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नुकसान किसे, चीन या भारत?

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 30 October 2016, 9:39 IST
QUICK PILL
देश में हर तरफ़ इस वक्त दीवाली के मौक़े पर चीनी सामानों के बहिष्कार का आह्वान किया जा रह है. मगर क्या हमने सोचा है कि इस बहिष्कार की मार कहीं हमारे ऊपर ही तो नहीं पड़ रही?

सोशल मीडिया पर पिछले करीब एक पखवाड़े से आतिशबाजी के चीनी उत्पादों और सजावटी सामान के बहिष्कार की मुहिम चल रही है. केन्द्र सरकार से लेकर अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इसे अपना समर्थन दे रहे हैं. क्योंकि चीन, भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों में बिना सही-गलत पर विचार किए आंख बन्द करके पाकिस्तान का साथ दे रहा है, इसलिए ऐसी मुहिम स्वाभाविक भी है. 

कोई बिरला ही हिन्दुस्तानी होगा जो भारत के खिलाफ चलने वाले किसी देश या उसके व्यापार को पनपाना चाहे लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस माल के आज होने वाले बहिष्कार से किसको नुकसान होगा? क्या इसका नुकसान चीन को होगा या इसकी पूरी मार भारतीय कारोबारियों पर पड़ेगी. 

अपनी भावनाओं को एक तरफ रखकर हम देखें तो दीपावली पर काम आने वाला आतिशबाजी और सजावट का सारा माल भारत आ चुका. यह सामान कानूनी तौर पर आया हो या गैर-कानूनी तरीके से आया हो लेकिन महीनों पहले भारत आया. 

एक अनुमान के अनुसार सारा माल करीब-करीब 1500 करोड़ रुपए का होगा. यह संभव नहीं है कि, चीन के  व्यापारियों-निर्यातकों ने यह माल हमें उधार में दिया हो कि बिक जाए तब पैसे दे देना. ऐसे में जब भारतीय कारोबारियों ने पैसे का भुगतान करके यह माल खरीदा है तब इसका नुकसान किसे होगा? 

भारतीय व्यापारियों को ही ना. इस बात में कोई शक नहीं कि, चीन के पटाखे हों या फुलझड़ी या फिर बिजली की सजावटी मालाएं, सारा माल घटिया होता है. चलने-जलने पर जान माल के लिए नुकसानदेह होता है लेकिन क्योंकि उसके जैसे ही भारतीय प्रोडक्ट से कम से कम आधी कीमतों पर मिलता हैं, इसलिए कारोबारी और ग्राहक दोनों को ही माफिक बैठता है.

पांव पसारता चीन

हर साल देश के कई राज्यों की सरकारें इसकी बिक्री पर रोक भी लगाती हैं लेकिन वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में वह रोक कामयाब नहीं हो पाती. होगी भी कैसे, जब खुद हमारी सरकारें चीन के साथ कारोबार बढ़ाने के करार दर करार किए जा रही हों. 

चीन के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं. भारत के प्रधानमंत्री चीन जा रहे हैं. व्यापार बढ़ाने के समझौतों पर दस्तख्त कर रहे हैं. आज से 13 साल पहले चीन से हमारा व्यापार सालाना केवल तीन बिलियन अमरीकी डॉलर था, आज यह सालाना 70-72 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया है. 

हमारी सरकारें चाहे वे मनमोहन सिंह की हो या नरेन्द्र मोदी की इस बात से अनजान नहीं हैं कि, इसका सारा फायदा केवल और केवल चीन उठा रहा है. कारण कि, भारत उसे भेज रहा है मात्र 16 बिलियन अमरीकी डॉलर का माल जबकि चीन हमको भेज रहा है 58 बिलियन अमरीकी डॉलर का माल. 

तभी चीन हमको धमका रहा है कि, भारत अगर चीन के माल का बहिष्कार करेगा तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. यह ठीक है कि, आज उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन 2020 की बात करें तो स्थिति असर डालने वाली होगी क्योंकि अनुमानों के हिसाब से तब यह व्यापार सालाना 400 बिलियन अमरीकी डॉलर से भी ज्यादा होगा. इतना व्यापार तो आज चीन अमरीका के साथ कर रहा है. 

युद्ध का असर कारोबार पर

चूंकि बीच के सालों में भारत-चीन के बीच 1962 में हुई लड़ाई के कारण दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्ध शून्य हो गए थे.  लिहाज़ा, ग्राफ जीरो से ही शुरू हुआ. बात यह भी सही है कि, छह माह पहले भारत सरकार चीन से व्यापारिक रिश्ते कैसे तोड़ लेती? उसे कोई सपना तो आ नहीं रहा था कि, चीन भारत से ऐसा व्यवहार करेगा. अब हमारी जो हालत है वह 'दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम' जैसी है. 

चीन को हमारी ताकत और इरादों का अहसास भले हो गया हो लेकिन वह बिलबिलाया हुआ है. उधर भारतीय व्यापार और व्यापारियों को भी नुकसान तो हुआ ही है भले वे बोलें नहीं . ऐसे में सरकार को ऐसी परिस्थितियों के लिए बहुत सोच-विचार कर निर्णय लेने होंगे. नीतिगत मामलों में और वह भी जहां विश्व नीति हो, केवल भावना से शायद काम नहीं चले. नीति बनाने में भावना काम आ सकती है लेकिन बनने के बाद नीति ही काम करेगी. फैसला सरकार को करना है. चीन से व्यापारिक रिश्ते रखे या तोड़ दे. दोनों नावों पर सवारी ज्यादा लम्बी शायद ही चल पाए!

First published: 30 October 2016, 9:39 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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