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ब्रेग्जिटः ट्रंप, इस्लामी आतंक और हिंदुत्व के उभार की अगली कड़ी

आनंद सहाय | Updated on: 28 June 2016, 7:37 IST
(कैच न्यूज)

यूरोपीय संघ एक राजनीतिक विचार है. ब्रितानियों का इससे अलग होने का फैसला भी एक राजनीतिक फैसला है. जबकि यूरोपीय संघ में बने रहने के लिए ब्रिटेन के पास कई ठोस आर्थिक कारण थे. इसके बाद यूरोपीय संघ पर अभूतपूर्व दबाव होगा.

यूरोपीय संघ से अलग होने के फैसले के पीछे ब्रिटेन में राष्ट्रवादी उभार को माना जा रहा है. इसका दूसरे यूरोपीय देशों या अमेरिका पर क्या राजनीतिक असर होगा इसका अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी.

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पिछले कुछ सालों में दुनिया के कई हिस्सों में राष्ट्रवाद (धार्मिक या भौगोलिक) को भारी जनसमर्थन मिला है. हालांकि मध्यमार्गी लोकतांत्रिक लोग इससे खुश नहीं हुए.

फ्रांस की मैरिन ले पेन के अति-राष्ट्रवादी नेशनल फ्रंट ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने का पुरजोर समर्थन किया. इस मामले में ले पेन ने निजेल फैरेज की यूके इंडिपेंडेंस पार्टी को भी पीछे छोड़ दिया था. 

नीदरलैंड, जर्मनी, स्पेन, डेनमार्क, हंगरी जैसे देशों में भी लोकप्रियतावादी उग्र-दक्षिणपंथी दलों का प्रभाव बढ़ा है.

अमेरिका और ट्रम्प

यूरोपीय संघ में जर्मनी के बाद ब्रिटेन दूसरी सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था है. इस बात की आशंका ज्यादा है कि ताजा फैसले से न केवल ब्रिटेन बल्कि यूरोपीय संघ का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव कम होगा.

इसका नतीजा यूरोप में बेरोगजारी और मुद्रास्फीति बढ़ने के रूप में सामने आ सकता है. अभी यूरोप 2008 की आर्थिक मंदी से उबर भी नहीं सका था कि ये मुश्किल सामने आ गई. इससे यूरोप में उग्र-दक्षिणपंथियो को बढ़ावा मिलेगा. 

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने से दोनों का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव कम होगा

दक्षिणपंथी दल अति-राष्ट्रवाद का प्रचार करते हैं. वो हर विफलता या कमी के लिए विदेशियों, बाहरियों, प्रवासियों को दोष देते हैं. संक्षेप में कह लें तो वो हमेशा 'दूसरों' के खिलाफ नफरत पर पलते हैं. यूरोप बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ऐसी राजनीति का बुरी तरह शिकार हो चुका है.

इस तरह की राजनीति उस उदारवाद और प्रगतिशीलता के खिलाफ है जिसके आधार पर 28 यूरोप देश एक छतरी के नीचे एकत्रित हुए थे. इन सभी देशों ने व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासकीय हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी संप्रभुता में ढील दी थी. अब ब्रिटेन के यूरोपीय संघ के निकलने से विभिन्न देशों के बीच एकजुटता और सहयोग को बढ़ावा देने के विचार को धक्का लग सकता है. 

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ऐसे ऐतिहासिक वक्त में ही अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प राष्टपति पद के उम्मीदवारी की दौड़ में हैं. अमेरिका यूरोप से अलग लेकिन कितना? कहा जा रहा है कि संपन्नता से वंचित अमेरिकी नागरिकों में काफी क्षोभ और निराशा है.

ट्रम्प और बर्नी सैंडर्स दोनों इन जनभावनाओं को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति देते हैं. परंपरागत अमेरिकी शैली में एक वामपंथी है और दूसरे दक्षिणपंथी. सैंडर्स ने हाल ही में घोषणा की कि वो अपना वोट हिलेरी क्लिंटन को देंगे. लेकिन क्या उनके समर्थक भी उनका अनुसरण करेंगे? ट्रम्प की किस्मत का फैसला इसी सवाल के जवाब से होना है. और अगर ट्रम्प जीत जाते हैं तो दुनिया को एक नए सिरदर्द का सामना करना पड़ सकता है. 

अगर ट्रम्प अपनी अर्थव्यवस्था, आम जनता, युद्ध, शांति और सुरक्षा से जुड़े विचार लागू करने लगे तो ब्रिटेन का यूरोप से अलग होना मामूली बात लगने लगेगी.

पुराना तरीका

दूसरे विश्व युद्ध से उबर रहा यूरोप जर्मनी की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने के लिए उत्सुक नजर आता है. इससे फ्रांस बनाम जर्मनी की रस्साकशी की आशंका बनी रहती है. 

इस्पात और कोयला उद्योग यूरोप की आर्थिक आधारशिला रहे हैं. इनसे जुडे कारोबारियों ने एक तरह की शुरुआत की जिसका नतीजा यूरोपीय आर्थिक समुदाय के रूप में सामने आया. यूरोप को यूरो के रूप में एक नई मुद्रा मिली. यूरोपीय संघ का गठन हुआ. इस सुविचारित ढांचे से ब्रिटेन के बाहर होने का मतलब है कि उसे पुराने तरीकों पर ज्यादा भरोसा है.

यूरोपीय संघ अगर विघटित हो जाए तो भी नाटो एक सैन्य गठबंधन के रूप में जारी रहेगा

भले ही यूरोप में इस समय आर्थिक विचारों का प्रभुत्व हो लेकिन इस गहरे वैचारिक शीत युद्ध के राजनीतिकरण की आशंका बनी रहेगी.

1989 में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ सोवियत रूस (यूएसएसआर) के विघटन के बाद पूर्वी यूरोप के देश यूरोपीय संघ के सदस्य बनने की कतार में आ गए और उनका उदार स्वागत किया गया. हालांकि उनके ऐतिहासिक राजनीतिक अनुभव के देखते हुए वो इसके पात्र नहीं थे.

यूरोपीय संघ अपने सदस्य देशों से बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था से गहरे जुड़ाव और लगाव की उम्मीद रखता है. यूरोपीय संघ सदस्य देशों में लोकतांत्रिक ढांचे, मानवाधिकारों और अल्पसंख्यक अधिकारों के सम्मान पर भी जोर देता है.

ब्रेग्जिटः थोड़ी खुशी और बड़ा नुकसान

सोवियत गणराज्य के पूर्व सदस्य देश धीरे-धीरे यूरोपीय संघ में शामिल किए गए लेकिन उस दौरान भी पूंजीवादी यूरोप और अमेरिका में इन देशों को लेकर एक भय था कि अगर पश्चिमी लोकतांत्रिक देश जागरूक नहीं रहे तो ये देश वापस रूस के पाले में फिसल सकते हैं.

ब्रिटेन के यूरोप से अलग होने के बाद इन देशों में क्या होगा? क्या उनमें फिर से दक्षिणपंथी ताकतें यूरोपीय संघ को खारिज करते हुए लामबंध होने लगेंगी? 

रूस द्वारा क्रीमिया को वापस अधिग्रहित किए जाने और यूक्रेन में पैदा हुए गतिरोध के बाद इस बात की पूरी संभावना है कि अगर यूरोपीय संघ एकजुट न रह पाए तो भी नाटो एक सैन्य गठबंधन के रूप में यथावत बना रहेगा.

तुर्की पर असर

यूरोपीय संघ के कमजोर होने का सीधा असर नाटो के लंबे समय से सदस्य देश तुर्की पर भी पड़ेगा. तुर्की काफी समय से यूरोपीय संघ में शामिल किए जाने की भी दावेदारी पेश करता रहा है. लेकिन यूरोपीय संघ के ताजा राजनीतिक घटनाक्रमों के मद्देजनर क्या तुर्की सदस्यता के लिए पहले की तरह रुचि दिखाएगा? 

तुर्की में इस्लामी विचारों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. सेना लोकतंत्र की रक्षा में कमजोर पड़ती दिख रही है. ऐसे समाज और ऐसे विचारों का तालमेल यूरोपीय दक्षिणपंथियों के संग किस तरह बनेगा. यूरोपीय दक्षिणपंथियों का असल निशाना तुर्की और यूरोप के पुराने उपनिवेश देशों से आने वाले मुस्लिम शरणार्थी ही हैं.

ब्रेग्जिट: अति-राष्ट्रवाद के उभार के पीछे है यूरोप में बढ़ती असमानता

ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका ही की तरह रूस में राष्ट्रवाद उभार पर है. चीन में समाजवाद ने हान राष्ट्रवाद से पूरी तरह तालमेल बिठा लिया है. अब चीन विस्तारवाद के सपने देख रहा है. भारत में 'कुछ हिंदुत्ववादी' कुछ उसी तरह हिंदू बहुसंख्यकों को 'हिंदू' बनाने में लगे हुए जैसे कुछ 'इस्लामवादी' बहुसंख्यक मुसलमानों को 'मुस्लिम' बनाने में लगे हैं. 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'राष्ट्रीयता' के समांतर 'ग्लोबलाइजेशन' का भी उभार हो रहा है. पूरी दुनिया का प्रभुवर्ग इससे राहत पाता है लेकिन जिन लोगों के पास ग्लोबलाइजेशन का लाभ लेने के साधन नहीं हैं उनके विकास पर चुप रहता है.

जाहिर है लोकतंत्र और बाजार के प्रति पूरी दुनिया का भरोसा कम हुआ है. उन्होंने जो वादा किया था उसे निभाने में विफल रहे हैं. और अब हमारे सामने ऐसा दैत्य खड़ा है जिसे हमने बहुत पहले मरा हुआ मान लिया था?

First published: 28 June 2016, 7:37 IST
 
आनंद सहाय @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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