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सुषमा स्वराज ने ओढ़ लिया जबकि एक पत्रकार ने ख़ुमैनी के सामने उतार दिया था हिजाब

रंगनाथ सिंह | Updated on: 5 May 2016, 19:17 IST

भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से चादर ओढ़कर मिलीं तो भारतीय सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा हो गया. ठीक ऐसा ही हंगामा करीब 37 पहले तब भी हुआ था जब ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च धार्मिक नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी के सामने इतालवी पत्रकार ओरियाना फल्लाची ने अपनी चादर उतार दी थी. ईरान में सुप्रीम लीडर का पद राष्ट्रपति से भी बड़ा होता है.

युद्ध रिपोर्टिंग और बेबाक इंटरव्यू के लिए विख्यात ओरियाना का जन्म 29 जून 1929 को इटली के शहर फ्लोरेंस में हुआ था. वो इतालवी के साथ-साथ इंग्लिश, फ्रेंच और स्पैनिश भाषाएं जानती थीं.

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ख़ुमैनी 1979 की ईरान की इस्लामी इंकलाब के नेता थे. इस इंकलाब से रज़ा पहलवी की राजशाही का अंत हुआ और ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई.

फ़रवरी, 1979 में ख़ुमैनी करीब 14 साल के निर्वासन के बाद ईरान वापस लौटे थे. ओरियाना ने 26 सितंबर, 1979 को उनका इंटरव्यू किया.

ख़ुमैनी एक सख्त धार्मिक नेता माने जाते थे. उनसे इंटरव्यू के दौरान ओरियाना को वैसी ही चादर ओढ़नी पड़ी थी जैसी सुषमा स्वराज ने ओढ़ रखी थी.

इस इंटरव्यू का अंग्रेजी संस्करण मशहूर पत्रिका द टाइम्स में सात अक्टूबर, 1979 को प्रकाशित हुआ था. नीचे हम उस इंटरव्यू के मौजूं अंश का हूबहू हिंदी रूपांतरण पेश कर रहे हैं-

Sushma-AFP Photo/ HO / Iranian Presidency

ओरियाना


प्लीज इमाम! मैं आपसे बहुत सी बातें अभी पूछना चाहती हूं. मसलन, ये चादर जो मुझे आपसे मिलने के लिए ओढ़ने पर मजबूर किया गया, और जिसे आपके हिसाब से सभी महिलाओं को जरूर पहनना चाहिए. आप ये बताइए कि महिलाओं को आप ये पहनने के लिए मजबूर क्यों करते हैं? इस असुविधाजनक और अजीब पोशाक में लदी-फदी महिलाओं के लिए इसमें कामकाज और चलने-फिरने में काफी दिक्कत होती है? फिर भी यहां की महिलाओं को लगता है कि उन्हें पुरुषों के बराबर हक़ मिला हुआ है. उन्होंने पुरुषों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी, जेल गईं, यातनाएं सहीं. आखिर उन्होंने भी इंकलाब में मदद की है.

ख़ुमैनी


जिन महिलाओं ने इंकलाब में योगदान दिया था और दिया है वो इस्लामिक पोशाक वाली महिलाएं थीं. वो आप जैसी महिलाएं नहीं थीं जो खुद को बगैर ढंके चारों तरफ मर्दों को लुभाती घूमती हैं. मेकअप करके गलियों में अपने गले, बाल और उभारों की नुमाइश करती चलने वाली शोख महिलाओं ने शाह के खिलाफ इंकलाब में कोई मदद नहीं की थी. ऐसी महिलाओं ने कभी कोई भला काम नहीं किया. उन्हें पता ही नहीं सामाजिक, राजनीतिक या पेशेवर योगदान कैसे दिया जाता है. खुद न ढंककर वो मर्दों को भटकाती और नाखुश करती हैं. वो दूसरी महिलाओं को भी भटकाती और नाखुश करती हैं.

ओरियाना


ये सच नहीं है इमाम. बहरहाल, मैं केवल कपड़े की बात नहीं कर रही. मैं बात कर रही हूं उस तहजीब की जिसका ये प्रतिनिधित्व करता है. इंकलाब के बाद महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव किया जा रहा है. मसलन वो पुरुषों के साथ यूनीवर्सिटी में नहीं पढ़ सकतीं, काम नहीं कर सकती, बीच और स्विमिंग पुल में नहा नहीं सकतीं. उन्हें अलग से चादर में ही नहाना पड़ता है. बहरहाल, आप चादर में कैसे तैरते हैं?

ख़ुमैनी


इससे आपका कोई वास्ता नहीं है. हमारी तहजीब आपकी चिंता की मोहताज नहीं हैं. अगर आपको इस्लामी पोशाक पसंद नहीं तो आप इसे पहनने के लिए मजबूर नहीं हैं. क्योंकि इस्लामी पोशाक नौजवान और भली महिलाओं के लिए है.

इसके बाद ओरियाना ने ख़ुमैनी को धन्यवाद देते हुए कहा, "मेहबानी के लिए शुक्रिया इमाम. चूंकि आपने ऐसा कहा है तो अब मैं इस बेवकूफाना मध्यकालीन चिथड़े को फौरन उतारने जा रही हूं." यह कहकर ओरियाना ने अपनी चादर उतार दी और ख़ुमैनी से आगे सवाल पूछना जारी रखा.

ख़ुमैनी के अलावा ओरियाना के इंदिरा गांधी, कर्नल गद्दाफी, यासिर अराफात, जुल्फीकार अली भुट्टो, शाह रज़ा पहलवी और हेनरी किसिंजर के इंटरव्यू भी काफी चर्चित हैं.

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इस्लाम, शरियत और यूरोपीय मुसलमानों से जुड़े उनके विचारों के कारण उनपर इस्लामोफोबिया (इस्लाम के प्रति डर) फैलाने के भी आरोप लगते रहे थे. उनका 15 सितंबर, 2006 को निधन हो गया.

हम आपको ये बताते चलें कि शिया मौलाना ख़ुमैनी भारतीय मूल के थे और वो सूफियाना कलाम भी किया करते थे. ख़ुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी हिंदी, सन 1790 में यूपी के बाराबंकी से जाकर ईरान के ख़ुमैन गांव में बस गए थे. दरअसल अहमद मूसवी अवध के नवाब के साथ इराक़ और ईरान की धार्मिक यात्रा पर गए थे लेकिन उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला किया.

First published: 5 May 2016, 19:17 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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