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...और मानवाधिकार दिवस के दिन ही उस महिला को पत्थरों से मार डाला गया

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 15 December 2015, 8:16 IST
QUICK PILL
  • ईरान मध्य-पूर्व के देशों में महिलाओं के अधिकारों के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रगतिशील देश है. बावजूद इसके यहां महिलाओं पर कई बंदिशें हैं.
  • 10 दिसंबर को एक महिला को पत्थर मार-मारकर मौत की सजा दी गई. महिला पर अपने पति की हत्या का आरोप था.

10 दिसंबर को दुनिया भर में मानवाधिकारों की चर्चा चल रही थी. संयुक्त राष्ट्र 1948 में इस दिन को मानवाधिकारों के नाम समर्पित किया था. लेकिन इस बार का 10 दिसंबर अपने साथ एक बदसूरत विरोधाभास लेकर आया. ईरान से एक खबर धीरे-धीरे बाहर निकल रही है कि विश्व मानवाधिकार दिवस के दिन ही एक महिला की पत्थर मार-मार कर हत्या कर दी गई. फॉक्स न्यूज़ पर आई एक खबर के अनुसार महिला को अपने पति के हत्या के आरोप में यह क्रूरतम सजा दी गई है.

महिला के बारे में सिर्फ इतना ही पता चला है कि उसके नाम का पहला अक्षर 'अ' है और उसे पहले ही 25 साल की सजा सुनाई जा चुकी थी. पत्थर मारने की घटना से जुड़ी बेहद दर्दनाक तस्वीर सामने आई है. इसमेंं महिला को गले तक जमीन में गाड़ दिया गया उसके बाद उसे पत्थर मारा गया. ईरान के उत्तरी प्रांत गिलान की एक क्रिमिनल कोर्ट ने उसे यह सजा दी थी. इस मामले में महिला के साथ दो पुरुषों को भी दोषी पाया गया. उनमें से एक को मौत की सजा मिली जबकि दूसरे को पांच साल जेल में काटना पड़ेगा.

नेशनल काउंसिल ऑफ रेज़िस्टेन्स ऑफ ईरान के अनुसार स्थानीय सरकारी मीडिया में मौत की खबर पिछले शनिवार को छपी थी. हालांकि, ईरानी न्यायपालिका की तरफ से मौत के इस फैसले पर कोई ज्यादा जानकारी जारी नहीं की गई है.

कनाडा में रहने वाली प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता मरियम नायब यजीदी ने फॉक्स न्यूज को बताया है कि ईरान में पिछले वर्षों में फांसी की सजा के मामले बढ़े हैं.

उन्होंने कहा कि ईरान में अभी भी जजों के द्वारा पत्थर से मार-मारकर मौत की सजा सुनाई जा रही है. इसे फांसी की सजा में बदलने की जरूरत है.

इंटरनेशनल कमिटी अगेंस्ट एक्सक्यूशन एंड स्टोनिंग के अऩुसार ईरान में इस्लामी क्रांति (1979) के बाद से अब तक करीब 150 लोगों को पत्थर मार-मारकर मौत की सजा दी गई है.

इससे पहले भी 2006 में एक मामले में दोषी करार दी गई एक महिला को पत्थर मार-मारकर मौत की सजा देने का आदेश दिया गया था. सकीना मोहम्मद अस्तियानी नामक महिला को अश्लीलता के मामले में यह सजा सुनाई गई थी. जब ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा तो 2011 में न्याय विभाग के अधिकारियों ने कहा इस सजा पर विचार चल रहा है कि महिला को पत्थर मार-मारकर मौत की सजा दी जाए या फांसी दी जाए. हालांकि, दो बच्चों की मां सकीना को अब तक सजा नहीं दी गई.

ईरान मध्य-पूर्व के देशों में महिलाओं के अधिकारों और उनकी भागीदारी के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रगतिशील देश है. ईरान की महिलाएं सऊदी अरब की महिलाओं के मुकाबले ज्यादा अधिकार रखती हैं. लेकिन इस तरह की घटनाएं आधुनिक और उदार देश की तरफ कदम बढ़ाते ईरान की छवि को धक्का पहुंचाती है.

हाल में ही ईरान की सबसे पुरानी सिंफनी ऑर्केस्ट्रा को शुरू होने के ठीक पहले इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि उसमें महिलाएं कार्यक्रम पेश करने वाली थीं. यहां महिलाओं को ड्रम्स समेत कई म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को बजाने की भी मनाही है.

ईरान में महिलाओं के लिए कई और बंदिशें हैं. यहां कानून के अनुसार पत्नी को देश के बाहर यात्रा करने से पहले पति की इजाजत लेनी होती है.

'लेडी गोल' के नाम से मशहूर नीलोफर अर्दलान को ईरानी इतिहास की सर्वश्रेष्ठ महिला फुटबॉल खिलाड़ियों में माना जाता है. इस साल सितंबर में नीलोफर मलेशिया में हुए एएफसी महिला फुटबॉल चैंपियनशिप में अपनी टीम का नेतृत्व नहीं कर पाईं. क्योंकि उनके पति ने विदेश यात्रा की इजाजत नहीं दी.

ईरान में 1979 के बाद से ही महिलाओं पर केवल पुरुषों वाले किसी भी खेल को देखने पर पाबंदी है. इसके पीछे तर्क दिया गया कि ऐसा महिला दर्शकों को पुरुष दर्शकों की छेड़खानी और अभद्र बर्ताव से 'बचाने' के लिए किया जाता है.

2014 में ईरानी मूल की ब्रितानी लॉ ग्रेजुएट गोन्चे गवामी उस महिला समूह का हिस्सा थीं जिन्हें 'हुकूमत के खिलाफ दुष्प्रचार' के आरोप में गिरफ्तार किया गया. गवामी का कसूर सिर्फ इतना था कि वो 'आजादी' स्टेडियम में वॉलीबॉल मैच देखना चाहती थीं. मजेदार बात है कि ईरान में फुटबॉल और वॉलीबॉल स्टेडियमों को 'आजादी' कहा जाता है.

बहरहाल इस्लामी दुनिया में महिलाओं की आजादी के लिए मशहूर ईरान का यह चेहरा बेहद शर्मनाक और निराशाजनक है.

First published: 15 December 2015, 8:16 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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