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एएस दुलत: आज वाजपेयी जैसा कोई कद्दावर नेता नहीं है जो कश्मीर समस्या सुलझा सके

अश्विन अघोर | Updated on: 29 November 2016, 8:04 IST
QUICK PILL
  • पूर्व रॉ प्रमुख और ‘कश्मीर: द वाजपेयी ईयर्स’ किताब के लेखक अमरजीत सिंह दुलत ने कहा है कि घाटी में पिछले चार महीने में हालात ख़राब हुए हैं. दुश्वारियां बढ़ी हैं. 
  • सभी अड़चनों के बावजूद, दोनों सरकारें अगर समस्या पर बात करें, तो किसी एक नतीजे पर पहुंचने की राह आसान होगी. इसके सिवा कश्मीर समस्या को हल करने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है.’
  • दुलत ने बीते शुक्रवार को ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, मुंबई के एक कार्यक्रम ‘कश्मीर, अशांति के कारण और शांति के रास्ते’ में यह बात कही. 
  • दुलत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सलाहकार भी रह चुके हैं. उनका मानना है कि मौजूदा राजनीतिक हालात में वाजपेयी जैसा कोई कद्दावर नेता नहीं है, जो कश्मीर की समस्या का हल कर सके. 

रॉ के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत ने कहा है कि घाटी में उग्रवाद के पोस्टर ब्वॉय बुरहान वानी के एनकाउंटर से कश्मीर में अशांति बनी हुई है. वह कहते हैं, 'इस साल जून में मैं कश्मीर में था और महसूस कर सकता था कि यहां कुछ बहुत ही गड़बड़ चल रहा है.’ दुलत ने कहा कि मिडिल क्लास फैमिली से आने वाले वानी जुलाई में मरने के बाद सभी के हीरो बन गए. उनमें हिम्मत थी अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करने की. 

दुलत ने पूछा, ‘राजनेताओं और नौकरशाहों के पास उनकी हत्या को सही ठहराने की कई वजह हैं, पर मैं जानना चाहता हूं कि क्या उन्हें मारना वाक़ई ज़रूरी था? यासीन मलिक की तरह उनसे भी निपटा जा सकता था. सरकार और इंटलिजेंस एजेंसियों की कोशिशों के बाद उन्होंने हथियार डाल दिए थे.’ उन्होंने कहा कि एक उग्रवादी की औसत उम्र ढाई साल होती है. उसके बाद वह या तो आत्मसमर्पण कर देते हैं या फिर पाकिस्तान भाग जाते हैं. यसीन मलिक की तरह बुरहान वानी को भी हैंडल किया जा सकता था.

दुलत मानते हैं कि बुरहान की मौत के बाद कश्मीर में हालात 1989 के आतंकवाद की शुरुआत से भी ज़्यादा ख़राब हो गए है

दुलत का मानना है कि बुरहान की मौत के बाद कश्मीर घाटी में हालात 1989 के आतंकवाद की शुरुआत से भी ज़्यादा ख़राब हैं. उन्होंने कहा, 'हालांकि अभी हालात सामान्य हैं, लेकिन करीब 1500 नौजवान पत्थरबाज़ी के लिए अब भी सलाखों के पीछे हैं. बुरहान वानी भी कभी पत्थरबाज़ थे, जो बाद में उग्रवादी बन गए. हमें सोचने की ज़रूरत है उन युवाओं के बारे में जो अब सलाखों के पीछे हैं.’ दुलत के मुताबिक पाकिस्तान की कश्मीर पर पकड़ काफी कम हो गई थी, मगर वानी की हत्या से उसने ना सिर्फ़ वापस पकड़ बनाने में मदद मिली, बल्कि मज़बूत भी हुई. 

दुलत ने कहा, ‘बुरहान वानी की हत्या ने पाकिस्तान को भी चौंकाया. वहां का नेतृत्व चार से ज़्यादा दिन तक सदमे में रहा और समझ नहीं पाया कि क्या प्रतिक्रिया करे. हत्या के बाद जो अशांति फैली, उससे पाकिस्तान को घाटी में लौटने का मौका मिल गया है.’

राजनीति

2014 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा और पीडीपी का गठबंधन हु्आ. इस पर बोलते हुए दुलत ने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर को साथ लाने के लिए गठबंधन ज़रूरी और महत्वपूर्ण था. मगर मरहूम मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने यह कहकर मौका खो दिया था, जब उन्होंने पाकिस्तान और उग्रवादियों को शांतिपूर्ण चुनाव होने देने के लिए शुक्रिया कहा था. नतीजा यह हुआ कि आम कश्मीरियों ने उनसे दूरी बना ली. सईद ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अंतिम कार्यकाल में पहले शतक बनाया और दूसरे में जीरो से बाहर निकले.’ 

दुलत के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के वर्तमान हालात से पाकिस्तान को मदद मिलेगी, भारत को नहीं. पाकिस्तान फिर से जम्मू-कश्मीर में घुस जाएगा. दुलत ने आगे कहा, ‘कश्मीरी जानते हैं कि पाकिस्तान उनके लिए कुछ नहीं कर सकता. फिर भी अशांति की स्थिति में उनके लिए यही रास्ता बचता है.’

वाजपेयी का नज़रिया

दुलत के मुताबिक वाजपेयी मीठी ज़ुबान की शख़्सियत थे. जिन्होंने भी उन्हें करीब से देखा और उनकी राजनीति को समझा है, सभी जानते हैं कि पाकिस्तान से मुकाबले जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली पर उनका नज़रिया एकदम साफ था. दुलत ने आगे कहा, ‘जब पी.वी.नरसिंहा राव प्रधानमंत्री थे, एक अलगाववादी नेता दिल्ली आए थे. उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया, पर वे वाजपेयी से मिले और मानवता के मुद्दे को हल करने के उनके विचारों से बेहद प्रभावित हुए. उस बैठक का नतीजा यह हुआ कि आज भी वाजपेयी का घाटी में सम्मान है.’ 

उनका कश्मीर और कश्मीरियों से भावात्मक लगाव था. उनकी शांति की पहल का समर्थन करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकने को तैयार थे. दुलत ने आगे कहा, ‘वाजपेयी ऐसे प्रधानमंत्रियों में से थे, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में जन सभा को संबोधित किया था.’

दुलत ने कहा, ‘वाजपेयी के कार्यकाल में, शांति की पहल यहां तक हुई कि एल.के.आडवाणी के कड़े रुख के बावजूद अलगाववादी गुट को आडवाणी हुर्रियत बुलाने लगे. वाजपेयी और आडवाणी जो भी कहते और प्रस्ताव रखते, वे मानने को तैयार रहते थे.’

First published: 29 November 2016, 8:04 IST
 
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