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चार सूत्रीय फार्मूला हो सकता है कश्मीर का 'समाधान'

गौहर गिलानी | Updated on: 1 December 2015, 9:43 IST
QUICK PILL
  • हाल के दिनों में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारत-पाक के बीच बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव रखा है. वहां के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी इसके लिए \r\nमुशर्रफ के चार सूत्रीय फॉर्मूले को सही राह मानते हैं.
  • कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने यह कह कर नई बहस छेड़ दी है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एलओसी को वास्तविक सीमा रेखा बनाना चाहते थे. इन दो बयानों ने भारत-पाक और कश्मीर को फिर से चर्चा में ला दिया है.

पाकिस्तानी नजरिये से कहा जा सकता है कि भारत ने अपनी सैन्य ताकत और आर्थिक मजबूती के दम पर 'कश्मीर की कहानी को सफलतापूर्वक दबा रखा है.'

 देश में लोग इस बात को बखूबी समझने लगे है कि कश्मीर मसले को सेना की मदद से नहीं सुलझाया जा सकता. इसके अलावा पाकिस्तान के पॉलिसीमेकर्स को लगता है कि 9/11 के बाद आजादी के संदर्भ में भी आतंकवाद व्यावहारिक विकल्प नहीं रह गया है.

उनका यह भी मानना है कि भारत को कश्मीर पर किसी प्रस्ताव की मदद से घेरने का अंतरराष्ट्रीय माहौल नहीं है. अपनी हालिया पुस्तक 'नाइदर अ हॉक नॉर ए डव' में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी लिखते हैं कि कश्मीर मसले का कोई भी समाधान पाकिस्तान, भारत या कश्मीरियों के लिहाज से 'सही' नहीं हो सकता.

कसूरी 2002-07 के बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्री रहे थे. कसूरी लिखते हैं, 'मौजूदा परिस्थितियों में यह सबसे सही विकल्प होगा.' तो क्या कश्मीर मसले का कोई ऐसा समाधान है? ऐसा समाधान जो सभी पक्षों के लिए 'सम्मानजक हो और राजनीतिक रूप से स्वीकार्य भी.'

समाधान की तलाश में

कसूरी लिखते हैं कि भारत और पाकिस्तान को इस बात का अंंदाजा है कि दोनों देशों में वैसी 'ताकतें' हैं जो रिश्तों को समान्य होते हुए नहीं देखना चाहती हैं. इसके अलावा वैसे भी लोग हैं जो 'पूरे से कम पर' संतुष्ट नहीं होने वाले. 

कसूरी बताते हैं कि सेना की वापसी, हिंसा में कमी, स्वराज और राज्य के दोनों हिस्सों के लिए ज्वाइंट कंट्रोल मैकेनिज्म और एलओसी को महज 'नक्शे पर एक लाइन मान लेने' के बाद ही कश्मीर मसले का व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है. 

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की तरफ से सुझाया गया चार सूत्रीय फॉर्मूला है. यह समाधान पाकिस्तान और भारत दोनों के लिए व्यावहारिक हो सकता है क्योंकि दोनों कम से कम इस बात से परिचित है कि 'सीमाएं फिर से नहीं खींची जा सकती.' तो क्या यह समाधान कश्मीरियों को मंजूर होगा?

नूरानी लिखते हैं, 'न तो पाकिस्तान और नहीं भारत कश्मीर की आजादी के विचार को मंजूर करते हैं

हालांकि इस फॉर्मूले में कश्मीरियों के लिए संतुष्ट करने जैसा बहुत कुछ नहीं है. यहां तक कि यह उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को भी संतुष्ट नहीं करता है. और शायद यही वजह है कि घाटी के अधिकांश लोग सेना की वापसी, स्वराज, ज्वाइंट कंट्रोल, एलओसी के आर-पार जाने की सुविधा बहाली और व्यापार को महज समाधान की दिशा में की गई एक कोशिश मानते हैं, न कि किसी आखिरी समाधान के तौर पर. 

कसूरी की तरह ही भारत के मशहूर वकील और विश्लेषक ए जी नूरानी ने अपनी किताब 'द कश्मीर डिस्प्यूट, 1947-2012' में उस समाधान का जिक्र करते हैं जिसे दोनों पक्षों की मंजूरी हासिल हो.' 

नूरानी लिखते हैं, 'न तो पाकिस्तान और नहीं भारत कश्मीर की आजादी के विचार को मंजूर करते हैं. चार सूत्रीय फॉर्मूला और सेल्फ गवर्नेंस उचित समाधान की तरह है क्योंकि सभी बिंदुओं में सेल्फ गवर्नेंस का भाव अहम है.' लेकिन यह चार सूत्रीय फॉर्मूला वाकई में क्या है.

एक आदर्श विकल्प

नूरानी के मुताबिक चार सूत्रीय फॉर्मूला वह है जिस पर 'राज्य के दोनों हिस्सों के सेल्फ गवर्नेंस, एनओसी को खोला जाना ताकि यह महज नक्शे पर एक लकीर बन कर रह जाए, जैसा कि प्रधानमंत्री ने 24 मार्च 2006 को कहा था और दोनों हिस्सों से सेना हटाए जाने के साथ ज्वाइंट मैनेजमेंट मैकेनिज्म की व्यवस्था पर बनी सहमति है.' 

यह दोनों देशों के लिए बराबर का समाधान है. इसके साथ ही वह यह आगाह करते हैं कि इस दिशा में किसी की गई पॉपुलिज्म की कोशिश के गंभीर नतीजे होंगे. भारत और पाकिस्तान के बीच पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत और ट्रैक टू डिप्लोमेसी में इस फॉमूर्ले को मौजूदा स्थिति में सबसे बेहतर समाधान माना जाता है. 

कश्मीर में हालांकि सैयद अली शाह गिलानी के प्रशंसक इसकी जबरदस्त आलोचना करते हैं. गिलानी के शब्दों में यह फॉर्मूला पेश करते वक्त 'मुशर्रफ की दिमागी हालत ठीक नहीं थी.' वहीं नरमपंथी हुर्रियत नेता मीर वाइज उमर फारुक इस फॉर्मूला को बेहतर समाधान की दिशा में की गई एक अच्छी शुरुआत करार देते हैं. सवाल उठता है कि आज के समय में यह फॉर्मूला कितना कारगर है ? 

प्रतिकूल माहौल

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के आधिकारिक रुख में सख्ती आई है. हुर्रियत नेताओं के साथ पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित की मुलाकात के बाद अगस्त महीने में दोनों देशों के बीच होने वाली विदेश सचिव स्तर की बातचीत रद्द कर दी गई थी.

हाल ही में दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर पर पर होने वाली बातचीत भी रद्द हो चुकी है. दोनों देशों ने एक दूसरे पर बातचीत की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है.

सेना और पुलिस के अधिकारियों के मुताबिक कश्मीर में सीमा पार घुसपैठ की घटनाएं 'लगभग खत्म' हो गई हैं

सेना और पुलिस के कई अधिकारियों के मुताबिक कश्मीर में सीमा पार से होने वाले घुसपैठ की घटनाएं 'लगभग खत्म' हो गई हैं. वहीं सुरक्षा बलों और हथियारबंद कश्मीरी युवाओं के बीच झड़पों की संख्या बढ़ी है. 

इसके अलावा कश्मीरी युवाओं में कट्टरता बढ़ी है और वह लगातार दक्षिणी और उत्तरी कश्मीर में आतंकियों के साथ हाथ मिला रहे हैं. पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की निगरानी के जोखिम को नजरअंदाज करते हुए हजारों की संख्या में कश्मीर युवकों ने आतंकवादियों की शव यात्रा में भाग लिया है. 

कश्मीर में पिछले साल मार्च में बीजेपी-पीडीपी के सत्ता में आने के बाद लोकतंत्रिक तरीके से विरोध जताने की जगह लगातार कम होती जा रही है. राज्य सरकार ने आजादी की मांग का समर्थन करने वाले राजनीतिक ताकतों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है. 

इसके साथ ही इंटरनेट सेवा को लगातार बंद रखने और छात्र राजनीति पर हमेशा के लिए बैन लगाए जाने की शुरुआत हुई है ताकि कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के नाम पर 'कश्मीर की कहानी' को बाहर आने से रोका जा सके. ऐसे राजनीतिक माहौल में अगर नरमपंथी माहौल के लोग भी कट्टरपंथियों की भाषा बोलने लगे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए. 

जब भारत और पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर आपस में बातचीत नहीं कर रहे हैं तो ऐसे में चार सूत्री फॉर्मूले का क्या भविष्य है ? क्या मोदी सरकार वाकई में शांति वार्ता, पाकिस्तान और हुर्रियत के साथ बातचीत को लेकर गंभीर है ? सभी पक्षों के लिए बराबर की स्थिति क्या होगी ? ऐसे में गिव एंड टेक पॉलिसी क्या होगी ? व्यावहारिक समाधान क्या होगा ?

भारत, पाकिस्तान और कश्मीरियों के बीच बातचीत की शुरुआत के साथ इस दिशा में पहल की जा सकती है.

First published: 1 December 2015, 9:43 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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