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कश्मीर में पत्थरबाजी रुकने की वजह नोटबंदी नहीं है, सच्चाई कुछ और है

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 November 2016, 13:31 IST

ठीक एक सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कालाधन, भ्रष्टाचार समेत कई गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए पुराने 500-1000 रुपये के करेंसी नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद से देश में नोट बदलने और जमा करने को लेकर अफरा-तफरी चल रही है. लेकिन इस बीच सोमवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि इन नोटों के बंद होने की वजह से कश्मीर में सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी की घटनाएं बंद हो गईं हैं. यह बात बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर भी खूब फैलाई जा रही है. हालांकि हकीकत इससे जुदा है.

दरअसल सोमवार को भाजपा विधायक अतुल भाटखालकर द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में पर्रिकर ने इस साहसिक कदम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हुए कहा कि 500-1000 रुपये के उच्च मूल्यवर्ग वाले नोट बंद होने से आतंकवाद का वित्तपोषण बंद हो गया है. इससे मादक पदार्थों पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी.

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उन्होंने आगे कहा, "पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री के साहसिक कदम के बाद सुरक्षाबलों पर पथराव नहीं हो रहा है. पहले दरें तय थीं- सुरक्षाबलों पर पथराव के लिए 500 रुपये और किसी अन्य काम के लिए 1000 रुपये. लेकिन प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के वित्तपोषण को खत्म कर दिया."

रक्षा मंत्री के इन विचारों का सीधा मतलब यह था कि नोटबंदी की वजह से जम्मू-कश्मीर में पिछले चार माह से सुरक्षाबलों के खिलाफ चली आ रही हिंसा की गतिविधियों पर लगाम लगी है. क्योंकि पत्थरबाजी करने वाले लोग पहले 500-1000 रुपये के नोट लेकर यह वारदातें करते थे. 

बुरहान वानी की मौत कश्मीर घाटी में आतंक का अंत

यह रकम इन पत्थरबाजों को पहुंचाने के लिए वहां बैठे आतंक के आका हवाला की रकम का इस्तेमाल करते थे. लेकिन अब जब यह नोट बंद हो गए हैं, पत्थरबाजों को देने के लिए उनके पास पैसे ही नहीं बचे हैं. 

हांलाकि हकीकत कुछ और है. कश्मीर में हिजबुल सरगना बुरहान वानी की सुरक्षाबलों से मुठभेड़ में मौत के बाद पिछले चार माह से जारी हिंसा में अब कमी आई है. इस दौरान सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी करने वाले लोग अब चुप हो गए हैं. 

जानिए इसके पीछे तीन प्रमुख कारणः

1. हुर्रियत की गाइडलाइंस का असर

बीते 8 जुलाई को सुरक्षाबलों से हुई एक मुठभेड़ में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत हो गई थी. इसके बाद से घाटी में सुरक्षाबलों के खिलाफ जमकर हिंसात्मक प्रदर्शन होने शुरू हो गए. बीते चार माह से यह जारी हैं. 

घाटी में जारी तनाव के चलते दो पुलिसकर्मी समेत  85 लोगों की मौत हो गई थी जबकि हजारों लोग घायल हो गए थे. इस दौरान हुई झड़पों में करीब 5,000 सुरक्षाबलों के जवान घायल हुए थे.

लेकिन अब पत्थरबाजी रुकने का एक प्रमुख कारण हुर्रियत की वो संशोधित गाइडलाइंस हैं जिन्हें कुछ वक्त पहले हुर्रियत द्वारा जारी किया गया. हुर्रियत की नई संशोधित गाइडलाइंस में पत्थरबाजी से परहेज की बात कही गई थी जिसके बाद ही पत्थरबाजी की घटनाओं में कमी देखने को मिली थी. बताया जा रहा है कि प्रदर्शनकारियों और पत्थरबाजी करने वालों पर हुर्रियत का बेहद प्रभाव है, इसके चलते पत्थरबाजी की घटनाएं थमी हैं.

2. नवंबर में बढ़ती ठंड का असर

दरअसल घाटी में इन दिनों यानी नवंबर माह से कड़ाके की सर्दी की शुरुआत हो जाती है. यहां ठंड का आलम यह हो जाता है कि पारा शून्य या इससे नीचे माइनस तक चला जाता है. अमूमन हमेशा से इस मौसम के आते-आते घाटी में विरोध प्रदर्शन थम जाते हैं. 

कड़ाके की ठंड के चलते प्रदर्शनकारी हों या आम जनता वो ज्यादातर वक्त खुद को आगे आने वाली लंबी सर्दियों से निपटने के इंतजाम में जुट जाती है और इसके साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर लोगों का जमावड़ा भी अपेक्षाकृत कम हो जाता है.

वैसे भी कश्मीर में आतंक के समर्थक और प्रदर्शनकारी जून से अक्तूबर तक ज्यादा सक्रिय रहते हैं और इस दौरान ही सुरक्षाबलों के खिलाफ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की घटनाओं में ईजाफा होता है. लेकिन अब नवंबर की शुरुआत हो चुकी है और कड़ाके की ठंड पड़ना चालू हो चुका है, तो ऐसे में पत्थरबाजी करने वाले घर से निकलने से पहले भी सौ बार सोचते हैं.

3. बोर्ड परीक्षाएं शुरू हुईं

घाटी में पत्थरबाजी, नोटबंदी, हिंसात्मक प्रदर्शन जैसी बातें इस वक्त पुरानी हो जाने की प्रमुख वजह बोर्ड परीक्षाएं भी हैं. सोमवार से जम्मू-कश्मीर में 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो गईं. करीब छह माह बाद घाटी के स्कूलों में इन परीक्षाओं के साथ चहल-पहल लौटी. इन परीक्षाओं में करीब 95% छात्रों की उपस्थिती दर्ज की गई.

इससे पहले जुलाई से हिंसा की आग में जल रही घाटी में 35 स्कूल जला दिए गए थे. छह माह से बंद स्कूलों और बच्चों की पढ़ाई न हो पाने को ध्यान में रखते हुए बोर्ड परीक्षा में आधे स्लैबस से ही सवाल पूछे जाएंगे.

जाहिर है बोर्ड परीक्षाओं के शुरू होने से भी पत्थरबाजी की घटनाओं में कमी देखने को मिली है. अलगाववादी नेताओं के मुंह पर भी लगाम लगी है.

First published: 15 November 2016, 13:31 IST
 
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