कुछ समय में तीखा हुआ है.

पश्चिम एशिया में अमेरिका इन सभी मामलों में किसके पक्ष में रहा है? ऐसे में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को जिस तरह लोकप्रियता मिली है वो हैरान नहीं करती है.

First published: 27 April 2016, 0:16 IST
 
रवि जोशी

Retired diplomat, presently a Visiting Fellow, Observer Research Foundation.

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