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मोदी-पुतिन मुलाकात: पुरानी दोस्ती में व्यापार का ईंधन डालने की जरूरत है

प्रभात पी शुक्ला | Updated on: 24 December 2015, 8:08 IST
QUICK PILL
  • भारत और रूस पारंपरिक रूप से मित्र देश रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों देशों के संबंधों में एक ठहराव आ गया है.
  • भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस की यात्रा पर हैं. दोनों देश ऊर्जा, रक्षा, भू-राजनीति समेत कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर साझेदारी करके अपना संबंध बेहतर बना सकते हैं.
भारत और रूस को हमेशा ही पुराना और भरोसेमंद दोस्त माना गया है. यह बात आज भी काफी हद तक सच है.

फिर भी वस्तुपरक मूल्यांकन करने पर हमें ये मानना होगा कि पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के रिश्ते में कुछ ठहराव आया है. दोनों देशों को भविष्य में अपने रिश्ते बेहतर बनाने के लिए कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे.

इसकी शुरुआत दोनों देशों के बीच संवाद को बेहतर बनाकर करनी होगी. दोनों देशों के संबंध बेहतर बनाने के लिए पहले ये समझना जरूरी है कि दोनों देश चाहते क्या हैं? पर सबसे पहले ये जालला होगा कि रूस क्या चाहता है.


रूस की चाहत


रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की राष्ट्रीय प्रेसवार्ता में आर्थिक मुद्दे से जुड़े ढेरों सवाल पूछे गये. उन्होंने सभी का विस्तार से जवाब भी दिया. इस सवाल-जवाब मे जो बात उभर कर सामने वो कुछ यूं है:

  • रूस का सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) इस साल 3.7 प्रतिशत कम होगा
  • मुद्रा स्फिति 12 प्रतिशत से अधिक रहेगी
  • रूसी मुद्रा रूबल का अवमूल्यन हुआ है

हालांकि ऐसा लग रहा है कि रूस के बुरे दिनों के अंत की शुरुआत हो चुकी है. साल की तीसरी तिमाही तक रूस का औद्योगिक और कृषि उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ने लगा था. भले ही इसकी रफ्तार थोड़ी सुस्त रही हो.

रूस की सबसे बड़ी चिंता तेल और गैस की गिरती कीमतें हैं. उसके बजट पर इसका सीधा असर हुआ है. रूस ने अगले साल के बजट में भी क्रूड तेल की अनुमानित कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल रखी है जबकि इसकी मौजूदा दर 38 डॉलर है.

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जिस तरह चीन को ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप से बाहर रखा गया उसी तरह रूस को ट्रांस-एटलांटिक ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप से दूर रखा गया है. इसके दूरगामी आर्थिक असर को देखते हुए पुतिन इससे काफी आहत हैं.

रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और तुर्की पर रूस की तरफ से लगाया गए प्रतिबंध से भारत को एक मौका मिला है

रूस और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है. इनमें से प्रमुख है, नार्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन का विस्तार. सितंबर में पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भी ये मुद्दा उठाया था.

यूक्रेन और सीरिया में चल रहे संकट में भी रूस पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका के बरक्स खुद को अकेला पा रहा है.

भारत क्या कर सकता है?

रूस की मौजूदा चिंताओं से पता चलता है कि भारत किस तरह उसके लिए धीरे-धीरे अप्रासंगिक होता जा रहा है. भारत की भी कमोबेश यही स्थिति है. अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और क्षेत्रीय समस्याओं खासकर आतंकवाद के संदर्भ में भारतीय चिंताओं में रूस की भूमिका सीमित होती जा रही है.

बहरहाल सौभाग्यवश हमारे पास दोनों देशों के बीच रिश्तों को बेहतर करने के लिए कई विकल्प हैं.

बेहतर संबंधों का पहला आधार बेहतर आर्थिक संबंध हो सकते हैं. लंबे समय से दोनों देश आपसी निवेश और कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इस दिशा में कोई बड़ी प्रगति नहीं हो पायी है. इसमें कई मुश्किलें हैं लेकिन बड़े नतीजे पाने के लिए बड़ा प्रयास करना ही पड़ता है.

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रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और तुर्की पर रूस की तरफ से लगाए गए प्रतिबंध से भारत को एक मौका मिला है. वो खाने-पीने की चीज़ें, दवाएं और टेक्सटाइल निर्यात की पहल कर सकता है.

रूसी कारोबार के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता से छुटकारा पाना चाहते हैं. पिछले साल के संयुक्त सम्मेलन में ये मुद्दा उठा था. इसके कुछ फ़ायदे होने के बावजूद इस मामले पर रूस का समर्थन करना उचित नहीं होगा.

ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश महत्वपूर्ण साझेदारी कर सकते हैं. रूस से भारत तक पाइपलाइन बिछाने जैसे ख्वाब अभी दूर की कौड़ी नज़र आते हैं. बेहतर होगा कि दोनों देश परमाणु ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करें. रूस भारतीय जवाबदेही कानून के प्रति थोड़ा संशकित है फिर भी उसकी मदद से यहां दो परमाणु रिएक्टर पहले ही बन रहे हैं. उसी जगह पर चार और रिएक्टर बनाए जा सकते हैं.

ऊर्जा क्षेत्र में रूस और भारत महत्वपूर्ण साझेदारी कर सकते हैं. रक्षा क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम कर सकते हैं

लिक्विफाइड नेचुरल गैस के मामले में भी दोनों देश सहयोग कर सकते हैं. कुछ खाड़ी देश पूर्वी एशिया में इसका पर्याप्त निर्यात करते हैं. भारत रूस से इसे बड़ी मात्रा में आयात कर सकता है.

इसके लिए भारत अदल-बदल की नीति पर भी काम कर सकता है. जिसके तहत खाड़ी देशों का शिपमेंट भारत आए और रूस अपनी आपूर्ति सीधे पूर्वी एशिया के देशों को भेज दे. इससे समय और परिवहन के खर्च की बचत होगी. इस दिशा में सहयोग की शुरुआत के लिए पूर्वी देशों में दक्षिण कोरिया सबसे अच्छा विकल्प है.

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इससे इन देशों के आपसी कारोबार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है. इससे पश्चिमी एशिया में तेल के कारण पैदा हुआ भू-राजनीतिक तनाव भी कम हो सकता है.

पिछले सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रक्षा क्षेत्र के महत्व पर जोर दिया था. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस क्षेत्र में रूस भविष्य में भारत का सबसे बड़ा साझेदार बना रहेगा.

ये सच है कि पिछले कुछ सालों से रक्षा क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा साझेदार अमेरिका रहा है. लेकिन ये भी सच है कि भारत और रूस का संबंध एक अलग दायरे में आता है.

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि गुणवत्ता, कीमत और सर्विस के मामले में रूस के संग आने वाली दिक्कतें कम नहीं हो रही हैं. ऐसा नहीं कि पूरा दोष रूस का ही है लेकिन इसकी लिए बड़ी हद तक वही जिम्मेदार है. पाकिस्तान को हथियार बेचने का रूस का फैसला समझदारी भरा नहीं था. भारत को भी इस बारे में अपनी राय साफ-साफ सामने रखनी चाहिए.

भूराजनीतिक साझेदारी

जब से केंद्र में एनडीए सरकार बनी है तब से ये साफ दिख रहा है कि दोनों देश आपसी संबंधों को बेहतर बनाना चाहते हैं. साल 2014 में जारी दोनों देशों के साझा बयान का सबसे अहम बिंदु था, 'भारत के जम्मू-कश्मीर और रूस के चेचन्या में आतंकवाद की आलोचना.' दोनों देशों को इस तरह की बुनियादी समझदार की जरूरत है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई दूसरा स्थायी सदस्य देश भारत के संग ऐसी समझदारी विकसित नहीं कर सकता. आशा है कि आने वाले सम्मेलन में ये समझ और मजबूत होगी.

दोनों देशों के बीच सबसे प्रमुख भूराजनीतिक क्षेत्र अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया हैं. इस इलाके में दोनों देशों के हितों में कोई टकराव नहीं है फिर भी दोनों के बीच इस क्षेत्र की राजनीति को लेकर कोई ठोस सहमति नहीं है.

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फिलहाल ऐसा लगा है कि अंतराराष्ट्रीय कूटनीति को चीन और अमेरिका निर्देशित कर रहे हैं. दोनों देश अफ़गानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच किसी तरह की समझौता करवाने की कोशिश कर रहे हैं.

भारत और रूस को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा. उन्हें इस भविष्य की रणनीति में ठोस तरीके से विचार करना होगा. दोनों देश अफ़गानिस्तान में सैन्य आपूर्ति करके इस दिशा में शुरुआत कर सकते हैं. थोड़ी मात्रा में आपूर्ति शुरू हो चुकी है लेकिन इसे बढ़ाने की जरूरत है. अफ़गानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के उभार को ध्यान में रखते हुए दिशा में तेज़ी से पहल किए जाने की जरूरत है.

आतंकवाद जैसे मुद्दों पर रूस और भारत को ठोस सहमति बनानी होगी क्योंकि दोनों देश इसके शिकार हैं

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ अन्य मुद्दों पर भी दोनों देश एक साथ आगे बढ़ सकते हैं. पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत एक फ़ोरम बनाने की वकालत की है जो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, जलवायु परिवर्तन और जैव पारिस्थितिकी को नष्ट करने के मुद्दे पर समेकित रूप से विचार करेगा.

भारत के लिए ये गंभीर मुद्दे हैं. अभी तक यूएन सम्मेलन में ऊर्जा उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन ही मुख्य विषय रहे हैं. भारत की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए ये मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं.

भारत और रूस को पश्चिम के बरक्स कुछ सांस्कृतिक मुद्दों पर चीन के साथ मिलकर एक साझा विचार विकसित करना चाहिए. मसलन, मानवाधिकार का प्रश्न, राष्ट्रीय संप्रभुता और सिविल सोसाइटी जैसे मुद्दे.

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First published: 24 December 2015, 8:08 IST
 
प्रभात पी शुक्ला @catchhindi

रूस में भारत के पूर्व राजदूत. विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फ़ेलो.

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