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मानवता के ख़िलाफ़ है जम्मू-कश्मीर से रोहिंग्या मुसलमानों को निकालना

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 April 2017, 9:51 IST


म्यांमार से दर-बदर हुए रोहिंग्या मुसलमानों ने पिछले कुछ दशकों में विश्व के कई हिस्सों में शरण ली है. उनमें जम्मू-कश्मीर भी है. काफी मेहमाननवाजी हो चुकी उनकी, बस अब और नहीं. कुछ ऐसी ही सोच बन गई है राज्य की. केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि ने जम्मू प्रशासन से कहा कि वह अपने राज्य में गैरकानूनी बसे रोहिंग्या मुसलमानों की तुरंत शिनाख़्त करना शुरू करे.

 

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इनकी मौजूदगी से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. ज़ाहिर है, जो समुदाय पहले से सताया हुआ है, उसे जम्मू से निकाला जाएगा, तो क्या होगा. उनकी और बरबादी होगी. इस निष्कासन का मजबूती से विरोध किया जाना चाहिए.

 

 

म्यांमार से भागना


रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के रखीना इलाके से हैं. रखीना देश के पश्चिमी तट पर है. पर वे वहां के नागरिक नहीं माने जाते क्योंकि म्यांमार उन्हें अधिकारिक एथनिक समूह नहीं मानता. सरकार का दावा है कि ये बांग्लादेश से आए ‘बंगाली’ शरणार्थी हैं. पर बांग्लादेश उन्हें बंगाली नहीं मानते, इसलिए इस समुदाय को दोनों देशों में विरोध झेलना पड़ रहा है. म्यांमार की सभी सरकारों ने रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता और मानव अधिकारों से बाकायदा मना किया है. म्यांमार की सेना, देश की सीमा पुलिस और कुछ बौद्ध चरमपंथी गुटों ने उन पर अनगिनत अत्याचार किए हैं.



2012 में उन पर जबर्दस्त हिंसा हुई और नतीजतन 1 लाख रोहिंग्या को म्यांमार से भागना पड़ा. उन्होंने बांग्लादेश, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और भारत जैसे पड़ोसी देशों में शरण लेनी पड़ी. अक्टूबर 2016 में फिर हिंसा हुई और 66 हजार रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश भागे, जबकि कुछ को म्यांमार में आईडीपी कैंप्स में रहने को मजबूर किया गया. सेना ने उस साल उन पर खूब अत्याचार किए. इनमें आगजनी, पूरे परिवार की हत्या, गैंग रेप, उन 50 महिलाओं का रेप, जिनसे बात की गई, अवयस्कों और 8 महीने तक के शिशुओं की हत्या शामिल है.

 

जम्मू में रोहिंग्या


यूएनएचसीआर के आंकड़ों (अक्टूबर 2016) के अनुसार उनके यहां म्यांमार के 19 हजार शरणार्थी रजिस्टर्ड हैं. उनमें 10 हजार रोहिंग्या समुदाय से हैं, जिन्हें किसी देश का नागरिक नहीं माना गया है. वे 2012 से जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे भारत के विभिन्न भागों में रह रहे हैं.

 

दिसंबर 2016 से जम्मू और कश्मीर नेशनल पेंथर पार्टी (जेकेएनपीपी) और भाजपा रोहिंग्या मुसलमानों को राज्य से निकालने के लिए आंदोलनरत हैं. जम्मू शहर और उसके आसपास होर्डिंग्स लगाए गए हैं. इनमें रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को इलाका छोड़ने के लिए कहा गया है. ऐसा लगता है, जेकेएनपीपी और भाजपा रोहिंग्या को बांग्लादेशी मुसलमान मानती हैं.


इन होर्डिंग्स पर जेकेएनपीपी नेताओं की तस्वीरें हैं, जो स्थानीय लोगों को ‘जागने’ को प्रेरित कर रही हैं. उन्होंने रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को ‘जम्मू छोड़ो’ के नोटिस जारी किए हैं. उन्होंने स्थानीय लोगों को ‘इतिहास, संस्कृति और डोगरा की पहचान बचाने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया है.’


जेकेएनपीपी और भाजपा नेताओं का आरोप है कि रोहिंग्या के आतंकियों से संबंध हैं, जबकि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे. जम्मू-कश्मीर के गृहमंत्री के बयान के बावजूद कि रोहिंग्या आतंकियों में शामिल नहीं थे, उन पर जम्मू में बाकायदा मुहिम चलाई गई. रोहिंग्या को अपराधी, कानून तोड़ने वाले और गैरकानूनी प्रवास करने वाले बताकर बदनाम किया जा रहा है.

 


दिहाड़ी मजदूरी, फैक्टरी, सेनिटेशन और मॉल, होटलों और दुकानों में साफ-सफाई का काम करके बहुत ही कम कमाने वाले रोहिंग्या समुदाय को अपने अवैध निवास से बराबर खदेड़ा जा रहा है. स्थानीय पुलिस ने कुछ रोहिंग्या को बिना किसी सुनवाई और सही प्रक्रिया के पब्लिक सेफ्टी एक्ट के अधीन कैद किया है. यह कार्रवाई उचित नहीं है. इससे रोहिंग्या में डर का माहौल बना हुआ है.

 

भाजपा, ‘अधिकारों का रक्षक’


2014 में राज्य चुनाव के दौरान भाजपा ने खुद को बड़े जोश से जम्मूवासियों के अधिकारों का ‘रक्षक’ बताया था. इनमें ज्यादातर हिंदू हैं. भाजपा के नेताओं का दावा है कि रोहिंग्या मुसलमानों को नेशनल कांफ्रेस और कांग्रेस दोनों पार्टियां जम्मू की जनसांख्यिकी बिगाडऩे के लिए जम्मू लाई थीं. केद्र की भाजपा सरकार पर पार्टी वालों का दबाव है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को जम्मू से निकाले.


खबरों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चेतावनी दी. मार्च के पहले हफ्ते में केंद्रीय गृहमंत्री ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का जायजा लिया. इसमें उनका साथ नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोवाल, केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि, इंटलिजेंस ब्यूरो निदेशक, सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़ और इंटलिजेंस एजेंसीज के शीर्ष अधिकारियों ने दिया.

 

ये इस नतीजे पर पहुंचे: ‘बहुत ही खास इंटेलिजेंस इनपुट्स थे कि जम्मू के बाहरी इलाके में बसे रेहिंग्या और बर्मीज सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं क्योंकि राष्ट्र-विरोधी तत्व उनका गलत इस्तेमाल करते हैं.’ हाल ही में ‘गैरकानूनी रूप से बसे रोहिंग्या को चिह्नित करने का आदेश’ उक्त जांच के बाद ही दिया लगता है.

 

भारत और शरणार्थी कन्वेंशन


भारत ने 1951 के यूएन रेफ्यूजी कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किए थे. भारत उन्हें शरणार्थी का दर्जा नहीं देता पर यूएनएचसीआर स्थित भारत के ऑफिस को शरण के इच्छुक लोगों के आवेदन लेने की अनुमति देता है. रेफ्यूजी स्टेटस डिटर्मिनेशन (आरएसडी) की काफी विस्तृत और पूरी प्रक्रिया के बाद लोगों को शरणार्थी का दर्जा दिया जाता है. जम्मू सहित देश के कई हिस्सों में रहने वाले ज्यादातर रोहिंग्या को यूएनएचसीआर ने शरणार्थी का दर्जा दिया है. यूएनएचसीआर द्वारा जारी दस्तावेजों को भारत सरकार मानती है, उनका सम्मान करती है. ये दस्तावेज भारत में उनके रहने का आधार हैं.


भारत में यूएनएचसीआर की भूमिका को भी न्यायालयों ने सीमित मान्यता दी है. न्यायालयों ने निष्कासन की प्रक्रिया रोक दी है और शरणार्थियों को जेल से रिहा करने के आदेश दिए हैं ताकि वे शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए यूएनएचसीआर से संपर्क कर सकें या उनका पुनर्वास हो सके.


राज्य से रोहिंग्या के निष्कासन की भाजपा की मांग की प्रतिक्रिया में जम्मू-कश्मीर गृहमंत्री ने पहले खुलासा किया था, ‘चूंकि अच्छी खासी संख्या में इन विदेशियों के पास टीआर एफ आरओ आईटीबीएफ /आरपीओ, नई दिल्ली से पंजीयन प्रमाण पत्र/ पहचान पत्र अथवा यूएनएचसीआर कार्ड्स हैं, निष्कासन-प्रक्रिया की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उचित नहीं होगी.’

 

अदालत और शरणार्थी


1995 में भी कुछ ऐसे ही हालात हो गए थे. ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन ने अरुणाचल प्रदेश में बसे चकमा शरणार्थियों को निकलने का नोटिस दिया था. सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को ‘राज्य में हर चकमा का जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित’ करने के निर्देश दिए थे और कहा था कि राज्य से जबरन बाहर निकालने की ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट्स यूनियन जैसे संगठनों की कोशिश का विरोध किया जाएगा.



भारतीय न्यायालयों ने बारबार आदेश दिया है कि जिन शरणार्थियों का जीवन उनके अपने देश में खतरे में है, उनकी रक्षा की जाए. उन्हें यूएनएचसीआर ऑफिस में शरणार्थी दर्जा लेने की अनुमति दी गई. न्यायालयों का यह भी कहना था कि धारा 21 गैर-नागरिक को जीने के अधिकर की गारंटी देती है. इंटरनेशनल कोवनेन्ट्स और ट्रीटिज में लिखे अधिकारों पर भारत ने दस्तखत किए थे और मंजूरी दी थी. उसे लागू किया जा सकता है.


कई कानून विशेषज्ञों ने दावा किया कि धारा 21 में अवापसी नियम शामिल है. भारतीय संविधान की धारा 51(सी) और 253 के तहत अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि की जवाबदेही का सम्मान किया जाना चाहिए, जब तक कि उनका स्थानीय कानून से कोई विरोध नहीं हो.

First published: 6 April 2017, 9:51 IST
 
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