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हुर्रियत में मतभेद गहराया, महासचिव शब्बीर शाह का इस्तीफा

रेयाज़ उर रहमान | Updated on: 25 March 2017, 9:20 IST


अलगाववादी और आजादी समर्थक हुर्रियत नेता शब्बीर शाह ने सईद अली शाह गिलानी की अगुवाई वाले कट्टरवादी धड़े वाले संगठन के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया है. वह ऑल इंडिया हुर्रियत कांफ्रेंस के महासचिव थे. सूत्रों की मानें तो उनके धड़े से मतभेद चल रहे थे जिसका असर अन्य बड़े गुटों पर पड़ रहा था. इसका पहला संकेत तो तभी मिल गया था जब पिछले साल हुर्रियत कांफ्रेंस उदारवादी गुट के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुक व जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के चेयरमैन यासीन मलिक ने सईद अली शाह गिलानी के निवास पर हाथ मिलाया था.


अपने इस्तीफे में उन्होंने धड़े के कामकाज पर नाराजगी जताई है और यह भी लिखा है कि लगातार जेल जाने करने के कारण वह महासचिव जैसी जिम्मेदारी वाले अपने पद के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे थे. गौरतलब है कि अलगाववादी संगठन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष शब्बीर शाह वर्ष 2015 में सईद अली शाह की अगुवाई में ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस में शामिल हुए थे. संगठन में शामिल होने के कुछ समय बाद ही उनके मतभेद शुरू हो गए थे.

माना जा रहा है कि यदि गिलानी ने उनकी चिन्ताओं को गंभीरता से नहीं लिया तो महासचिव पद से इस्तीफा इस दिशा में
पहला कदम है. यह भी कहा जाता है कि संगठन के फैसलों में शाह से कोई विचार-विमर्श नहीं किया जाता था. उनसे न तो कई सुझाव मांगा जाता था और न ही कोई प्रतिक्रिया.


हाल ही में गिलानी के नाती अनीस-उल-इस्लाम को राज्य पर्यटन विभाग में एक लाख रुपए के मासिक वेतन पर नियमों की कथित अनदेखी कर रिसर्च अधिकारी नियुक्त करने पर भी सवाल उठे थे. यह नियुक्ति पिछले साल नवम्बर में की गई थी. मीडिया के एक वर्ग द्वारा इस मुद्दे को तूल दिए जाने के बावजूद हुर्रियत ने इस पर चुप्पी साधे रखी थी.

बढ़ती नाखुशी


हालांकि अलगावादी धड़े से जुड़े सूत्रों का कहना है कि शाह के इस्तीफे की वजह गिलानी के संगठन के साथ मतभेदों का होना है. हुर्रियत के एक नेता का कहना है कि यह असहमति ज्यादा मुद्दों पर थीं. जरूरी नहीं कि यह अकेले गिलानी के धड़े तक ही सीमित हो. मुख्यत: अलगाववादी गुट के भीतर फैसले लेने की शक्तियां कुछ ही लोगों के हाथ में सिमट कर रह गईं थी. अन्य लोगों को दरकिनार कर दिया गया था.


शाह 1980 के दशक के उन चुनिन्दा नेताओं में से एक हैं जब राज्य में आजादी का कोई सशस्त्र आन्दोलन नहीं था. उस समय मीरवाइज और मलिक बच्चे थे और गिलानी राज्य विधान सभा में जमायते-इस्लामी के विधायक चुने गए थे. लेकिन गिलानी की तुलना में घाटी की अलगवावादी राजनीति में उनका कद छोटा होता गया. गिलानी, मीरवाइज और मलिक की तिकड़ी एकजुट हो गई. अपने ही हुर्रियत धड़े में शाह कुछ करने की स्थिति में नहीं थे. सूत्रों के अनुसार कई बार शिकायत करने के बाद भी उन्हें धड़े के निर्णय लेने वाले बोर्ड में शामिल नहीं किया गया.

 

अलग हालात नहीं


मीरवाइज गुट में भी इससे कोई अलग हालत नहीं हैं. पिछले साल की अशांति के दौरान गिलानी, मीरवाइज और मलिक द्वारा आपस में हाथ मिला लिए जाने के बाद से धड़े के बड़े नेता जैसे कि प्रो. अब्दुल गनी बट और बिलाल गनी लोन जैसे लोग भी ज्यादा या कम पीछे हट गए थे. तीनों ही अपनी रणनीति के चलते छह माह तक चले लगातार बंद के साप्ताहिक प्रदर्शन का कार्यक्रम जारी करते थे. यह तो बाद में बट ने बंद कराया.


अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड मी' के पहले वॉल्यूम को जारी किए जाने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बट ने अप्रत्यक्ष रूप से लेकिन साफगोई के साथ अपने अलगावावादी सहयोगियों पर निशाना साधा जो राज्य में अशांति को बढ़ावा दे रहे थे. उन्होंने कहा कि हमारे नेता लगड़े घोड़े पर अंधे घुड़सवार की तरह से हैं. उनके इस कथन को गिलानी के संदर्भ में देखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि हमारी रणनीति नदी में छलांग जैसी है, लेकिन ऐसा करने के पहले हमने यह सोचा तक नहीं कि हमें तैरना आता भी है या नहीं.


बट और लोन दोनों को ही हुर्रियत की रणनीति में निर्णय लेने वाले लोगों में शामिल नहीं किया गया है. उन्हें एकतरफ कर दिया गया है और वे ज्यादा या कम मूकदर्शक की तरह होकर रह गए हैं. गिलानी, मीरवाइज और मलिक केन्द्रीय स्तर पर कोई भी फैसले ले लेते हैं.

 

अब क्या करेंगे शाह?


शाह एकतरह से राज्य की नई हुर्रियत के कार्यकलापों से मूकदर्शक होकर रह गए हैं. उन्होंने हाल ही में गिलानी के आवास पर हुई उस बैठक में भाग नहीं लिया था जिसमें उक्त तीनों के गुट ने श्रीनगर और अनन्तनाग में लोकसभा के उप चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की थी.

दिलचस्प तो यह है कि शाह अन्य वरिष्ठ नेताओं जैसे कि नईम खान के साथ वर्ष 2014 में मीरवाइज के साथ थे. मीरवाइज के साथ शब्बीर शाह को भी नजरबंद कर दिया गया था. विडम्बना तो यह है कि उस समय इस गुट में बट और लोन भी शामिल थे.


कुछ समय के लिए शाह और खान ने अपना अलग हुर्रियत धड़ा बना लिया था. इस धड़े को उन्होंने वास्तविक हुर्रियत बताया था. जल्द ही उन्होंने इस धड़े का विलय गिलानी के धड़े में कर दिया. लेकिन अब शाह ने अपने इस्तीफे में जो खुलासे किए हैं, उससे लगता है कि उनके गिलानी के साथ सम्बंध अब खत्म हो गए हैं.

ठीक इसी समय शाह के पास गिलानी की हुर्रियत के बाहर विकल्प कम ही हैं. वह पहले ही मीरवाइज धड़े को छोड़ चुके हैं. वह मलिक के जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट में शामिल नहीं हो सकते. दोनों में थोड़े आदर्शात्मक मतभेद हैं. मलिक की तरह से शाह उतने कट्टर आजादी समर्थक नहीं हैं. उन्हें एक बार फिर से अपना नया धड़ा खड़ा करना होगा अथवा अपने संगठन डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के नेता के रूप में कवायद करनी होगी. लेकिन इससे केवल उनका कद ही घटेगा क्योंकि वह अलगाववादी नेताओं के साथ खड़े रहे हैं.


अब वह केवल यही उम्मीद कर सकते हैं कि यदि अन्य धड़े के कुछ वरिष्ठ नेता उनके साथ मिल जाएं और साथ आ जाएं तो वे हावी होते तीनों नेताओं के साथ बराबरी कर सकते हैं.

First published: 25 March 2017, 9:20 IST
 
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