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कश्मीर की त्रासदी को बयान करने वाले एक ब्लॉगर और चरमपंथी की मौत

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 18 December 2016, 8:10 IST
(गेटी इमेजेज़)

'मैं एक ऐसे मुल्क़ का हूं जिसे अमन की धरती समझा जाता है.'

फिर सवाल हुआ, 'तुम्हारा नाम क्या है?'

'मेरा नाम इंसानियत है' 

अब मैंने पूछा, 'मुझे पीटने वाले कौन लोग थे?' 

उस शख़्स का जवाब था, 'वर्दीधारी'.

मैंने फिर पूछा,  'वो मुझे क्यों पीट रहे थे'. 

'वो तुम्हें पीट नहीं रहे थे. वे तो सिर्फ अपनी मांस-पेशियां ढीली कर रहे थे' .

यह डायलॉग उस आखिरी ब्लॉग का हिस्सा है जो हिजबुल मुजाहिद्दीन के 22 साल के चरमपंथी बासित अहमद डार ने लिखा था. दक्षिणी कश्मीर के एक गांव में इसी बुधवार को सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में वह मारा गया. यह मुठभेड़ बहुत ही कम वक्त में हुई, एक घंटे से भी कम में. डार ने सरेंडर करने से मना कर दिया था. लेकिन अपनी शुरुआती सैन्य ट्रेनिंग में ही उसने यह जान लिया था कि वो ज्यादा वक़्त तक ऐसे एनकाउंटर से नहीं बच पाएगा. सुरक्षा बलों को उसे मार गिराने में थोड़ी ही मुश्किल आई.   

इसके बाद वॉट्सएप पर बासित की फोटो वायरल हो गई और फेसबुक पर जो फोटो पोस्ट की गई, उसमें उनकी लाश खुले आसमान के नीचे पड़ी हुई थी जिसके इर्द-गिर्द सुरक्षा बलों के जवान खड़े थे.

बीटेक से चरमपंथी तक

तीन महीने पहले घाटी में फैली अशांति से उपजी टीस के चलते डार हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल हुए थे. वह घाटी की इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी में बीटेक के स्टूडेंट थे. इससे ज्यादा, यह कि वह एक ब्लॉगर थे जिसने घाटी के हालात पर छोटे-छोटे लेख लिखे थे.  

आखिरी ब्लॉग जो उन्होंने 30 जून को पोस्ट किया था, उसका शीर्षक था, ‘हां, यही कश्मीर है'. ब्लॉग के जो कंटेंट हैं, उससे न केवल उसकी सोच (बंदूक उठाने के एक माह पहले की) का पता है बल्कि इससे कश्मीरी नौजवानों के बीच हो रहे संवादों और बातचीत पर भी रोशनी पड़ती है. ऐसे ही एक घटना का ज़िक्र है जब पहचान पत्र नहीं दिखा पाने के कारण उन्हें सुरक्षाकार्मियों ने पीटा था.

उन्होंने गुस्से से भरी लाल आंखों से घूरते हुए कहा, 'पहचान पत्र दिखाओ.'

मैंने कहा...मैं तो कुदरत का नज़ारा देखने को निकला था. हमें पहचान पत्र की क्या जरूरत है? आइडेंटिटी कार्ड क्या होता है? लेकिन दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं. तब उन्होंने मुझसे कहा, खड़े हो जाओ और वे मुझे इस तरह पीटने लगे मानों किसी की शादी हो और ड्रम बजाया जा रहा हो.  

ख़तरनाक ट्रेंड

डार का दुखद अंत कश्मीर की एक त्रासदी की ओर इशारा करता है, खासकर वहां के नौजवानों के लिए. घाटी में चार माह की अशांति को ख़त्म करने के लिए सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर सर्च अभियान चलाया जिसके बाद से दक्षिणी कश्मीर में अलग-अलग मुठभेड़ों में दस से ज्यादा नौजवान मारे जा चुके हैं. इनमें से दो की मौत तो आग में झुलस जाने से हुई. उनके घरों में आग लगा दी गई थी और वे जली हुई हालत में जमीन पर गिरे मिले थे.  

घाटी में बमुश्किल अशांति ख़त्म करने के लिए कार्रवाई हुई है. जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक आंकलन के मुताबिक मौजूदा तनाव के दौरान लगभग 60-70 युवा लापता हो गए हैं. नब्बे के शुरुआती दशक के बाद से इतनी कम वक़्त में गायब होने वाले नौजवानों की यह संख्या सबसे ज्यादा है. अगर सभी नहीं तो, इनमें से ज्यादातर के आतंकी संगठनों में शामिल होने की आशंका है. 

इस आशंका को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि सोशल मीडिया पर जो नए आतंकी वीडियो पोस्ट किए गए हैं, उनमें कुछ नए चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं. हकीकत में, बारामूला जिले में कथित रूप से 13 चरमपंथी घुस आए हैं. बारामूला ऐसा जिला है जहां हाल के सालों में स्थानीय चरमपंथ थोड़ा ही देखा गया है.

इससे बेहद साफ़ है कि घाटी में हिंसा को बढ़ावा मिला है. 2015 में 174 लोगों की मौत हुई जिनमें 113 चरमपंथी, 41 सुरक्षाकर्मी और 20 नागरिक थे जबकि इस साल जम्मू-कश्मीर में अब तक 260 लोग मारे जा चुके हैं. इनमें 163 चरमपंथी, 84 सुरक्षाकर्मी और 13 नागरिक हैं.    

चरमपंथ को बढ़ावा

अशांति के मौजूदा हालात में स्थानीय चरमपंथियों की भर्ती को भी बढ़ावा मिला है. सीमा पार से घुसपैठ कर आने वाले जिहादियों ने इनकी भर्ती की है. सीमा पार से आने वाले जिहादी सैन्य शिविरों पर फिदायीन हमलों को अंजाम देते रहे हैं. जुलाई में घाटी में जब अशांति चरम पर थी, तब पूरे कश्मीर में नौजवानों की रैली में 'एक बार फिर बंदूक उठाओ' जैसे नारे लगाए जा रहे थे.

स्थानीय स्तम्भकार नसीर अहमद का कहना है कि लम्बे समय तक चलने वाले संघर्ष, राजनीतिक अनिश्चितता और इसके चलते नाउम्मीदी के कारण लोगों में गुस्सा गहरे तक बैठ गया है. इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है. वह आगे कहते हैं कि युवाओं को काबू में करने की बात तो दूर, चरमपंथियों और हाल की अशांति के दौरान नागरिकों की हत्याओं की बढ़ती संख्या ने सिर्फ़ गुस्सा बढ़ाने और ज्यादा लोगों को बंदूक उठाने के लिए उकसाने का ही काम किया है.

डार का ब्लॉग राज्य के हालात का खाका खींचता है और युवाओं के बीच उस अन्याय का जो वे झेल रहे हैं. डार के ब्लाग का यह डायलॉग हकीकत बयां करता है-

'इस जगह को क्या कहा जाता है?'

शख़्स जवाब देता है 'इसे धरती का स्वर्ग कहते हैं?'

'क्या? नहीं, यह सच नहीं हो सकता. मैं कमरे में मौजूद हरेक से सवाल करना शुरू करूंगा और हरेक यही जवाब देगा, हां, यही कश्मीर है'. 

First published: 18 December 2016, 8:10 IST
 
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