Home » इंटरनेशनल » What Qamar Bajwa's appointment as army chief means for Pak and India
 

क़मर जावेद बाजवा: भारत-पाकिस्तान के लिए नए सेना प्रमुख के मायने

तिलक देवाशर | Updated on: 28 November 2016, 7:48 IST
QUICK PILL
  • नियंत्रण रेखा की अच्छी समझ रखने वाले क़मर बजवा 29 नवंबर को पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख का कार्यभार संभालेंगे. 
  • पाकिस्तान सेना प्रमुख पद के लिए जब उनका नाम आया था, तब एक विरोध महज़ इसलिए हुआ था कि उनके परिवार में कुछ अहमदिया मुसलमान थे.

पाकिस्तान में सेना का नया मुखिया कौन होगा, इसे लेकर अब हर तरह की अटकलें और अफवाहें थम गई हैं. महीनों तक चली लंबी कवायद के बाद सेना प्रमुख राहील शरीफ की जगह लेफ्टिनेंट जनरल क़मर जावेद बाजवा को नया सेना प्रमुख बनाए जाने का ऐलान हुआ है. वह देश के 16वें सेना प्रमुख होंगे. इसके अलावा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने वरिष्ठतम अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल ज़ुबैर हयात को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) का नया चेयरमैन बनाने का फैसला किया है. 

पीएम शरीफ ने सेना प्रमुख पद पर चयन के मामले में वरिष्ठता के सिद्धान्त का पालन नहीं किया है. जनरल बाजवा इस पद के लिए शार्ट लिस्टेड चार लेफ्टिनेन्ट जनरलों में सबसे जूनियर थे. नवम्बर 2013 में प्रधानमंत्री शरीफ ने जब जनरल राहील शरीफ को सेना प्रमुख बनाया था, तब भी जनरल राहील वरिष्ठतम नहीं थे. बाजवा और हयात को फोर-स्टार जनरल के रैंक पर पदोन्नति दी गई है. ले. जनरल बाजवा 29 नवम्बर को अपना कार्यभार संभाल लेंगे. 29 नवम्बर को वर्तमान सेना प्रमुख राहील शरीफ सेवानिवृत्त होंगे.

बलूच रेजिमेंट

लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा बलूच रेजिमेंट से ताल्लुक रखते हैं. इस रेजिमेन्ट से सेना प्रमुख बनने वाले वह चौथे व्यक्ति होंगे. उनसे पहले इसी रेजीमेन्ट के तीन अन्य जनरल याह्या खान, जनरल असलम बेग और जनरल कयानी सेना प्रमुख बनाए जा चुके हैं. दिलचस्प यह है कि इनमें से किसी का भी संबंध बलूच संस्कृति से नहीं था.

जनरल बाजवा वर्तमान में सेना मुख्यालय में प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन महानिरीक्षक हैं. जनरल राहील भी सेना प्रमुख बनने से पहले इसी पद पर थे. सेनाध्यक्ष पद के लिए मुख्य रूप से चार दावेदार मैदान में थे. अन्य दावेदारों में मुल्तान में कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल अश्फाक नदीम अहमद, बहावलपुर कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जावेद इकबाल रामदेई और जनरल स्टाफ के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जुबैर हयात शामिल थे.

भारत के साथ नियंत्रण रेखा पर वर्तमान तनाव के चलते जनरल बाजवा की नियुक्ति को पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इस पद की दौड़ में शामिल रहे अन्य प्रतिभागियों की अपेक्षा जनरल बाजवा के पास नियंत्रण रेखा से जुड़े मामलों का व्यापक अनुभव है. उन्होंने 10 कोर में लेफ्टिनेंट कर्नल के तौर पर भी सेवा दी है. यह कोर पाकिस्तानी सेना की सबसे बड़ी कोर है. यह कोर नियंत्रण रेखा के क्षेत्रों का जिम्मा संभालती है. जब वह जीएसओ थे, तब उन्होंने मेजर जनरल के तौर पर सेना की उत्तरी कमान का नेतृत्व किया है.

कौन हैं बाजवा

जनरल बाजवा के बारे में तीन दिलचस्प बातें ऐसी हैं जिन्हें जान लेना जरूरी है.

1- नए सेना प्रमुख पद के लिए जब उनकी नियुक्ति के बारे में चर्चा चल रही थी, तब लेफ्टीनेंट जनरल बाजवा को इस पद के लिए अयोग्य ठहराने के लिए यह कुतर्क रखा गया था कि उनके एक दूर के रिश्तेदार अहमदी हैं और वह भी उनमें से एक हो सकते हैं. इस अभियान का नेतृत्व एक सीनेटर प्रो. साजिद मीर ने किया था जो जमीयत अहले हदीस पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं. 

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर बाजवा को सेना प्रमुख पद बनाया गया तो वह देश को बर्बादी के रास्ते पर ढकेल देंगे. हालांकि इसके बाद बाजवा ने खुद कहा कि वह अहमदी नहीं हैं.

2- जनरल बाजवा ने कांगो में संयुक्त राष्ट्र के मिशन में ब्रिगेड कमांडर के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं. उनके साथ पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने भी डिवीजन कमांडर के तौर पर सेवा दी थी. यहां वह जनरल सिंह के मातहत थे.

3- नए सेना प्रमुख के पास कश्मीर और गिलगिट पाकिस्तान में व्यापक भागदारी के कारण नियंत्रण रेखा से जुड़े मामलों का व्यापक अनुभव है. साथ ही वह भारत की अपेक्षा जिहादी ताकतों को पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा भी मानते हैं.

नियंत्रण रेखा विशेषज्ञ

नवाज शरीफ के लिए जनरल बाजवा सभी तरह से खरे उतरते हैं. वह अपने व्यापक अनुभवों के कारण नियंत्रण रेखा पर गहराते जा रहे तनावों से बखूबी निपट सकते हैं. वह तनाव घटाने या तनाव बढ़ाने की दिशा में दोनों तरीके के काम कर सकते हैं. ठीक इसी समय, घरेलू स्तर पर जिहादी ताकतों को बड़ा खतरा मानने के उनके विचार नवाज शरीफ के लिए भारत के साथ संबंध मजबूत करने और व्यापार बढ़ाने की दिशा में कारगर हो सकते हैं.

हालांकि, शरीफ के बारे में यह भी माना जाता है कि उनके सेना के साथ संस्थागत रिश्ते हैं. वह सेना के साथ इस सहमति पर चलते हैं कि भारत उनके देश का शत्रु देश है. यहां तक कि जनरल कयानी के कार्यकाल में, जब आंतरिक आतंकवाद को सुरक्षा खतरों के रूप में से एक खतरा मान लिया गया था, तब भी उन्होंने भारत के साथ विद्वेष या बैर नहीं छोड़ा था. बहरहाल, यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि नियंत्रण रेखा पर जनरल बाजवा का रुख आतंकवाद को लेकर किस तरह का रहेगा. 

चुनौतियां

जनरल राहील अपनी विरासत में तीन बड़ी चुनौती छोड़कर जा रहे हैं जो इस तरह हैं. जून 2014 में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ उत्तरी वजीरीस्तान में ऑपरेशन जरब-ए-अज्ब शुरू करना, उनसे पहले जनरल कयानी यह ऑपरेशन शुरू करने से बच रहे थे; कराची में अभियान जिससे शहर में हिंसा कम हुई और एमक्यूएम का वर्चस्व टूटा; सेना और सरकार के बीच सीधे तनावों के बीच नागरिक सरकार का समर्थक होना.

अनेक मौक़ों पर जनरल राहील नागरिक सरकार को उखाड़कर फेंक सकते थे लेकिन वह किसी तरह की लालच में नहीं झुके. इसके बजाए उन्होंने 'केन्द्र और प्रान्तों दोनों जगहों पर एपेक्स कमेटियों' के जरिए तंत्र बनाने का रास्ता चुना. उन पर 'नरम रुख' अपनाने का भी ठप्पा लगा लेकिन जनरल शरीफ ने सुनिश्चित किया कि सेना तभी दखल करेगी, जब वह जरूरत समझेगी.

जनरल बाजवा को बहुत ही तेजी के साथ उत्तरी वजीरिस्तान और कराची में जो कुछ हासिल हुआ है, उस पर कदम बढ़ाने होंगे. दोनों ही ऑपरेशन पिछले कुछ महीनों से असफल होते दिख रहे हैं. अनेक आतंकी संगठनों ने क्वेटा, पेशावर, मर्दान, मोहमंद और शिकारपुर में क्रूर हत्याकांड वाले हमलों को अंजाम दिया है. ये हमले घात लगाकर किए गए हैं. धर्मान्ध हत्याएं कराची में फिर से होती दिख रही हैं.

जनरल बाजवा के सामने जनरल राहील को जनता और सोशल मीडिया से मिली अप्रत्याशित लोकप्रियता से भी प्रतिस्पर्धा की चुनौती होगी. इसी लोकप्रियता के कारण जनरल राहील सभी मोर्चों पर आगे रहे हैं. वहां की आम जनता में यह धारणा घर कर गई है कि गर्वनेन्स में कमी आने पर सेना प्रमुख के कर्तव्यों के चार्टर में एक यह भी है कि वह अलोकप्रिय और भ्रष्ट निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंकती है.

देखने वाली बात तो यह होगी कि जनरल बाजवा कुछ उसी तरह से करेंगे जिस तरह से उनके कुछ पूर्ववर्तियों ने किया है या जनरल राहील की तरह उसका निवारण करेंगे. नवाज शरीफ के पिछले रिकॉर्ड को देखा जाए तो सेना प्रमुखों के साथ उनके रिश्ते अलग रहे हैं, पर साथ ही वह विवादों से घिरे भी रहे हैं. पनामा पेपर्स मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है. आने वाले दिनों में हालात कैसे होंगे, यह देखने के लिए लम्बा वक्त नहीं है.

First published: 28 November 2016, 7:48 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

पिछली कहानी
अगली कहानी