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इंशा के बाद 13 साल की इफरा की आंखें भी पैलेट से ज़ख़्मी

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 November 2016, 7:45 IST
QUICK PILL
  • घाटी में पैलेट गन से घायल और आंख की रोशनी गंवाने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी है लेकिन अब ऐसी ख़बरें अख़बार की सुर्ख़ियां नहीं बन पातीं. 
  • बुरहानी वानी की मौत के बाद पैलेट गन से पीड़ित 1,065 लोग अस्पताल में भर्ती किए गए. इनमें से 523 की उम्र 20 साल से कम है और 101 की उम्र 15 साल से भी कम है और 370 लोगों की आंख में घाव हुआ है.

पैलेट्स से कश्मीरी बच्चों की आंख की रोशनी का जाना जारी है लेकिन अब उनपर खबरें नहीं बनतीं. 14 साल की इंशा मलिक पैलट गनफायर की शिकार हो गई थीं और उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई है. उनके बाद 13 साल की इफरा की कहानी भी उनसे ज्यादा अलग नहीं है. इफरा की आंख की रोशनी भी जा सकती है. पैलेट गन से घायल होने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी है और घाटी में शांति के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे. 

पैलेट गन का इस्तेमाल बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर घाटी में शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन पर काबू पाने के लिए पुलिस बलों ने शुरु किया था. 14 साल इंशा मलिक नौवीं क्लास की छात्रा थीं जिनकी पैलेट गनफायर में ज़ख़्मी होने के नाते दोनों आंखों की रोशनी चली गई है. अब इस पैलेट गन का नया शिकार 13 साल की इफरा हैं.

इंशा की तरह इफरा भी दक्षिण कश्मीर से हैं लेकिन पुलवामा से. यह शोपियां कस्बे से सटा हुआ है. इंशा की तरह इफरा भी घर पर ही थीं, जब वह पैलेट गन का शिकार हुईं. इफरा अपने घर के लॉन में थी कि तभी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के दौरान पैलेट गन से चलाई गई गोली उनके चेहरे पर आकर लगी.

इफरा श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में भर्ती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक उनकी आंख की रोशनी भी पूरी तरह जा सकती है. हालांकि इफरा की देखरेख कर रहे चिकित्सकों ने उसकी आंख में रोशनी आने की थोड़ी उम्मीद जगाई है. वहीं इंशा की दोनों आंखों की रोशनी खो चुकी है. 

इफरा का इलाज कर रहे डॉक्टर ने कहा कि उनकी आंखों में रोशनी आने के उम्मीद ज्यादा अच्छी नहीं हैं. हम अपना

बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एक तथ्य यह भी है कि मीडिया का ध्यान इफरा की ओर कम गया है. डॉक्टर कहते हैं कि सरकार ने उन्हें और उनके सहयोगियों को मीडिया से बात करने से मना किया है. मैं इफरा के बारे में आपको जानकारी इस शर्त पर दे रहा हूं कि आप मेरी पहचान उजागर नहीं करेंगे. 

इंसानियत लापता

इफरा के साथ ही दो और लड़कियों अफरोज़ा (18) और शबरोज़ा (20) की भी आंख की रोशनी पर असर पड़ा है. 18 साल की अफरोजा की बाईं आंख पैलेट्स से ज़ख़्मी हो गई है. वह कहती हैं कि प्रदर्शन के दौरान जब वह अपनी छोटी बहन को देखने गई थी, तभी पैलेट गन का शिकार हो गईं. अस्पताल में अफरोज़ा को पता चला कि जब गनफायर हुआ था, तब उनकी छोटी बहन ने अपने हाथ से आंखों को ढक लिया था.

दूसरी ओर, शबरोजा की बाईं आंख पर असर पड़ा है. डॉक्टरों के मुताबिक घाव गहरा है और उनकी आंख की रोशनी लौटना नामुमिक सा है. पहले 100 दिनों के एसएमएचएस के नेत्र विभाग और एसकेआईएमएस मेडिकल कॉलेज से जो आंकड़े उपलब्ध हुए हैं, उससे राज्य की भयावह तस्वीर ही बयां होती है.

इस दौरान पैलेट्स गन से पीड़ित 1,065 लोग भर्ती किए गए. इन घायलों का दर्दनाक पहलू यह है कि इनमें से 523 शिकार की उम्र 20 साल से कम है और 101 की उम्र 15 साल से भी कम है. पैलेट्स गन से 370 लोगों की आंख में घाव हुआ है.

इनकी उम्र 20 से 25 के बीच है. पैलेट गन का शिकार बनने वालों में सबसे कम उम्र की चार साल की मासूम ज़ोहरा मजीद हैं. उनके पैर व पेट में पैलेट की गोली लगी है. उन्हें उनके श्रीनगर के बाहरी इलाके क्वामवारी के घर में ही रखा गया है.

लगभग कोई उम्मीद नहीं

मुंबई के मशहूर नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एस नटराजन एक एनजीओ बॉर्डरलैस वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन की ओर से पैलेट गन से पीड़ित लोगों का इलाज करने लगातार घाटी में आ रहे हैं. उनका कहना है कि पैलेटगन के शिकार हुए लोगों की आंख में रोशनी लौटना अनिश्चित ही रहता है. कुछ कह नहीं सकते. रोशनी आ भी सकती है और नहीं भी.

डॉ. नटराजन जो ऑक्यूलर ट्रॉमा सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं. वह कहते हैं कि एक बार पैलेट आंख में घंस जाए तो रोशनी के लौटने में कोई गारंटी नहीं होती है. इलाज अक्सर थकाने वाला और लम्बा चलने वाला होता है. यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि आंख में रोशनी आ ही जाएगी. कब और कितनी आएगी, यह भी नहीं कहा जा सकता.

अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक पैलेट से ज़ख्मी आंख की रोशनी या तो पूरी चली जाती है अथवा काम लायक की रह पाती है. इफरा का मामला अधर में लटका हुआ और काफी बुरा है. एसएमएचएस अस्पताल के नेत्र विभाग के हेड डॉ. तारिक कुरैशी ने कैच से बातचीत में बताया कि हम अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं ताकि इफरा की हालत इंशा जैसी न हो जाए. उनका ऑपरेशन कर दिया गया है. हमे उम्मीद है कि नतीजे बेहतर आएंगे 

अंधेरा भविष्य

इस बीच इंशा का ज़ख़्मी चेहरा घाटी में चल रही अशांति का प्रतीक बन गया है. एम्स समेत नई दिल्ली, मुम्बई के अस्पतालों में उनका काफी महंगा इलाज हुआ. वह अब अपने घर चली गई हैं. आंख की रोशनी लौटाने की सभी कोशिशें नाकाम हो गईं हैं.

अपने कमरे में घरवालों और मेहमानों से घिरी बैठी इंशा की तमन्ना है कि एक बार वह अपनी मां का चेहरा देख सकें. फिर से स्कूल जा सकें और स्कूल की अपनी सहेलियों से मिल सकें. सिसकते हुए इंशा अपनी मां से कहती है, 'मां, मैं आपकी सूरत देखना चाहती हूं. मैं अपना स्कूल, अपनी किताबें देखना चाहती हूं, सहेलियों से मिलना चाहती हूं'.

इंशा के अम्मी-अब्बू अपनी बेटी के लिए अपनी आंख देने को तैयार हैं ताकि प्रत्यारोपण के ज़रिए इंशा देख पाएं. इसके अलावा आंख में रोशनी लौटने का कोई रास्ता नहीं है. डॉक्टरों ने कहा है कि नेत्र प्रत्यारोपण की संभावना अभी बची हुई है. 

मगर सवाल है कितनों लोगों की आंखों का प्रत्यारोपण होगा क्योंकि इंशा ही अकेली नहीं है जिनकी तकदीर पर अंधेरा छा गया है. उनके साथ सैकड़ों और भी हैं. लड़के और लड़कियां भी. आदमी और औरतें भी कम या पूरी तरह ने अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुके हैं.  

और इससे भी ज्यादा अफ़सोसनाक यह है कि कोई उनका नाम तक नहीं जानता. वे घाटी में चल रही अशांति के महज आंकड़े बनकर रह गए हैं. जैसे अभी तक 95 लोगों की जान जा चुकी हैं और 15,000 से ज्यादा लोग घायल हैं. शोर सिर्फ इक्का-दुक्का नामों का है और ज़िंदगी सभी की एक जैसी. 

First published: 7 November 2016, 7:45 IST
 
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