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भारत-रूस संबंधः 'झटका तो लगा है, पर रिश्ते रहेंगे'

सादिक़ नक़वी | Updated on: 17 October 2016, 2:28 IST
(कैच न्यूज़ )
QUICK PILL
  • रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमिर पुतिन ब्रिक्स सम्मेलन के लिए गोवा पहुंचे और शनिवार को दोनों देशों के बीच 17वां भारत-रूस शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया.  
  • यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हुआ जब हाल ही में रूस-पाकिस्तान के संयुक्त सैन्य अभ्यास के चलते भारत-रूस संबंधों को थोड़ा धक्का लगा.

रूस ने पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास का भावनात्मक कदम इसलिए उठाया क्योंकि भारत के अमेरिका के साथ बढ़ते संबंधों के बीच रूस ने खुद को अकेला खड़ा पाया. साथ ही रूस को इस बात के लिए भी नहीं सराहा गया कि वह रक्षा सहयोग के मामले में पाकिस्तान से दूरी बनाए हुए है. रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात प्रकाश शुक्ला इसे किस नज़र से देखते हैं. 

सादिक नक़वी: आपकी राय में पाक-रूस संयुक्त सैन्य अभ्यास की कितनी अहमियत है?

आनंद शुक्ला: अगर केवल सेना के लिहाज से देखा जाए तो कुछ खास नहीं, क्योंकि वहां रूसी सेना की केवल 200 टुकडि़यां थीं और यह आतंकरोधी अभियान था. लेकिन चूंकि यह पहला ऐसा अभ्यास था, इसलिए इसका राजनीतिक-सामरिक महत्व समझना होगा, जो खुलकर कहूं तो नकारात्मक रहा.

सादिक नक़वी: क्या इसे भारत-रूस के बीच संबंधों में झटका माना जाए?

आनंद शुक्ला: हां, यह एक झटका कहा जा सकता है. लेकिन हमें तो इसका जश्न मनाना चाहिए क्योंकि यह अभ्यास इन दोनों देशों के लिए घाटे का सौदा ही साबित हुआ है. मगर इसे थोड़ा व्यापक पैमाने पर समझने की जरूरत है. मसलन, भारत-रूस संबंधों को देखा जाए तो हम आज भी उसके महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी हैं. हमारे पास जिस तरह की तकनीक और अत्याधुनिक विकास कार्य हैं, वे अद्भुत हैं.

दूसरा, अमेरिका और यूरोप के जिन दूसरे देशों के साथ हमारे प्रगाढ़ संबंध हैं, वे पाक के बड़े रक्षा सहयोगी हैं. देखा जाए तो रूस बहुपक्षीय संबंध की ओर बढ़ रहा है और मानना पड़ेगा कि वह काफी लंबे समय से यही करता आया है. सालों पहले उसने चीन के साथ इस तरह के संबंधों की शुरूआत की थी और अब वह पाकिस्तान की ओर बढ़ रहा है. 

इसी प्रकार हमने भी कुछ ऐसे संबंध बनाए हैं जो शीत युद्ध के वक्त नहीं थे और 1990 के बाद से अमेरिका के साथ हमारे संबंध प्रगाढ़ हुए हैं और साथ ही इजराइल व कुछ यूरोपीय देशों के साथ भी. हमें रूस और पाक के इस नकारात्मक कदम को इन दो बड़े पैमाने पर देखना होगा. 

पाकिस्तान का इतिहास ठीक नहीं रहा है

सादिक़ नक़वी: पाकिस्तान और रूस के बीच बन रहे इन नए संबंधों का भारत पर क्या असर होगा?

आनंद शुक्ला: फिलहाल यह संबंध अपनी शुरूआती अवस्था में हैं. रूस ने पाकिस्तान को कुछ हमलावर हेलीकॉप्टर भेजे हैं, उसके साथ कुछ सैन्य अभ्यास किया है और पाकिस्तानी सेना रूस के दौरे पर जाती रही है. प्रगाढ़ संबंधों की शुरूआत कुछ इसी तरह होती है. 

सादिक़ नक़वी: अब सवाल यह उठता है कि यह कितना लंबा चलेगा?

आनंद शुक्ला: एक तरह से रूस अपनी चिंता जाहिर कर चुका है कि भारत पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध बढ़ा रहा है. साथ ही रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन जब भारत यात्रा पर आए थे तो उन्होंने कहा था, हमें इस बात के लिए पर्याप्त सराहना नहीं मिलती कि हम पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति नहीं करते. 

यह सही है लेकिन साथ ही यह भी सच है कि पाक चीन के रास्ते रूस की तकनीक तक पहुंच बना रहा था और रूस को इस बात की पूरी जानकारी थी. कहने का मतलब यह है कि रूस पाकिस्तान के साथ दूसरे क्षेत्रों जैसे आर्थिक व ऊर्जा क्षेत्र में संबंध बढ़ा रहा है. इससे हमें कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. 

चिंता तब होती है, जब बात सैन्य आपूर्ति की हो क्योंकि इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान भारत को नुकसान पहुंचाने के इरादे से ही काम करता है.

सादिक़ नक़वी: रूस के पाक के साथ संबंधों के बीच अफगानिस्तान की क्या अहमियत है?

आनंद शुक्ला: 1989 और उसके बाद सोवियत सेना को अफगानिस्तान में ही रम जाने की आशंका थी लेकिन बाद में लगा कि तालिबान में सत्ता की वापसी से मध्य एशिया में अस्थिरता का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा. खास तौर पर उजबेकिस्तान में इस्लाम करीमोव के निधन के बाद सवाल उठाए जा रहे हैं कि अब वहां क्या होगा और इसी पर मध्य एशिया के हालात निर्भर हैं क्योंकि जो वहां होगा उससे मध्य एशिया प्रभावित होगा.

रूस की चिंता का कारण यही है. और मुझे लगता है ऐसे अनौपचारिक सुझाव भी दिए गए कि भारत, ईरान और रूस की तिकड़ी अफगान समस्या से निपटे. इसलिए यह एक ऐसा समूह है, जो 1990 में काफी सौहार्द्रपूर्ण तरीके से तालिबान से निपट चुका है.

वे हमें संकेत देते रहे हैं और हमें भी उन्हें सकारात्मक जवाब देना चाहिए और इसमें हमारा भी फायदा है. चार देशों के एक और समूह (अमेरिका, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान) को हमारे हितों की परवाह नहीं है.

शंघाई संगठन सहयोग की चुनौतियां

सादिक़ नक़वी: हाल ही एक इंटरव्यू के दौरान रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने बताया था कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) किस प्रकार से अफगान में बड़ी भूमिका निभा सकता है. भारत और पाक भी जल्द ही एससीओ के सदस्य बनेंगे. इस पर आपका क्या विचार है?

आनंद शुक्ला: यह अनुमान सही नहीं है. एससीओ में एक बड़ी भारी कमी यह है कि इसने अमेरिका को समूह में से हटा दिया और इतना ही नहीं, रूस और चीन के रवैये के चलते यह उसके प्रति नकारात्मक भी हो गया. एससीओ को काबुल, वाशिंगटन, तेहरान और यहां तक कि भारत में भी आसानी से नहीं स्वीकारा जाएगा. इससे कोई नई शुरूआत नहीं होने वाली. हां, कुछ प्रयास हो सकते हैं, जैसे अफगानिस्तान एससीओ के साथ अब एक विशेष पर्यवेक्षक का दर्जा पा चुका है. लेकिन उससे बाकी सदस्यों या दूसरे देशों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जिन्हें एससीओ से वाजिब आपत्तियां हैं.

सादिक़ नक़वी: भारत-रूस संबंधों को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जा सकता है?

आनंद शुक्ला: बोतल में से जिन्न बाहर आ चुका है. भारत और रूस के संबंध अभी रहेंगे. दूसरी ओर अन्य देशों जैसे अमेरिका, स्वीडन और जापान के साथ भारत के संबंधों में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इसमें सैन्य क्षेत्र में सहयोग भी शामिल है. 

भारत-रूस संबंध काफी महत्वपूर्ण हैं. ऊर्जा इसमें एक बहुत बड़ा घटक है. रक्षा सहयोग में कुछ आशंकाएं थीं जिन्हें दूर कर लिया गया है. पिछले 15 सालों का रिकॉर्ड उठा कर देखेंगे तो आप पाएंगे कि रूस दूसरे साझेदारों से कहीं आगे है.  अफगानिस्तान पर भी हमारा रुख समान है. हमें उसे महत्व देने की जरूरत है.

रूस के पूर्व प्रधानमंत्री प्रिमाकोव ने आरआईसी (रशिया-इंडिया-चाइना) नाम से एक फोरम बनाया था, जिस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया और इसका सही उपयोग भी नहीं हो पाया. रूस ने चीन की तरफ कदम बढ़ाए और वह जानता था कि भारत इसे लेकर पूर्णतः आश्वस्त नहीं है, इसलिए इससे निपटने के लिए रूस ने यह संगठन बनाया था.

इन तीनों देशों के बीच काफी समानता है, जैसे-विदेशी धन को लेकर सारे तीनों ही देश एक हैं और अगर एक साझा मुकाम पर पहुंचने की बात हो तो इनका कोई सानी नहीं है.

बेहतर होगा कि भारत इन मसलों की अगुवाई करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा लोकतंत्र है. ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों से भी काफी काम किया जा सकता है. मुझे लगता है कि भारत और ईरान तथा मध्य एशिया और रूस के बीच संबंध भी पूरी तरह से भुनाए नहीं गए. केवल हाइड्रोकार्बन की वजह से ही नहीं बल्कि उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की भूमिका भी इसमें अहम होगी जो निकट भविष्य में लागू किया जाएगा.

हमें साथ मिल कर और भी बहुत कुछ करना है. बात जब अंतरराष्ट्रीय मसलों की आती है तो एनएसजी में भारत की सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार में भारत को शामिल करने के मुद्दों पर रूस भारत के साथ है.

First published: 17 October 2016, 2:28 IST
 
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