Home » इंटरनेशनल » European new law on cyber security: must watch: catch hindi news
 

अब पूरे यूरोप के लिए होगा एक साइबर सुरक्षा कानून

असद अली | Updated on: 11 December 2015, 21:34 IST
QUICK PILL
  • यूरोपीय कमीशन नए साइबर सुरक्षा समझौते पर सहमत. नए समझौते के अनुसार इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों को साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा. बड़े साइबर हमले की देनी होगी जानकारी.
  • यूरोपीय संघ में शामिल देशों में देश के बाहर से होने वाले साइबर सेंधमारी से \r\nनिपटने के लिए \'कंप्यूटर सिक्योरिटी इंसीडेंट्स रिस्पॉन्स टीम\' नामक विशेष टीम बनायी गयी है.

यूरोपीय कमीशन एक नए साइबर सुरक्षा समझौते पर सहमत हो गया है. नए समझौते के अनुसार यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में आवश्यक इंटरनेट सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियों को ये सुनिश्चित करना होगा कि उनका नेटवर्क पूरी तरह सुरक्षित है. उन्हें उनके नेटवर्क पर होने वाले किसी भी तरह के बड़े साइबर हमले की जानकारी भी देनी होगी. हालांकि इस समझौते के अभी यूरोपीय यूनियन की संसद और परिषद से अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है.

'नेटवर्क एंड इंफॉर्मेटिव सिक्योरिटी डायरेक्टिव' नामक इस समझौते पर सहमति बनने के बाद कमीशन की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि "ये कानून सदस्य देशों में साइबर सुरक्षा क्षमताओं में सुधार" करेगा और "साइबर सुरक्षा पर सदस्य  देशों के आपसी सहयोग को बेहतर बनाएगा."

यूरोपीय कमीशन के डिजिटल प्रमुख एन्ड्रस एन्सिप ने कहा, "इंटरनेट कोई सीमा नहीं पहचानता है. किसी एक देश में उभरी समस्या का असर पूरे यूरोप पर पड़ सकता है. इसलिए हमें पूरे यूरोप के लिए एक साइबर सुरक्षा की जरूरत है. यह समझौता इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है."

यूरोपीय संघ में शामिल देशों में देश के बाहर से होने वाले साइबर सेंधमारी से निपटने के लिए 'कंप्यूटर सिक्योरिटी इंसीडेंट्स रिस्पॉन्स टीम (सीएसआईआरटी)' नामक विशेष टीम बनायी गयी है.

इस समझौते के तहत परिवहन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और वित्त से जुड़ी कंपनियों के अलावा गूगल और वेब सर्विस देने वाली दूसरी कंपनियां को भी सुरक्षा और सूचना देने के नियम पालन करने होंगे.

अब आगे क्या होगा

ये समझौता पूरी तरह से तभी लागू हो सकेगा जब इसे यूरोपीय संसद और परिषद से औपचारिक मंजूरी मिल जाएगी. उसके बाद यूरोपीय संघ के आधिकारिक जर्नल में प्रकाशित होने के बाद ही इसे आधिकारिक रूप से यूरोपीय कानून में शामिल किया जा सकेगा.

सीजीआई के साइबर सुरक्षा प्रमुख एंड्र्यू रॉगोएस्की ने टेकवीक, यूरोप को बताया, "इस निर्देश से सामने आने वाली प्रमुख मजबूरियों में 'जरूरी सेवाओं के प्रदाताओं' को 'उचित सुरक्षा उपायों' का इस्तेमाल करना होगा और गंभीर घटनाओं को संबंधित राष्ट्रीय विभागों-अधिकारियों को बताना होगा."

इसका मतलब है कि साइबर सुरक्षा में सेंध लगने पर यूरोप की निजी इंटरनेट कंपनियां राष्ट्रीय अधिकारियों-विभागों को सूचना देने पर बाध्य होंगी. 

उन्होंने यह भी कहा कि इससे डाटा में सेंध लगने की ज्यादा घटनाएं सामने आएंगी जिससे ऑनलाइन सिस्टम में आम लोगों को सुरक्षा के मुद्दे पर जागरूक करने में मदद मिलेगी.

विरोधाभासी दृष्टिकोण

जब एन्क्रिप्शन (क्रिप्टोग्राफिक प्रोटोकॉल को कमजोर करने की मांग) की बात आती है तो एक ओर कड़े सुरक्षा उपायों पर जोर दिया जा रहा है. जबकि दूसरी ओर यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों की मांग इसके ठीक विपरीत है. 

यूरोपीय संघ के कई राष्ट्र गुप्तरूप से एन्क्रिप्शन को शामिल करने के लिए इंटरनेट कंपनियों पर दबाव डाल रहे हैं. ताकि जरूरत पड़ने पर वे कंपनियों के सॉफ्टवेयर एक्सेस कर सकें. 

हाल ही में द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक बयान छापा जिसमें यूरोपीय संघ के एक अधिकारी ने कहा, "बेहतर एन्क्रिप्शन तकनीक के जरिये आतंकवादियों के बीच तेजी से संचार बढ़ता जा रहा है और इससे निपटने की जरूरत है."

Cybercrime & India loss

द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट जारी की कि 2015 की पहली छमाही में यूरोपीय संघ के राष्ट्रों द्वारा डाटा मांग की संख्या 20 फीसदी बढ़ते हुए 13000 पहुंच गई. वहीं ऐपल की तरफ से ऐसी मांग 48 फीसदी बढ़कर 16000 पर पहुंच गई. 

शायद ब्रिटेन का इन्वेस्टिगेटरी पावर्स बिल यूरोप में एन्क्रिप्शन को ढील देने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है. 

पढ़ेंः साइबरक्राइम से भारतीयों को लगा 1,82,000 करोड़ रुपये का चूना

जहां विरोधियों द्वारा इसे एक जासूसी चार्टर बताया गया, नए नियमों को काफी हद तक स्नोडेन के खुलासे की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. जब भी जरूरी समझा जाए एन्क्रिप्शन मॉडल्स को बाईपास करने के लिए यह बिल कंपनियों पर कानूनी बाध्यता डाल देगा. समझौते पर अगले साल बहस होनी है.

अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई भी एन्क्रिप्शन पर एक ऐसा ही युद्ध छेड़ रही है. न्यूयॉर्क में बीते सप्ताह हुए साइबर सुरक्षा सम्मेलन में एफबीआई के निदेशक जेम्स कॉमी ने खुलासा किया कि एक बार इस्लामिक स्टेट कमांडरों ने एक कारण के लिए ऐसे व्यक्ति को खोजा जो मरने के लिए तैयार था, अब उनसे यह वार्ता और ज्यादा एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स के जरिये होगी यानी बिल्कुल गुप्त. माना जाता है कि पेरिस हमलावरों ने भी एन्क्रिप्टेड टेलीग्राम का इस्तेमाल किया था. जिसपर अधिकारियों द्वारा निगरानी रखना बहुत मुश्किल है.

जाहिर है समस्या इस 'आवश्यक' शब्द की अस्पष्टता है. यानी आम लोगों के बीच होने वाली बातचीत सरकार को पता चल जाएगी, इस शब्द की यही अस्पष्ट परिभाषा एक खतरे की घंटी बन गई है.

First published: 11 December 2015, 21:34 IST
 
असद अली @asadali1989

Asad Ali is another cattle class journalist trying to cover Current affairs and Culture when he isn't busy not saving the world.

पिछली कहानी
अगली कहानी