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दलाई लामा की सेहत भारत के लिए चिंता का सबब क्यों है?

भारत भूषण | Updated on: 12 November 2015, 16:19 IST
QUICK PILL
  • तिब्बतियों के निर्विवाद नेता दलाई लामा की बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत के कारण ऐसी संभावनाएं जतायी जा रही हैं कि वो अपने जीवनकाल में ही चीन के साथ कोई समझौता करना चाहते हैं.
  • दलाई लामा के किसी भी फैसले का भारत और चीन के सीमा विवाद पर असर पड़ेगा.

दुनिया भर के तिब्बती अपने धार्मिक और आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की सेहत को लेकर चिंतित हैं. मौजूदा दलाई लामा 14वें दलाई लामा हैं.  अक्टूबर के पहले हफ्ते में डॉक्टरों की सलाह से अपना अमेरिका दौरा रद्द बीच में रद्द करके वापस भारत आना पड़ा.

दलाई लामा बहुत ही अनुशासित जीवन जीते हैं. उम्र के 80वें साल में भी वो काफी स्वस्थ नजर आते हैं. हालांकि उनके शुगर का स्तर थोड़ा बढ़ा है, उनके घुटनों में भी कुछ समस्या है. उन्हें प्रोस्टेट ग्रंथि(पियुष ग्रंथि) की भी थोड़ी शिकायत है.

संभव है कि उन्हें इसकी सर्जरी करानी पड़े. हालांकि उनके दफ्तर के अनुसार जब वो 'सालाना रूटीन चेकअप' के लिए अमरीका के रोचेस्टर स्थित मेयो क्लिनिक गए तो वहाँ के डॉक्टरों ने सर्जरी की जरूरत से इनकार कर दिया. वहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी.

एक हद तक ये सारी समस्याएं बढ़ती उम्र से जुड़ी हुई हैं. हम उनकी लंबी उम्र और सेहतमंद जीवन की कामना करते हैं, फिर भी ये सच है कि उम्र के प्रभाव से दलाई लामा भी नहीं बच सकते.

दलाई लामा की बढ़ती उम्र और खराब होती सेहत केवल तिब्बतियों की ही नहीं भारत के लिए भी चिंता की वजह है.   भारत को इसकी गंभीर चिंता करनी भी चाहिए क्योंकि दलाई लामा की सेहत का सीधा असर तिब्बत के भविष्य और भारत-चीन संबंधों पर सीधे तौर पर पड़ेगा.

गौतम बुद्ध ने कहा था संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है. उनकी इस शिक्षा को दलाई लामा से बेहतर कौन समझता होगा. लेकिन सवाल ये है कि क्या दलाई लामा के चीन के प्रति रवैए पर इस सोच का क्या असर पड़ेगा? ये भी सवाल है कि उनके बाद एक धार्मिक संस्था के  रूप के रूप में "दलाई लामा"  का क्या होगा?

दलाई लामा के बाद उनकी व्यवस्था का होगा?

दलाई लामा दुनिया भर के तिब्बतियों के निर्विरोध नेता हैं. संभव है कि उम्र और सेहत के साथ न देने के कारण वो अपने जीवनकाल में ही चीन के साथ कोई समझौता करना चाहें.  उन्हें लग सकता है कि इस समय चीन के संग समझौता करने के लिए पहले से बेहतर हालात हैं.

चीन के मौजूदा निजाम के प्रति दलाई लामा के बदलते रुख के कई संकेत मिले हैं. ऐसा लगताहै कि वो मौजूदा चीनी सरकार को वहां की पुरानी सरकारें से अलग नजरिए से देखते हैं.

पिछल साल अक्टूबर में उन्होंने तिब्बतियों के लिए पवित्र माने जाने वाले उत्तरी चीन में शांक्शी प्रांत में वुताई शान पर्वत की यात्रा की इच्छा जताई थी. चीन ने पहले तो ऐसी किसी यात्रा की संभावना को खारिज कर दिया था, लेकिन तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी वू यिंगजी ने माना कि दलाई लामा के तिब्बत लौटने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है.

यिंगजी के अनुसार दलाई लामा और उनके अधिकारी तिब्बत लौट सकते हैं, बशर्ते कि वे अपनी ''अलगाववादी नीतियों'' को त्याग दें और मान लें कि तिब्बत तथा ताइवान चीन का हिस्सा हैं.

चीन की यात्रा की संभावना ही दलाई लामा के बदलते रुख का एकमात्र संकेत नहीं है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे के दौरान भी उन्होंने चीनी सरकार की तारीफ करते हुए उन्हें उनके पहले के शासकों से ''अधिक खुले विचारों वाला'' और ''यथार्थवादी नेता'' बताया था.

दलाई लामा ने अपने कई इंटरव्यू में जिनपिंग के पिता शी झोंगशुन से अपने अच्छे संबंधों का जिक्र किया. झोंगशुन चीन के उप-राष्ट्रपति रहे थे और अपनी उदारवादी सोच के लिए जाने जाते थे. दलाई लामा ने बताया कि उनकी दी हुई ओमेगा घड़ी झोंगशुन ने दशकों तक पहनी. ये घड़ी उन्होंने भारत में निर्वासन से पांच साल पहले 1954 में अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान उन्हें उपहारस्वरूप दी थी.

दलाई लामा ने झोंगशुन को ''बहुत दोस्ताना, अधिक खुले विचारों वाला, सज्जन व्यक्ति'' बताया था. उसी दौरान अचानक से खबरें आने लगीं कि जिनपिंग की मां काई शिन का अंतिम संस्कार तिब्बती बौद्ध रीति-रिवाजों से किया गया और उनकी पत्नी पेंग लियूयान बौद्ध धर्म को मानती हैं.

मीडिया में यह भी कहा गया कि चीनी की प्रसिद्ध गायिका लियुयान ने तिब्बती की सुंदरता की बड़ाई करना वाला एक गीत गया था. हालांकि इन खबरों में इस बात का जिक्र नहीं था कि ये गीत दरअसल वो सैन्य गीत था जिसे 1959 में तिब्बत पर कब्जा करने के लिए जाने वाली सैनिकों ने गाया था.

चीन में धार्मिक पुनरूत्थान हो रहा है और मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार अब चीन को दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध देश बताने में संकोच नहीं करती.

कुल मिलाकर ऐसी धारणा बन रही है कि मौजूदा चीन सरकार के साथ कोई समझौता संभव है. जिनपिंग के नेतृत्व वाले चीन के प्रति ये रूमानी नजरिया क्या किसी ऐसे समाधान तक पहुँच सकता है जो सभी तिब्बतियों को स्वीकार हो, ये एक अलग सवाल है.

ये साफ है कि चीन दलाई लामा की तिब्बत वापसी को तभी स्वीकार करेगा जब वो ये मान लें कि तिब्बत ताइवान ही की तरह चीन का हिस्सा है और हमेशा से रहा है. साथ ही, वो अपनी भूमिका धार्मिक नेता तक सिमित कर लें.

चीन अगर उन्हें तिब्बत वापस लौटने देता है तो नए दलाई लामा की खोज में वो भी एक पक्ष बन सकता है.

मौजूदा दलाई लामा के पुनर्जन्म उत्तराधिकार कौन होगा ये काफी हद तक इस बात पर निर्भर होगा कि उनका देहांत कहां होता है- चीन में या भारत में या फिर कहीं और.

दलाई लामा के बाद कौन?

पुनर्जन्म के बारे में दलाई लामा के अलग अलग बयानों में से इस बारे में थोड़ा भ्रम पैदा हुआ. एक बार उन्होंने कहा था कि उनका किसी आजाद मुल्क में पुनर्जन्म लेंगे. यानी उनका अगला जन्म चीन में नहीं होगा और इस तरह 15वें दलाई लामा को चुनने से चीनी निश्चित तौर पर वंचित हो जाएंगे.

एक बार उन्होंने ये कहा कि वो दोबारा जन्म नहीं लेंगे और दलाई लामा की व्यस्था मानव निर्मित है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति में उनके बाद तिब्बतियों का नेता कौन होगा? इस बात की बहुत कम संभावना है कि चीन तिब्बत की निर्वासित सरकार या उसके मनोनित प्रधानमंत्री से बातचीत करे.

एक अन्य मौके पर दलाई लामा ने कहा कि अपने जीवन काल में वह किसी दूसरे में "उत्पन्न"  हो सकते हैं, यानी वो अपने उत्तराधिकारी का चुनाव कर सकते हैं या किसी युवा को अपने अवतार के तौर पर चुन सकते हैं. दलाई लामा के जीवनकाल में ही अगले लामा के प्रकट होने की बात तिब्बती बौद्धों के लिए नहीं है.

चाहे जो भी हो 14 वें दलाई लामा के उत्तारिधकार को लेकर विवाद होना तय है. चीन में 11वें पंचेन लामा और भारत में 17 वें करमापा के उत्तराधिकार पर पहले ही विवाद हो चुका है.

दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर विवाद हुआ तो इससे तिब्बत की आजादी का आंदोलन आध्यात्मिक और राजनीतिक तौर पर बंट सकता है.

अगर दलाई लामा के गुजरने के बाद उनके उत्तराधिकारी का पता चलता है तो इससे एक और समस्या पैदा हो सकती है. ऐतिहासिक तौर पर कोई बच्चा या नाबालिक ही 'अवतार' के रूप में चुना जाता रहा है.  मसलन, मौजूदा दलाई लामा को महज पांच साल की उम्र में 'अवतार' के रूप में पहचान लिया गया था.

इस तरह की संभावना के लिए रीजेंट या रीजेंसी काउंसिल की नियुक्ति जरूरी होगी. तिब्बती संघर्ष का भविष्य रीजेंसी कौंसिल की क्षमता और उसके फैसलों पर  पर निर्भर करेगा.

कुछ लोगों का मानना है कि दलाई लामा की संस्था एक सामंती अदालत की तरह है. जिसमें ज्यादातर एक ही समुदाय के लोगों का वर्चस्व है. इससे संगठन की कमजोरी जाहिर होती है. दलाई लामा के बाद रीजेंट के चयन पर विवाद हो सकता है.

रीजेंट या रीजेंसी काउंसिल को तिब्बती बौद्धों के विभिन्न पंथों में तिब्बती आंदोलन के राजनीतिक नेतृत्व की अगुवाई की वैधता के सवाल से भी दो चार होना पड़ सकता है.

दलाई लामा खुद गेलुग पंथ का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके अलावा तीन बड़े पंथ हैं निंगमा, कागयू , साक्य. साक्य परंपरा की एक शाखा जोनांग भी महत्वपूर्ण है. ये सभी समुदाय किसी एक लामा को नहीं मानते.

फिलहाल विभिन्न तिब्बती पंथों के बीच नेतृत्व को लेकर एकमत नहीं है क्योंकि उनमें दलाई लामा के व्यक्तित्व को लेकर सहमति नहीं है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये समुदाय किसी बच्चे या नाबालिग को दलाई लामा या रीजेंट रीजेंसी कौंसिल का निर्देश मानेंगे?

दलाई लामा को क्या करना होगा?

14वें दलाई लामा को अपने बाद के हालात के लिए तिब्बती लोगों को तैयार करने के लिए दो कदम तत्काल उठाने होंगे. एक, उन्हें साफ करना होगा कि उनके बाद भी तिब्बती लोग चीन के साथ बातचीत जारी रखेंगे. दो, उन्हें अपने उत्तारिधकारी या 'अवतार' के बारे में साफ संकेत या निर्देश देने होंगे.

जहां तक भारत की बात है अगर दलाई लामा ने राजनीतिक तौर पर मान लिया कि तिब्बत चीन का अंग है तो उसके लिए बड़ी चिंता का कारण होगा.

भारत के लिए ये स्थिति बहुत प्रतिकूल होगी. इसका भारत और चीन के बीच मैकमोहन रेखा के आधार सीमा निर्धारण के लिए हो रही बातचीत पर असर पड़ सकता है.

ग्रेट ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के बीच 1914 में हुए शिमला समझौते के तहत आंतरिक तिब्बत और बाहरी तिब्बत की निर्धारण हुआ था. इस समझौते के अनुसार बाहरी तिब्बत पर चीन का प्रभुत्व होगा लेकिन भीतरी तिब्बत के प्रशासन में उसका कोई हस्तक्षेप नहीं होगा.

समझौते की शर्तों में तिब्बत और चीन के बीच की सीमा का निर्धारण किया गया है. भारत के नजरिए से महत्वपूर्ण बात ये है कि इस समझौते के तहत भारत और तिब्बत के बीच भी सीमा निर्धारण किया गया है, जिसे मैकमोहन रेखा के नाम से जाना जाता है.

हालांकि, चीन ने 1914 के समझौते को नहीं मानता है क्योंकि चीनी प्रतिनिधियों ने शिमला में आयोजित सम्मेलन से खुद को अलग कर लिया था. वहीं भारत मानता है कि समझौता वैध है क्योंकि तिब्बत ने एक संप्रभु देश के तौर पर इस पर हस्ताक्षर किया था.

अब , अगर दलाई लामा चीन की इच्छा के अनुसार ये मान लेते हैं कि तिब्बत हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है तो मैकमोहन रेखा को सीमा मानने का भारत का दावा काफी कमजोर हो जाएगा.
First published: 12 November 2015, 16:19 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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