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नोटबंदी: देश में अफ़रा-तफरी, कश्मीर में शांति

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 21 November 2016, 7:28 IST
QUICK PILL
  • 8 नवंबर को नोटबंदी की अचानक हुई घोषणा के बाद जहां देशभर में हालात ख़राब हुए हैं, वहीं कश्मीरियों पर इसका असर लगभग नहीं के बराबर है. 
  • आपसी सहमति और सामुदायिकता की भावना के चलते यहां 500 और 1,000 के नोट भी चल रहे हैं. 50 दिन की समय सीमा को वे 50 दिन की छूट के रूप में ले रहे हैं.

कश्मीर में न एटीएम पर क़तार है और न ही बैंकों में भीड़. यहां 500 और 1,000 की नोटों का लेन-देने अभी भी उसी तरह है, जैसे 8 नवंबर के पहले था. यह सिलसिला 31 दिसंबर 2016 तक यूं ही चलने की उम्मीद है. 

8 नवंबर की रात नोटबंदी का ऐलान होते ही देशभर में अफ़रा-तफ़री मच गई. अगले दिन यानी 9 नवंबर से रोज़मर्रा के सामानों की ख़रीद-फरोख़्त में दिक्कतें आने लगीं. बहुत बड़ा वर्ग महज़ इसलिए परेशान हो गया क्योंकि कैश नहीं निकाल पाने की वजह से वह सब्ज़ी, दूध, फल और राशन नहीं ख़रीद पा रहा था. मगर दूसरी तरफ़ घाटी में यह संकट नहीं दिखा. वजह यह है कि कश्मीरियों के बीच आपसी भरोसा और सेंस ऑफ कम्युनिटी काफ़ी मज़बूत है. घाटी में गांवों और शहरों की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर भरोसे पर ही चलती है. 

आपसी भरोसा

आमतौर पर कश्मीरी ग्रॉसरी शॉप से रोज़मर्रा के सामान ख़रीदते रहते हैं और हिसाब-किताब महीना पूरा होने पर करते हैं. लिहाज़ा, कश्मीरियों को दुकानों पर जाकर उधार सामान ख़रीदने के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ा. कश्मीर के युवा पत्रकार अनीस ज़रगर कहते हैं, 'पिछले दिनों मेरे अब्बा घर का राशन लेने नज़दीक की दुकान पर गए. घर में कैश भी ख़त्म हो गया था, सो उन्होंने दुकानदार से सामान के अलावा 1,000 रुपए भी उधार लिए. अनीस ने बताया कि 1,000 रुपए से एक या दो दिन ख़र्च चल जाएगा और तब तक कैश आ जाएगा.'

दुकानदार से उधार सामान या रुपए भी मांग लेना कोई अनोखी घटना नहीं है. अनीस बताते हैं कि चूंकि दुकानदारों के पास कैश हमेशा होता है तो वह अपने किसी भी जानने वाले को बिना सोचे उधार दे देते हैं और उन्हें वादे के मुताबिक तय वक़्त पर रक़म वापस मिल जाती है. कश्मीर में हिंसा, हड़ताल और कर्फ्यू अक्सर होने की वजह से लोग एटीएम या बैंक तक नहीं पहुंच पाते, इसलिए कभी-कभी दुकानदारों से कैश लेकर काम चला लेना आम है.

कैश था ही नहीं

कश्मीर में नोटबंदी की मार नहीं पड़ने की बड़ी वजह पिछले चार महीने से फैली अशांति है. आमतौर पर घाटी में तीन-चार महीने तक का राशन स्टोर किया जाता है ताकि अचानक कर्फ्यू या मौसमी दिक्कतों से खाने-पीने का संकट ना हो जाए. इसके अलावा घरों में थोड़ा-बहुत कैश भी होता है. मगर बुरहानी वानी की मौत के बाद घाटी में उपजी हिंसा चार महीने तक खिंच गई. ऐसे में घरों में रखा कैश ख़त्म हो गया और पुरानी नोटें बदलवाने के लिए बैंकों पर भीड़ नहीं उमड़ी. 

एक पहलू यह भी है कि यहां आपसी सहमति से 500 और 1,000 के नोट 31 दिसंबर तक लेना तय हुआ है. इसलिए भी बैंकों पर जाकर नोटों को बदलवाने की कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखती. देशभर से जब बैंक कर्मियों और क़तार में लगे लोगों की मौत की ख़बरें हर दिन आ रही हैं, तब कश्मीर में अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है.

सामुदायिक जुड़ाव

8 नवंबर की रात नोटबंदी की घोषणा होने के चार घंटे बाद से ही नोटों के लेन-देन पर पाबंदी लग गई थी. इस कारण से लोगों को संभलने का वक़्त नहीं मिला और अगले ही दिन से बैंकों के बाहर पुरानी नोटों को जमा करने और नई करंसी निकालने की होड़ लग गई. मगर दूसरी तरफ़ घाटी ने 50 दिन के भीतर नोट बदलने की समय सीमा को 50 दिन की छूट मान लिया. वह इन नोटों से लेन-देन और धीरे-धीरे बैंकों पर जाकर अदला-बदली कर रहे हैं. 

एक अन्य पत्रकार अज़ान भट कहते हैं, 'कश्मीर में गरीबी देश के बाकी राज्यों जैसी नहीं है. सामाजिक न्याय के इरादे से यहां 1930 में ज़मीनों का पुनर्वितरण कर दिया गया. तभी से ग़रीब से ग़रीब आदमी के पास भी अपनी ज़मीन है जिसपर वो सब्ज़ियां, अनाज, फल और मेवे उगाते हैं. इसीलिए बाक़ी भारत जैसा दृश्य यहां नहीं दिखता' उन्होंने आगे कहा, 'कश्मीर में किसी तरह की जमाखोरी बड़े पैमाने पर नहीं है, इसलिए यहां भ्रष्ट भी हैरान-परेशान नज़र नहीं आ रहे.'

अज़ान कहते हैं कि जब भी कोई संकट आता है तो सभी मिल-जुलकर इसे दूर करते हैं. जैसे चार महीनों से जारी अशांति की वजह से शहरी इलाक़ों में सब्ज़ियां नहीं पहुंच पा रही थीं. तब गांव के किसान सब्ज़ी और फलों से लदे ट्रक लेकर शहर में पहुंच गए और सबकुछ नो प्रॉफिट नो लॉस या फ़िर मुफ़्त में बांट दिया ताकि कोई भूखा ना रह जाए. 

बार्टर सिस्टम

जामिया मिल्ल्यिा के पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे उमर बेग़ कहते हैं कि मगर यह जुड़ाव महज़ खाने-पीने के सामानों तक महदूद नहीं है. उन्होंने बताया, 'पिछले दिनों हमारे घर की खिड़कियों में शीशे लगाए जाने थे. हमने शीशे उधार में लिए. दुकानदार जानते थे कि जैसे ही हालात सामान्य होंगे, उन्हें उनके रुपए वापस मिल जाएंगे.' 

बेग़ ने कहा कि शहरी इलाक़े जैसा ही तालमेल गांवों में भी है. बार्टर सिस्टम यहां की अर्थव्यवस्था की अहम कड़ी है. कोई सब्ज़ी की बजाय सेब थमा देता है तो कोई खुबानी देकर अखरोट ले लेता है. 

First published: 21 November 2016, 7:28 IST
 
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