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विश्व शरणार्थी दिवसः म्यांमार के रिफ्यूजियों के लिए भारत घर नहीं एक ठिकाना भर है

कैच ब्यूरो | Updated on: 22 June 2016, 12:30 IST

अपने खुद के देश में सताए गए रोहिंग्या मुसलमानों के साथ साथ ईसाई धर्म मानने वाले चिन समुदाय के लोग वर्षों पहले म्यांमार से भागकर बेहतर जीवन की तलाश में भारत आए थे. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के मई 2016 के आंकड़ों के अनुसार भारत में रह रहे 28000 रिफ्यूजियों में से 16,341 रिफ्यूजी म्यांमार के हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत में इन शरणार्थियों को स्वीकार कर लिया गया है. विश्व रिफ्यूजी दवस पर कैच ने इनकी यात्रा, रहन-सहन और उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में जाना.

रोहिंग्या को म्यांमार की नागरिकता भी नहीं

म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों को सबसे ज्यादा अत्याचार झेलने वाला समुदाय माना जाता है. दिल्ली के जामिया नगर में खाली पड़ी जमीन पर इस समुदाय के 70 से ज्यादा परिवार झोपड़ी बनाकर रहते हैं. इसे श्रम विहार रिफ्यूजी कैम्प कहा जाता है. 35 वर्षीय महमूद उस्मान अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ पिछले कुछ सालों से भारत में रह रहे हैं.

वह टूटी-फूटी हिन्दी बोल लेते हैं. अपनी इस झोपड़ी को उन्होंने घर का नाम दिया हुआ है. घर के बाहर ही उन्होंने अंधेरे कमरे में अपना कार्यालय बनाया हुआ है. उस्मान 2010 के आसपास शरणार्थी के रूप में म्यांमार से भारत आए थे. वह म्यांमार में राखिन राज्य के रहने वाले हैं. इस राज्य में रोहिंग्या समुदाय बहुसंख्यक हैं. यह राज्य बौद्ध और रोहिंग्या समुदाय के बीच हिंसा से सर्वाधिक पीड़ित राज्य है.

बौद्ध लोग रोहिंग्या को म्यांमार मूल का नहीं मानते. धार्मिक सामाजिक रीतियों को लेकर इस समुदाय का म्यांमार के बहुसंख्यक वर्गों से टकराव बहुत पुराना है. 1982 में बर्मीज नेशनैलिटी एक्ट लागू हो जाने के बाद भी उन्हें बर्मा की नागरिकता नहीं दी गई. 2012 में राखिने राज्य में हुए दंगों के बाद से भारी संख्या में रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने पड़ोसी देशों भारत, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि में शरण ली है.

उस्मान की तरह ही अन्य शरणार्थी भी बांग्लादेश होकर भारत आए. पहले उन्होंने अपनी यात्रा राखिन प्रांत और बांग्लादेश के बीच बहने वाली नदी के रास्ते तय की. उस्मान कहते हैं कि यात्रा में बड़ा जोखिम था. पहाड़ी जंगल और गहरे पानी में यात्रा काफी कष्टकारी और भयावह रही. उस्मान यह भी बताते हैं कि कुछ लोग तो डूब गए और कुछ लोग मर गए.

उस्मान अपने परिवार के साथ भारत आ गए. यह बात अलग है कि इन्हें सीमा पर कुछ घूस देनी पड़ी. किसी तरह वे कोलकाता आ गए. इसके बाद वे दिल्ली आ गए जहां संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) से उन्हें रिफ्यूजी कार्ड मिल गया. लेकिन रिफ्यूजी कालोनी जहां है, वहां रहने लायक हालात नहीं हैं. 

बगल में नाला बहता है. नाला होने के चलते बीमार हो जाने का खतरा रहता है. सांपों की यहां भरमार है. मोहम्मद सिराजुल्लाह के अनुसार कालोनी में रहने वाले अधिकांश लोग अनौपचारिक क्षेत्र जैसे कंस्ट्रक्शन साइट, ईंट भट्टे आदि पर काम करते हैं. वे रोजाना ३०० रुपए तक कमा लेते हैं.

लेकिन रोज काम मिल जाए, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है. उस्मान जैसे परिवार के लोगों को महीने में कुछ दिन ही काम मिल पाता है. उनकी मासिक आय एक हजार से लेकर चार हजार रुपए के बीच है. कभी-कभी तो उन्हें कुछ भी नहीं मिल पाता. उन्हें रोटी के लिए भी मोहताज रहना पड़ता है.

जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा भी लंबे समय तक उनका घर नहीं रहने वाला. इस भूमि का मालिक उनसे यह जमीन वापस लेना चाहता है. पिछले दो-तीन साल से यहां रह रहे रिफ्यूजी परिवार अगले माह फिर कहीं अपना डेरा डालने को मजबूर हो जाएंगे. उस्मान सवाल करते हैं कि हम तो शिकायत भी नहीं कर सकते. हम उनके आभारी हैं कि उन्होंने हमें यहां रहने दिया. लेकिन अब हम कहां जाएंगे.

लेकिन म्यांमार जाना कोई विकल्प नहीं है. उस्मान की पत्नी कहती हैं कि हम यहां जीवन की खातिर आए थे. यहां तो रहना ही मुश्किल हो रहा है. हम असहाय हैं.

रोहिंग्या रिफ्यूजी कमेटी (आरआरसी) के चेयरमैन निजामुद्दीन जिन्होंने यूएनएचसीआर के साथ मिलकर म्यामांर में काम किया है, कहते हैं कि वे भारत में तो आ गए हैं, पर बहुत खुश नहीं हैं. यहां कोई सुविधाएं नहीं हैं. हालांकि यूएनएचसीआर का कार्ड हमें मिला हुआ है. कई लोगों की सहायता राशि रुक गई है. 

वह चाहते हैं कि या तो उनके समुदाय को वापस म्यांमार भेज दिया जाए अथवा किसी दूसरे देश में ठीक तरीके से बसा दिया जाए. निजामुद्दीन ने उम्मीद जताई है कि भारत सरकार इस समुदाय के हालात के बारे में म्यांमार सरकार से बात करेगी.

चिन समुदाय-जातीय और यौन हिंसा का शिकार

विकासपुरी में निजामुद्दीन के कार्यालय से कुछ ही दूरी पर उत्तमनगर में एक अन्य समुदाय के लोग रहते हैं. ये भी म्यांमार से शरणार्थी के रूप में भारत आए हैं. चिन समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा है और ये काफी समय से यहां रह रहे हैं. 

दिल्ली में इस समुदाय के लगभग दस हजार सदस्य रह रहे हैं. चिन रिफ्यूजी कमेटी के चेयरमैन बियाक था हमून कहते हैं कि जब वह केवल 15 साल के थे, सेना ने जबर्दस्ती उन्हें सेना में भर्ती कर लिया था. उन्हें पोर्टर की नौकरी दी गई. वह सिपाहियों के लिए हथियार और शस्त्र ले जाने का काम करते थे. वह याद करते हुए बताते हैं कि एक दिन सड़क पर एक दुर्घटना हो गई और वे किसी तरह भारत आ गए.

चिन मानवाधिकार संगठन से जुड़े कुंग डॉट बताते हैं कि वर्ष 2013 के बाद हालात में कुछ सुधार हुआ है लेकिन जो जमीनी हकीकत है, उससे वे कभी सुनिश्चित नहीं हो सकते. रोहिंग्या समुदाय की तरह चिन समुदाय के लोग भी भारत में बेहतर भविष्य की आस नहीं रखते.

यूएनएचसीआर ने इन समुदायों को सरकारी सुविधाएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं सुलभ कराने के लिए अपना समर्थन दिया है लेकिन रिफ्यूजी होने के नाते उन्हें कार्यस्थल पर ढेर सारी समस्याएं आती हैं. 

सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, भूमि मालिकों द्वारा उत्पीड़ित किया जाता है. जनकपुरी के पास चाणक्य पर नुखाई और उन के पति खाने का एक छोटा ठेला लगाते हैं. वे कहते हैं कि सामाजिक भेदभाव का अन्त नहीं हो रहा है. उन्हें रोजाना उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.

वे बताते हैं कि जब उनकी पुत्री कक्षा आठ में पढ़ती थी तो वह साथ में पढ़ने वाले एक छात्र के यौन उत्पीड़न का शिकार हुई थी. जब स्कूल प्रबंधन से शिकायत की गई तो उनसे बच्ची को स्कूल से निकाल लेने को कहा गया. किसी तरह से बच्ची ने नौवीं पास की. 

उसके बाद उसे स्कूल छोड़ देना पड़ा. वे कहते हैं कि चेहरे की बनावट से उनके पुत्र को भी नियमित रूप से स्कूल में परेशानी का सामना करना पड़ता है. उसके साथी उससे कहते हैं नेपाली.

इसी तरह से इस समुदाय के एक अन्य सदस्य मौनघटा भी दयनीय स्थिति में है. एक सैनिक ने अपनी बंदूक से उसके सिर पर प्रहार कर दिया था. उसके इलाज की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है. जीवन काटना उसके लिए मुश्किल हो रहा है. वह दावा करता है कि सरकारी अस्पताल से उसे कोई सुविधा नहीं मिली.

कोई अंतिम समाधान नहीं

भारत में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) की लोक सूचना अधिकारी शुचिता मेहता बताती हैं कि ये रिफ्यूजी भारत में जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उसका कोई अंतिम समाधान नहीं है. यूएनएचसीआर द्वारा जो निर्वाह भत्ता दिया जाता है वह सीमित अवधि के लिए होता है और बहुत कम है.

मेहता कहतीं हैं कि दीर्घकालीन समाधानों में एक विकल्प यह भी शामिल है कि जो रिफ्यूजी अपने देश लौटना चाहते हैं, उन्हें सुरक्षा और इज्जत के साथ जाने दिया जाए और जो भारत में ही रहना चाहते हैं उन्हें भारत के नागरिकता कानून के तहत नागरिकता दे दी जाए. इसके अलावा यूएनएचसीआर कुछ थोड़े लोगों को जो तीसरे देश में जाकर फिर से बसना चाहते हैं, उनकी मदद करता है.

कोई अंतिम समाधान नहींमेहता बताती हैं कि भारत में म्यांमार के सिर्फ 16,341 शरणार्थी हैं. वह कहती हैं कि भारत की पहचान शरणार्थियों की समस्या के हल करने मामले में बहुत अच्छी है. 

अपनी विदेश नीति में भी वह इसे तरजीह देता है. रोहिंग्या और चिन समुदाय के लोग भारत के नहीं भी हैं तो सामाजिक न्याय के आधार पर भारत को उन्हें सुरक्षित घर उपलब्ध कराना चाहिए.

First published: 22 June 2016, 12:30 IST
 
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