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अमेरिकी एनएसए मैक्मास्टर की भारत यात्रा निराशाजनक, सामने आई ट्रंप की यह नीति

विवेक काटजू | Updated on: 21 April 2017, 10:08 IST


अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल एचआर मैक्मास्टर ने हाल में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत की एक छोटी यात्रा की है. यह यात्रा ऐसे दौर में हुई है जब ट्रंप प्रशासन को अब भी इस क्षेत्र के प्रति अपना नजरिया, अपनी एप्रोच पारिभाषित करना शेष है. लेकिन इतना साफ दिख रहा है कि अमरीका के लिए यह मुद्दा हाशिये पर ही है कि पाकिस्तान अपने भारत केंद्रित आतंकवादी समूहों को खत्म करे. कुल मिलाकर इस क्षेत्र के प्रति अमरीका की मानसिक व्यस्तता अफगानिस्तान में स्थिरता लाने और अमरीका के सबसे लंबे युद्ध को खत्म करने की ही है.

 

मैक्मास्टर ने क्या कहा

 

बयानों का गणित देखें: मैक्मास्टर ने काबुल में एक छोटा-सा इंटरव्यू दिया और इस्लामाबाद तथा दिल्ली में दो छोटे बयान जारी किए. अफगानिस्तान के दौरे पर रहने के दौरान मैक्मास्टर ने एक काबुल स्थित निजी चैनल को इंटरव्यू देना पसंद किया.

 

इस इंटरव्यू में जब मैक्मास्टर से पूछा गया कि अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी समूहों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है तो उन्होंने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान के नेता इस बात को समझेंगे कि यह उनके हित में है कि वे इन समूहों का खात्मा करने में पहले की उस चयनात्मक नीति को कम करें और यह समझें कि अफगानिस्तान और दूसरी जगहों पर अपनों हितों को साधने के लिए कूटनीति का सहारा लेना ही सबसे अच्छा तरीका है न कि हिंसा में शामिल होने वाले प्रतिनिधि समूहों का. ”

 

यह एक सीधा और मजबूत संदेश था. पर अफगानिस्तान के बाद “दूसरी जगहों” पर शब्द के इस्तेमाल के बावजूद, भारत के लिए इसमें कहीं कोई संतोष वाली बात नहीं है क्योंकि इस तरह के अप्रत्यक्ष और बिखरे हुए संदेशों का कोई अर्थ नहीं होता.

 

इसके अलावा न तो इस्लामाबद में और न ही दिल्ली में, मैक्मास्टर ने मीडिया से कोई बात की. दोनों ही राजधानियों में अमरीकी दूतावास से इस यात्रा के संबंध में संक्षिप्त वक्तव्य जारी मात्र किए गए. इस्लामाबाद के वक्तव्य में कहा गया कि मैक्मास्टर ने “आतंकवाद के सभी रूपों में लड़ने की जरूरत पर जोर दिया.” काबुल की सीधी लताड़ के बाद यह प्रतिक्रिया काफी ठंडी ही दिख रही है. जबकि भारत के वक्तव्य में आतकंवाद के कर्ताधर्ताओं, पोषकों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. आतंकवाद से लड़ने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग का भी चलताऊ उल्लेख किया गया.

 

इस बयानों के मायने

 

काबुल में, जहां पाकिस्तान का अफगान तालिबानी आतंकवाद के माध्यम से हस्तक्षेप अमरीका को सीधे चोट पहुंचाता है, वहां मैक्मास्टर ने तीखा संदेश दिया. यह संकेत इस्लामाबाद में आकर ढीले हो गए. पर दिल्ली में तो इस विषय पर कोई सार्वजनिक संकेत ही नहीं दिया गया.


यह वो लाइन है जिसके माध्यम से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमरीकी लोगों को यह संदेश दे रहे हैं कि वे अमरीकन लोगों के हितों की रक्षा के लिए चुने गए हैं न कि दुनिया के हितों की. भारत के नीति—निर्माताओं को इस बदलते सार्वजनिक संकेतों के जरिए जरूर सही निष्कर्ष निकालना चाहिए.

 

रशियन फैक्टर


मैक्मास्टर की इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य अफगानिस्तान पर ध्यान केंद्रित करना था. अब तक यह काफी स्पष्ट हो चुका है कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर रशिया और अमरीका आमने—सामने आ चुके हैं. अपना संकोच छोड़ते हुए रशिया अब अफगान के मंच पर वापस आ चुका है.


सच तो यह कि मैक्मास्टर की अफगान यात्रा और अफगान की स्थिति पर मास्को की मीटिंग दोनों एक ही साथ घटित हुए. रशिया के द्वारा बुलाई गई यह इस तरह की तीसरी मीटिंग थी. अमरीका को भी इस मीटिंग में बुलाया गया था, जिस न्योते को अमरीका ने यह कहते हुए नकार दिया कि यह “यह मास्को की इस क्षेत्र में प्रभाव दिखाने की एकतरफा कोशिश है.” इसके साथ ही अमरीका ने अफगानिस्तान के मुद्दे पर मास्को से बातचीत के रास्ते को भी खुला रखा है.

मास्को की मीटिंग में उन सभी क्षेत्रीय देशों ने भाग लिया जिनकी अफगानिस्तान में कोई रुचि है. ये देश हैं चीन, पाकिस्तान, ईरान, भारत और मध्य एशिया के गणतंत्र. अगर रूस अफगानिस्तान पर एक प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया को स्थापित करने में सफल हो जाता है तो इस बात की संभावना है कि वह अफगानिस्तान और इस क्षेत्र में अमरीका के प्रभाव को कमजोर कर दे.

 

अमरीका ऐसी संभावना को खारिज करना चाहता है. अफगानिस्तान के नानगढ़हर प्रांत में आईएसआईएस के कब्जे वाले क्षेत्र में अमरीका द्वारा सर्वाधिक शक्तिशाली गैर न्यूक्लियर बम के इस्तेमाल के पीछे एक उद्देश्य रूस और इस क्षेत्र को अमरीका के संकल्प और इरादों का संदेश देने रणनीति ही थी.

अमरीका ने घोषित कर दिया है कि वह अफगानिस्तान को 2017 में आईएसआईएस से मुक्त कर देगा. रशिया भी अफगानिस्तान में आईएसआईएस की मौजूदगी को लेकर आशंकित है कि वह अपने इस आधार का इस्तेमाल मध्य एशिया में फैलने के लिए करेगा. हालांकि यह अभी दूर की संभावना है, क्योंकि फिलहाल इसके पास वह क्षमता नहीं है.

पर महत्वपूर्ण यह है कि आईएसआईएस के लेकर दोनों महाशक्तियों और क्षेत्रीय देशों के बीच आम सहमति है, यह बात वे खुले तौर पर स्वीकार भले ही न करें. अमरीका ओर रशिया में जो टकराव है वो इस बात को लेकर है कि इस क्षेत्र में इसके बाद किसका प्रभाव होगा और वे तालिबान के साथ किस प्रकार का खेल खेलें.

 

ओबामा और ट्रंप का फर्क़

 


अब तक ट्रंप और ओबामा की तालिबान नीति मे आरंभिक स्तर पर कोई अंतर नजर नहीं आया है. दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि उन्हें वहां की नेशनल यूनिटी सरकार के साथ मेलजोल बना कर चलना चाहिए. दोनों ही एनयूजी के तालिबान के खिलाफ सैनिक प्रयासों की सराहना करते हैं, जो कि ऐसी कार्रवाईयों के खिलाफ कटिबद्धता भी दिखाती रहती है.

 

समस्या यह है कि तालिबान को ऐसा लगता है कि अमरीका के समर्थन से ही सही एनयूजी की जीत से वे हार नहीं सकते. अमरीका की सेना अनुसार हालात गतिरोध यानी स्टेलमेट के हैं. सवाल यह है कि क्या ट्रंप इसको तोड़ पाएंगे? इसी बिंदु पर रशिया का तालिबान के लिए समर्थन और इसका पाकिस्तान के प्रति नजरिया अमरीका के लिए समस्या पैदा कर सकता है.


तथ्य यह है कि जब तक अमरीका पाकिस्तान में घुसकर तालिबान के सुरक्षित अड्डों पर कार्रवाई करने की इच्छा नहीं दिखाता है तब तक वर्तमान यथास्थिति को बदला नहीं जा सकता. मैक्मास्टर की पाकिस्तान की सलाह एक तरफ रख दी जाएगी जैसा कि पिछले एक दशक में होता रहा है. इस तथ्य से भी इसकी पुष्टि होती है कि पाकिस्तान ने सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा के इस बयान को खूब प्रचारित-प्रसारित किया कि पाकिस्तान किन्हीं प्रतिनिधि समूहों का उपयोग करता है. चाइनीज और अब एक हद तक रशिया पाकिस्तान को अफगान मुद्दे पर अमरीका के समक्ष एक तरह का कवच प्रदान कर रहे हैं.

 

भारत को क्या करना चाहिए

 क्या ट्रंप और पुतिन के बीच जारी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अब अफगानिस्तान में इस भिड़ंत के मुद्दे पर भारत को भी क्या कोई एक साइड लेना होगा? यह एक ऐसी संभावना है जिससे भारत को हर हाल में बचना चाहिए. अफगानिस्तान में भारत एक स्वतंत्र शक्ति तथा मित्र देश के रूप में समाहित है. यहां भारत का सहायता कार्यक्रम लोकप्रिय है और इसे जारी रहना चाहिए.

 

 

नरेंद्र मोदी सरकार ने अफगान सेनाओं को सुरक्षा सहायता देने की दिशा में भी काम किया है. अफगानियों के आग्रह को देखते हुए यह जारी रहना चाहिए. ओबामा प्रशासन ने अफगानिस्तान की उस नीति को बदला था जिसमें पाकिस्तान की संवेदनशीलता को देखते हुए अफगानिस्तान सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की कोई सहायता लेने से दूर रहने की कोशिश करता था. ट्रंप इस नीति में बदलाव करेंगे, ऐसा नहीं लगता है.


एनयूजी सरकार के लिए भारत का राजनीतिक समर्थन मजबूत रहना चाहिए. साथ ही भारत को तालिबान समेत सभी अफगान समुदायों को जोड़ने में संकोच नहीं करना होगा. पर इसका आशय यह नहीं है कि उन्हें औपचारिक समर्थन या मान्यता दे दी जाए. अफगान खेल में खिलाड़ी बने रहने के लिए इस तरह की शुरुआत भारत के हितों के विपरीत नहीं होगा.

 

 

 

 

 

First published: 21 April 2017, 9:28 IST
 
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