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पाकिस्तान में 'गायब' हुए दो भारतीय सूफ़ियों पर दोनों देश चुप क्यों हैं?

विवेक काटजू | Updated on: 24 March 2017, 8:33 IST

तीन दिन से अधिक समय तक पाकिस्तान में "गायब" रहने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह के मुख्य इमाम सैयद आसिफ अली निजामी और उनके भतीजे नाजिम निजामी ने भारत लौटने के बाद भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बुलावे पर उनसे मुलाकात की.

एक असाधारण संकेत के तौर पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनके दो राज्य विदेश मंत्री वीके सिंह तथा एमजे अकबर ने उनका स्वागत किया. यह बात गौर करने की है कि विदेश मंत्रालय ने इसके संबंध में कोई बयान या प्रेस रिलीज जारी नहीं की पर उन्होंने इमाम और मंत्रियों की इस मुलाकात की एक फोटो अवश्य जारी की है. किसी भी वक्तव्य का जारी न किया जाना भी अगर हैरान करने वाला नहीं तो असाधारण अवश्य है, विशेषकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि जिस तरह के भरपूर प्रयास सुषमा स्वराज ने सैयद आसिफ अली निजामी और नाजिम निजामी को सुरक्षित और शीघ्र भारत वापस लाने के लिए किए थे.

विदेश मंत्रालय ने ऐसा क्यों किया? अगर हम यह भी मान लें कि एक फोटो हजार शब्दों के बराबर होता है तब भी क्या सिर्फ एक फोटो प्रसारित-प्रचारित किया जाना काफी था? इसके पहले कि हम इसका जवाब खोजें, उससे पूर्व इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि तथा और ब्योरा होना जरूरी है.

 

परंपरा को जिंदा रखना


निजीमुद्दीन दरगाह 13वीं—चौदहवीं शताब्दी के बड़े सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की आरामगाह है. भारतीय उपमहाद्वीप में यह सूफी चिश्ती व्यवस्था का महत्वपूर्ण पावन स्थल माना जाता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह. दूसरे महत्वपूर्ण इबादत स्थल पाकिस्तान के पाकपट्टन में स्थित बाबा फरीद की दरगाह है, जो कि निजामुद्दीन औलिया के आध्यात्मिक गुरु कहे जाते हैं.


इन दरगाहों की सूफी परंपरा का जीवित रखने के जिम्मेदार होने के नाते इनके सरंक्षक आपस में एक-दूसरे संबंध बनाए रखते हैं. इसमें दूसरे संतों की दरगाहों की यात्रा करना भी शामिल होता है. चिश्ती व्यवस्था के सूफियों में दाता गंज बख्श के लिए विशेष आदर है, जिनकी दरगाह लाहौर में स्थित है.

ये दोनों इमाम 8 मार्च को कराची गए थे. जबकि 80 वर्षीय आसिफ निजामी अपनी 90 वर्षीय बहन और भांजे से मिलने पाकिस्तान 25 साल बाद गए थे, वहीं 60 वर्षीय नाजिम निजामी अपेक्षाकृत नियमित रूप से पाकिस्तान की यात्रा करते रहते हैं.

कराची से ये दोनों बाबा फरीद और दाता गंज बख्श की दरगाह के दर्शन के लिए क्रमश: पाक पट्टन तथा लाहौर भी गए थे. जब वे लाहौर से कराची लौट रहे थे तो नाजिम निजामी को एयरपोर्ट पर रोक लिया गया और आसिफ निजामी को कराची की फ्लाइट पकड़ने की अनुमति दी गई. उनको कराची एयरपोर्ट पर रोककर एक अनजान जगह ले जाया गया. जब वे तीन दिन बाद कराची लौटै तो पाकिस्तान के अखबारों में खबर आई कि वे दोनों सिंध के अंदरुनी हिस्से में निकल गए थे जहां खराब कनेक्टिविटी के कारण वे परिवार संपर्क में नहीं रह सके और उनको लौटने में विलंब हुआ.


दोनों इमामों ने भारत आने के बाद इसका खंडन किया है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि उनके पास उस इलाके का वीजा ही नहीं था इसलिए उन इलाकों में जाने का सवाल ही नहीं उठता. उन्होंने यह भी बताया कि जिन लोगों ने उनको रोका और कहीं ले गए थे उन्होंने उनके दस्तावेज देखे तथा यात्रा का उद्देश्य भी पूछा. दोनों इमामों ने लेकिन अपने साथ किए गए ऐसे व्यवहार को बहुत तवज्जो नहीं दी है.

 

एक इंटेलीजेंस ऑपरेशन


स्पष्ट है कि दोनों को अच्छी तरह से सोचे—समझे गए इंटेलीजेंस ऑपरेशन के तहत ही पकड़ा गया था जिसको उच्च स्तरीय अनुमति के बाद ही किया जा सकता है. उन पर अधिकतम मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए उन्हें अलग—अगल शहरों में रोका गया. साथ ही ऐसा करते हुए उनकी बड़ी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं किया गया. यह भी ध्यान देने योग्य है कि उनकी गिरफ्तारी के दो दिन बाद पाकिस्तान के व्यापक रूप से बिकने वाले अखबार उम्मत ने इस आशय की खबर प्रकाशित की जिससे उनकी प्रमाणिकता पर सवाल उठाए गए.

 

यह कहा गया कि दत्ता गंज बख्शी मस्जिद / पावन स्थल के मुखिया को उनकी यात्रा की कोई जानकारी नहीं है. साथ ही कराची स्थित निजामी परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य के हवाले से भी ऐसा ही संदेह पैदा किया गया. इसलिए उनकी गतिविधियों से संदेह पैदा होने की बात कही गई.

उम्मत की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ये दोनों इमाम कराची के लाइन्स एरिया तक ही सीमित रहे जहां कि एमक्यूएम यानी मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट काफी प्रभाव रखती है. लब्बोलुआब यह कि उम्मत की रिपोर्ट दोनों मौलानाओं की छवि बिगाड़ने का एक अभियान जैसा था.

 

उनकी छवि खराब करने का यह प्रयास इसलिए भी चौंकाता है कि पाकिस्तान का हाईकमिशन निजामुद्दीन दरगाह के सभी वरिष्ठ इमामों को पहचानता है क्योंकि पाकिस्तान के कई भारत आने वाले वरिष्ठ राजनेता दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह पर भी जाते रहते हैं. यही वजह है कि इन इमामों को जो वीजा दिया गया है उसके अंतर्गत उन्हें पुलिस को रिपोर्ट करने से छूट मिली हुई है. इस तरह के वीजा बहुत सीमित निजी व्यक्तियों को दी जाती है.

आदान—प्रदान का अंत


पाकिस्तान द्वारा दरगाह प्रमुख के साथ इस तरह के व्यवहार से यह संदेश मिलता है कि पाकिस्तान को भारत और पाकिस्तान के बीच सूफी दरगाह के प्रमुखों के बीच इस तरह का आदान—प्रदान और संपर्क में रहना रास नहीं आ रहा है. विशेषकर वे नहीं चाहते कि इनके बीच किसी तरह के उपहारों आदान-प्रदान हो. तथ्य यह भी है कि पाकिस्तान में इस्लाम का स्वरूप कट्टर होता जा रहा है और इसमें पालना की सख्ती अधिक हो रही है इसलिए पाक सत्ता—प्रतिष्ठानों में सूफी का प्रभाव कम हो रहा है.


यह कार्रवाई भारत के लिए भी एक संकेत है जो कि भारतीय इस्लाम की सूफी परंपरा को कट्टरतावाद और आतंकवाद के खिलाफ निरोधी उपाय के रूप में पेश करता आया है. पिछले वर्ष मार्च में आयोजित वर्ल्ड सूफी फोरम के अवसर पर दी गई अपनी प्रभावशाली स्पीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूफीवाद को ऐसे समय में “प्रकाश की किरण” बताया था जबकि “हिंसा की अंधेरी परछाईं लंबी होती जा रही है”.


इस मौके पर प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के स्पष्ट हवाले से कहा था मौलाना आजाद समेत कई अन्य लोगों ने धर्म के आधार पर ही विभाजन का विरोध किया था. प्रधानमंत्री ने आगे यह भी कहा था कि जब सूफीवाद का प्रेम सीमा के दोनों पार बहेगा न कि आतंकवादी हिंसा की पाश्विक ताकत तभी तो यह क्षेत्र धरती का वह स्वर्ग बनेगा जिसकी बात अमीर खुसरो ने की है. मोदी का इरादा साफ था और पाकिस्तान ने इसको हल्के में नहीं लिया होगा क्योंकि इस व्यापक उपस्थिति वाली कान्फ्रेंस में एक अहम भागीदार पाकपट्टन की बाबा फरीद दरगाह के दीवान अहमद मसूद चिश्ती भी थे.

 

बहरा करने वाली चुप्पी


पाकिस्तान ने इस मसले पर अब तक अपनी कोई अधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है, जबकि उनके विदेश मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि भारत ने दोनों गायब हुए इमामों को ढूंढ़ने के लिए संपर्क किया था. स्पष्ट है कि जब से उन्हें उठाया गया और जब तक दोनों को छोड़ा गया इस बीच दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक संपर्क बना हुआ था. इस मसले पर सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश नीति मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से भी बात की थी. किसी भी देश ने अब तक इस बारे में हुई बातचीत का ब्योरा जारी नहीं किया है.


सुषमा स्वराज के आसिफ और नाजिम निजामी से मिलने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा कोई बयान जारी नहीं किया जाना यह संदेह पैदा करता है कि दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बन गई है कि भारत इस मसले पर पाकिस्तान की कोई आलोचना नहीं करेगा और पाकिस्तान भी दोनों पर कोई जवाबी आरोप लगाने से परहेज करेगा.


इसमें भी कोई संदेह नहीं कि दोनों देशों की दरगाहों के लोग भी इस मुद्दे को इस तरह निपटाना चाहते होंगे कि जिससे यह लोगों की नजर से जल्द से जल्द दूर हो जाए. पर सिर्फ उनकी चाहत ही विदेश मंत्रालय अपना रुख तय नहीं करेगा, यह समझा जा सकता है. भारत के विदेश मंत्रालय के लिए यह जरूरी है कि वह इस मुद्दे पर विवाद को स्पष्ट करे. चुप्पी या संकोच से पाकिस्तान की एजेंसियों के पूर्वाग्रह को बल ही मिलेगा, जो कि भारत को नहीं होने देना चाहिए.

First published: 24 March 2017, 8:33 IST
 
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