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जमात-ए-इस्लामी को प्रतिबंधित करने से अवामी लीग को किसने रोका हैः बीएनपी

सादिक़ नक़वी | Updated on: 19 August 2016, 7:40 IST

बांग्लादेश मुश्किल में है. ढाका के डिप्लोमेटिक इन्क्लेव के एक पॉश रेस्तरां में पिछले दिनों हुए हमले और परेशानहाल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाये जाने की कुछ अन्य घटनाओं ने फिर से साबित किया है कि भारत का यह पड़ोसी देश इस समय कट्टर इस्लामी आतंकी संस्थाओं के निशाने पर है.

जब से सत्तासीन अवामी लीग के बनाये युद्ध अपराध अधिकरण (वार क्राइम ट्रिब्यूनल) के समर्थन में शाहबाग आंदोलन हुआ, और फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमात-ए-इस्लामी को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने का फैसला आया, इस पर जमात की राजनीतिक सहयोगी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भी चुनावों का बहिष्कार कर दिया, तब से यह घमासान और तेज हो गया है.

भारत पारंपरिक तौर पर अवामी लीग के करीब रहा है और इसने इस संकट के दौरान व्यावहारिक नीति अपनाते हुए चुनावों का समर्थन किया. लेकिन बीएनपी लगातार यह दावा करता रहा है कि चुनाव के नाम पर चुनाव का मजाक बनाया गया. दूसरी ओर भारत अतिवादियों पर नियंत्रण के लिए अवामी लीग सरकार की ओर से उठाये गये कदमों का लगातार समर्थन कर रहा है. हालांकि इन कदमों की बांग्लादेश के अन्य दल यह कह कर आलोचना करते रहे हैं कि यह विपक्ष को नष्ट करने की कोशिश है.

कारोबारी से राजनीतिज्ञ बने अमीर खुसरु महमूद चौधरी, जो वाणिज्य मंत्री के तौर पर काम कर चुके हैं और हाल ही में बीएनपी की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था स्टैंडिंग काउंसिल के लिए चुने गये हैं, इस बात से सहमत हैं कि यह संकट की स्थिति है.

हालांकि वो यह भी कहते हैं कि देश में प्रजातंत्र के अभाव की वजह से इस्लामी शक्तियों का उदय हुआ है. भले ही भारत ने मामले के एक पहलू को अपना समर्थन जारी रखा हो, चौधरी के मुताबिक यह धारणा पड़ोसी के लिए अच्छी नहीं है कि भारत इस संकट को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है. वह यह भी कहते हैं कि बीएनपी और भारत के बीच बेहतर संबंधों की स्थापना ही वक्त की जरूरत है. वह कहते हैं, 'संबंध राज्यों के बीच होने चाहिए, दलों के बीच नहीं. साथ ही दोनों देशों के लोगों के बीच भी.'

बांग्लादेश के संकट और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर कैच ने चौधरी के साथ बातचीत की. उनसे बातचीत के चुनिंदा अंश हम यहां पेश कर रहे हैं:

बांग्लादेश के मौजूदा संकट को आप कैसे देखते हैं? बड़े पैमाने पर कट्टरता फैल रही है, बड़ी संख्या में युवा आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाये गये हैं. और इस बीच सरकार यह कहती है कि बीएनपी इससे प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ी हुई है.

दरअसल दिक्कत यहीं पर है. अगर सरकार ही समस्याओं की असलियत को मानने से इन्कार कर दे, तो फिर मसलों को हल करना मुश्किल हो जायेगा.

सबसे पहली बात, पिछले छद्म चुनावों के बाद से देश में प्रजातांत्रिक मूल्यों में गिरावट की स्थिति आई है और नागरिक हाशिये पर ढकेल दिये गये हैं, जिसके कारण राजनीतिक आजादी का माहौल कमजोर होने लगा है. जब आप किसी नागरिक को चुनाव से ही बाहर कर देंगे, तो फिर इसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तौर पर होगा यह कि वह जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों में भी उपेक्षित होता चला जायेगा. मसलन नौकरी पाने के लिए आपको अवामी लीग का होना जरूरी है. न्यायपालिका को देखें तो न्याय तभी मिलेगा, जब आप उनके हिसाब से चलेंगे.

राजनीतिक आजादी का माहौल इतना कमजोर पड़ गया है कि नागरिक अधिकारों, कानून का शासन, मीडिया की आजादी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अतिवादियों का कब्जा हो गया है. चूंकि सरकार विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है, ऐसे में सर्वोच्च पद पर बने रहने के लिए प्रधानमंत्री शेख हसीना को तमाम अलोकतांत्रिक काम करने पड़ रहे हैं.

विपक्ष को नष्ट करने का अभियान छेड़ दिया गया है. दमन और उत्पीड़न का दौर जारी है. बड़ी संख्या में लोगों का अपहरण किया जा रहा है. लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है, पुलिस की कस्टडी में लोगों को उत्पीड़ित किया जा रहा है और काफी लोग सलाखों के पीछे हैं. इन्हीं वजहों से हालात स्थिर नहीं हो पा रहे हैं. इस्लामी और कट्टरपंथी ताकतों के लिए बांग्लादेश अब आसान निशाना बन चुका है.

लेकिन बीएनपी का गठबंधन तो इस्लामी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी के साथ है, जिसके कैडर के बारे में माना जाता है कि वह हिंसा और हत्याओं में संलिप्त है.

बहुत सारी हिंसक घटनाओं में दोषियों का संबंध सत्ता दल से पाया गया है. फिर भी कोई उनको कोई दोषी नहीं मान रहा है. बीएनपी को तो छोड़ ही दीजिए, एक भी ऐसा मामला नहीं है जिसमें जमात के किसी व्यक्ति के शामिल होने का सबूत मिला हो. यही समस्या है.

जब आप अस्वीकार के भाव में जी रहे हैं और इस्लामवादियों और कट्टरपंथियों जैसे खतरनाक तत्वों का इस्तेमाल करना चाहते हैं और इस मसले का इस्तेमाल विपक्ष को नेस्तनाबूद करने के लिए कर रहे हैं, तो आप एक बहुत ही खतरनाक क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं. बीएनपी और बेगम खालिदा जिया ने इस खास मसले पर एकता का आह्वान किया, क्योंकि अन्य मसलों पर लोगों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह तो वजूद पर संकट पैदा कर रहा है.

अवामी लीग का कहना है कि यह सेकुलर लोगों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच का संघर्ष है जो बांग्लादेश में दिख रहा है.

वे लोग केवल राजनीतिक जमीन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. जमात-ए-इस्लामी के मामले में उनका कहना है कि जमात की राजनीतिक विचारधारा संविधान के खिलाफ है. वह यह भी कहते हैं कि इनकी वैधता सवालों के घेरे में है. जब आपने इतने सारे दलों, इतनी सारी वेबसाइट, इतने सारे अखबारों और टेलीविजन स्टेशनों को प्रतिबंधित कर दिया है, तो आप जमात पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं? आखिर वह कौन सी चीज है जो उन्हें बांग्लादेश में जमात को प्रतिबंधित करने से रोक रही है?

अगर कोई राजनीतिक दल कानूनी तरीके से काम कर रहा है और कोई दूसरा दल उसके साथ कूटनीतिक, रणनीतिक या चुनावी समझौता करता है, तो किसी को इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए. अवामी लीग और जमात भी पहले एक साथ थे और उन्होंने बीएनपी के खिलाफ एक कार्यवाहक सरकार की मांग को लेकर साथ ही संघर्ष किया था. जमात के साथ हमारा गठबंधन महज कूटनीतिक है और मेरा मानना है कि हम लोग उनके साथ चुनावी गठबंधन नहीं करने वाले हैं.

साल 1971 का मुक्ति संघर्ष बांग्लादेश के लोगों के लिए काफी भावनात्मक मसला है. काफी अतिवादी घटनाएं हुईं, युद्ध अपराध के साफ-साफ सबूत हैं. फिर बीएनपी युद्ध अपराध अधिकरण के इतना खिलाफ क्यों है?

हम यह कहते रहे हैं कि उन सभी लोगों से जवाबतलब होना चाहिए जिन्होंने देश के साथ कुछ भी गलत किया है. सभी न्यायिक प्रक्रियाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक मौजूद हैं. हम केवल यह कह रहे हैं कि इस काम को कानूनी रूप से किया जाये, अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से किया जाये और इसे राजनीतिक मसला न बनाया जाये.

लेकिन यह राजनीतिक मसला तो है ही न.

इसे अपने राजनीतिक विरोधियों पर अत्याचार करने का हथियार मत बनाइये. अवामी लीग में भी ऐसे लोग हैं जो उन कामों में लिप्त थे, लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जा रहा. यह तो सरासर भेदभाव है. जब अवामी लीग और जमात-ए-इस्लामी साथ मिल कर बीएनपी के खिलाफ एक कार्यवाहक सरकार की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे थे, तब युद्ध अपराधियों का मामला सामने नहीं आया.

मैं कहता हूं अगर वे इन मामलों को बाद में लेकर आये, तो भी अच्छी बात है. लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से होना चाहिए. कई सारे अन्य देश भी इसी प्रक्रिया से गुजरे हैं.

बीएनपी को एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी क्यों नहीं माना जाता?

मेरा मानना है कि बीएनपी तो अवामी लीग से भी अधिक सेक्युलर है. वे बंगाली राष्ट्रवाद की बात करते हैं, जबकि हम बांग्लादेशी राष्ट्रवाद की बात करते हैं, जो अधिक समावेशी है.

तो इस मामले में क्या आप धारणा और लोगोंं के बीच छवि की लड़ाई हार गये हैं?

जो लोग बांग्लादेश की सच्चाई जानते हैं, उनको तथ्य पता हैं. कौन से लोग हिन्दुओं और ईसाइयों की संपत्ति हथिया रहे हैं? अवामी लीग के सदस्य. उनके ही एक नेता ने एक किताब में लिखा कि हिन्दुओं से संबंधित 70 फीसदी संपत्ति अवामी लीग के सदस्यों ने हथियाई है, किसी अन्य दल के लोगों ने नहीं.

बीएनपी के शासन काल में ऐसा संघर्ष नहीं था. जब भी अवामी लीग सत्ता में आती है, जमीनों पर कब्जे शुरू हो जाते हैं. हिन्दुओं के मंदिरों पर हमला बोला जाता है और उन्हें जला दिया जाता है. भारत में जो बातें बतायी जाती हैं, वे एकतरफा होती हैं. भारतीयों को बांग्लादेश की असलियत से अधिक परिचित होने की जरूरत है. यहीं पर बीएनपी नाकामयाब रही है.

जब बीएनपी सत्ता से बाहर होती है, तो अच्छी-अच्छी बातें करती है. लेकिन जैसे ही वह सत्ता में आती है, तो इसका झुकाव पाकिस्तान की ओर बढ़ जाता है और बांग्लादेश में तरह-तरह के आतंकी समूह सक्रिय हो जाते हैं, जो भारत के लिए परेशानियां पैदा करते हैं.

एक देश की जमीन का इस्तेमाल कर दूसरे देश में विद्रोह को बढ़ावा देने का अध्याय अब खत्म हो चुका है. और दोनों ही पक्ष ऐसा करते रहे हैं. और किसी सरकार विशेष ने यह काम नहीं किया, सत्ता में आने वाली हर सरकार ने यह किया. इसके लिए किसी खास पार्टी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. यह अध्याय अब समाप्त हो चुका है. राजनीति अब विकास की ओर, अपने नागरिकों की समस्याओं को दूर करने की ओर केंद्रित हो चुकी है. असुरक्षा की राजनीति अब प्रासंगिक नहीं रह गयी है. अब लोग आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक सहयोग की ओर देख रहे हैं क्योंकि हमारी सांस्कृतिक विरासत काफी समृद्ध रही है.

क्या भारत ने बीएनपी तक पहुंच बनाने की कोशिश की है?

दरअसल जुड़ाव का अभाव रहा है. सहज शब्दों में कहें तो तथ्यों को संतुलित तरीके से नहीं समझा गया है. अगर इस मोर्चे पर संतुलन बहाल कर लिया जाये, तो चीजें खुद-ब-खुद बदली नजर आयेंगी.

क्या आप यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत मामले के केवल एक ही पहलू को देख रहा है?

शायद यह जुड़ाव में कमी की वजह से है. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भारत जानबूझकर ऐसा कर रहा है. हमें संबंध सुधारना होगा. बांग्लादेश में और बीएनपी में भारत के लिए काफी सद्भाव है. हमारा मजबूत विश्वास है कि पड़ोसी देशों की नीतियां ही ऐसा माहौल तैयार करती हैं कि हमें सुरक्षा के मसले पर चिन्ता करने की जरूरत ही नहीं होती. हम केवल विकास से जुड़े मसलों, सांस्कृतिक मसलों, क्षेत्र के वातावरण और क्षेत्र की गरीबी पर ध्यान लगा सकते हैं. दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे कम समेकित क्षेत्र है. इसे बदलने की जरूरत है.

First published: 19 August 2016, 7:40 IST
 
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