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क्या पनामा पेपर्स लीक के पीछे अमेरिका का हाथ है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 April 2016, 8:00 IST

व्हिसल ब्लोअर विकीलीक्स ने पनामा पेपर्स जारी करने वाले इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्‍ट्स (आईसीआईजे) की पत्रकारीय नैतिकता पर सवाल खड़े किए हैं. पनामा पेपर्स रविवार को जारी हुए थे और उसके बाद से विकीलीक्स उससे जुड़े ट्वीट कर रहा है.

सोमवार को विकीलीक्स ने अपने आधिकारिक अकाउंट से  ट्वीट किया, "एक करोड़ 15 लाख पनामा पेपर्स में से अब तक केवल 149 ही क्यों सार्वजनिक किए गए हैं."

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बुधवार को विकीलीक्स ने लिखा, "अगर आप 99 फीसदी दस्तावेजों पर सेंसर लगा देंगे तो आप बुनियादी परिभाषा के अनुसार एक फीसदी पत्रकारिता कर रहे हैं."

विकीलीक्स ने आरोप लगाया है कि अमेरिकन यूएसएड और फोर्ड फाउंडेशन ने आईसीआईजे को आर्थिक मदद दी थी. इस वजह से पनामा पेपर्स का इस्तेमाल करके रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को निशाना बनाया जा रहा है.

हालांकि विकीलीक्स ने पनामा पेपर्स को रूस के खिलाफ साजिश मानने की बात को बेवकूफी बताया है. विकीलीक्स के अनुसार अमेरिकी पैसे के कारण इन खबरों को खास रंग दिया जा रहा है.

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आईसीआईजे के माध्यम से 78 देशों के 107 मीडिया संस्थान ने मिलकर पनामा दस्तावेजों का अध्ययन किया है. रविवार को इन सभी संस्थाओं ने एक साथ पनामा की लॉ फर्म मोसाक फोसेंका के गोपनीय दस्तावेज के हवाले से खबर चलायी. इस खबर में दुनिया कि कई विशिष्ट हस्तियों की विदेशों में स्थित कथित शेल कंपनियों की जानकारी दी गयी.

फोंसेका दस्तावेज से पता चलता है कि कंपनी ने किस तरह अपने ग्राहकों के काले धन को वैध बनाने, प्रतिबंधों से बचने और कर चोरी में मदद की.

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विकीलीक्स के प्रवक्ता क्रिस्टीन राफेनसन ने कहा है कि पनामा पेपर्स की जांच-पड़ताल कर रहे पत्रकारों के ग्रुप के अलावा आम लोगों तक भी पनामा पेपर्स की पहुंच होनी चाहिए. आईसीआईजे को पनामा पेपर्स को ऑनलाइन जारी करना चाहिए.

दूसरी ओर आईसीआईजे के डायरेक्टर जेरार्ड राइल ने कहा है, ''हम विकीलीक्स नहीं है. हम यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि जिम्मेदारी के साथ पत्रकारिता कैसे की जाती है.''

First published: 8 April 2016, 8:00 IST
 
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