Home » इंटरनेशनल » Xi jinping: The crisis of 'communist dictatorship' over the presidential throne in China
 

चीन में राष्ट्रपति की गद्दी पर 'कम्युनिस्ट तानाशाही' का ख़तरा

सुनील रावत | Updated on: 11 March 2018, 17:23 IST

चीन ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राष्ट्रपति पद के लिए 'दो टर्म' की लिमिट को हटा दिया है. इस फैसले से मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दुनिया का सबसे ताकतवर राष्ट्रपति बनाने की दिशा में बढ़ाया कदम माना जा रहा है. चीन ने 35 साल पहले राष्ट्रपति के रूप में दो टर्म वाला नियम डेंग शिओपिंग ने इसलिए बनाया था ताकि चीन में 'वन मैन रूल' पर लगाम लगाई जा सके. अब इस नियम में संसोधन पर इसे ख़त्म कर दिया गया है.

टर्म लिमिट के समाप्त हो जाने के बाद शी जिनपिंग चीन में तब तक शासन कर सकते है जब तक वह रिटायर नहीं होते. वह चाहें तो आजीवन भी चीन के राष्ट्रपति रह सकते हैं. जिनपिंग को पहले ही देश का अगला माओ घोषित किया जा चुका हैं.

आधुनिक चीन के संस्थापक के रूप में माओ ने 1949 से लेकर 1976 अपनी मृत्यु तक चीन में शासन किया. शी को लेकर चीनी संसद के 2,963 प्रतिनिधि (सांसदों) में से तीन ने इसे बहिष्कृत किया और दो ने संविधान में संशोधन करने के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया. चीन पर करीब से नजर रखने वालों का कहना है कि जिस देश में एक-एक पार्टी का शासन है, वह देश में 'सिंगल मैन रूल' कायम कर सकती है.

जिनपिंग  2012 में हू जिन्ताओ के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे, उसके एक साल बाद वह चीन के राष्ट्रपति बने. कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव होने के अलावा वह सेंट्रल मिलिट्री सैन्य कमीशन के अध्यक्ष हैं, जो चीनी सेना के सर्वोच्च बॉडी है. चीन में महासचिव का पद चीन में राष्ट्रपति की तुलना में अधिक शक्तिशाली है.

माओ ने 1954 में राष्ट्रपति के कार्यालय की स्थापना की थी और पांच साल बाद पद छोड़कर लियू शाओकी को दे दिया था. लियू सिर्फ माओ के लिए एक कठपुतली राष्ट्रपति की तरह काम कर रहे थे और माओ की सांस्कृतिक क्रांति के पक्षधर थे. चीन में वर्तमान में और निकट भविष्य में कोई ऐसा नेता नहीं लगता जो शक्तिशाली शी जिनपिंग को चुनौती दे सकता है.

शी के राष्ट्रपति रहते भ्रष्टाचार के आरोपी कई नेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया. शी के राज में असंतोष के लिए कोई जगह नहीं है, मीडिया और नागरिक समाज पर भारी सेंसर लगा हुआ है. पार्टी में शी का कोई उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण 2023 तक उनके सत्ता में रहने का इरादा पहले ही सामने आ चुका है.

शी यह संकेत देना चाहते हैं कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं. शी अपने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के अंतर्गत कई देशों में राजमार्गों, बंदरगाहों, रेलवे के निर्माण में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके हैं. हालांकि भारत ने इस पहल का विरोध किया है, लेकिन चीन 100 से अधिक देशों के समर्थन का दावा करता है.

चीन पाकिस्तान में 50 अरब डॉलर से अधिक की बुनियादी सुविधाओं वाली परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है और एक महत्वपूर्ण श्रीलंकाई बंदरगाह उसने लीज पर ले लिया है. यही नहीं चीन अब नेपाल को इंटरनेट सेवाएं मुहैया कराने के लिए भी कह रहा है. .मालदीव में भी उसकी कई प्रमुख परियोजनाएं चल रही हैं.

First published: 11 March 2018, 16:57 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी