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फारूख़ अब्दुल्लाह की जज़्बाती तक़रीर, मकसद सिर्फ वोट बटोरना

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 December 2016, 7:49 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • घाटी में \'नई दिल्ली\' की समर्थक मानी जाने वाली पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के पितामह फारुख़ अब्दुल्लाह राजनीति में दोबारा आने के लिए सक्रिय हो गए हैं. 
  • उन्होंने शेख़ अब्दुल्लाह की 111वीं पुण्यतिथि पर ना सिर्फ़ \'नई दिल्ली\' को ललकारा बल्कि हुर्रियत का खुलकर समर्थन किया.

घाटी में चल रही अशांति के बीच फारुक़ अब्दुल्ला हाल ही में घाटी की राजनीति में फिर से नज़र आए. जैसा कि उनके बारे में मशहूर है, इस बार भी शोर मचाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. अगर वे ऐसा नहीं करते तो नेशनल कांफ्रेंस फिर से घाटी की राजनीति में दिखाई ही नहीं देती. 

उनके साथ जनता भले ही दिखाई नहीं दी लेकिन वो अपने बयानों से राजनीति गर्म करने में कामयाब रहे. मीडिया ने उनके विवादास्पद बयानों को हाथों-हाथ लिया. इनमें से एक बयान वह है, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को ललकारते हुए कहा, ‘पीओके किसी के बाप की जागीर नहीं है.’

सोमवार को अपने पिता शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला की 111वीं पुण्य तिथि पर फारुक़ ने हुर्रियत से साफ-साफ कहा कि वह उनके संघर्ष में उनके साथ हैं. उन्होंने कहा, ‘मैंने हुर्रियत नेताओं को कहा है कि वे एकजुट हों. हम इस वक्त उनके साथ हैं. हमें अपना दुश्मन मत समझो. हम आपके दुश्मन नहीं हैं.'

अपने पिता की मज़ार के पास जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'आगे बढ़ो, हम आपके साथ हैं, जब तक आप सही राह पर चल रहे हैं और देश को सही राह दिखा रहे हैं.' उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे कश्मीर में हुर्रियत के आंदोलन का समर्थन करें. 

अब्दुल्ला ने कहा, 'मैंने नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे इस अलगाववादी आंदोलन में हुर्रियत का साथ दें. इससे दूर न रहें. मैं आपको बता रहा हूं, हम इस आंदोलन का हिस्सा हैं. रूंधे गले से उन्होंने कहा, ‘हम हमेशा ही कश्मीर के लिए लड़े हैं, जेल भी गए हैं.'

दिल्ली पर निशाना

एक बार फिर उन्होंने नई दिल्ली को कहा, 'क्रूरता से आप कश्मीर में संघर्ष का दमन नहीं कर सकते. वे (नई दिल्ली) आपको दबा नहीं सकते. कश्मीर में जो अलख जगी है, वह बुझ नहीं सकती, जब तक भारत और पाकिस्तान हमारे साथ इंसाफ़ नहीं कर देते.' उन्होंने आगे कहा, उन्हें जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लोगों के साथ न्याय करना होगा. जब तक ऐसा नहीं हो जाता, यह आग नहीं बुझेगी. वे जितना इसे शांत करने की कोशिश करेंगे, यह उतनी ही बढ़ेगी.

घाटी में लोग अब्दुल्ला की राजनीति से भली-भांति वाकिफ हैं. इसलिए वे अब उनकी बातों में नहीं आते. 

एक स्थानीय लेखक नसीर अहमद के मुताबिक, सदियों से चली आ रही परम्परा के चलते कश्मीरी राजनेता हमेशा से ऐसे ही है वे श्रीनगर में अलगाववादी, जम्मू में धर्मनिरपेक्ष और नई दिल्ली में देशभक्त बन जाते हैं. हालांकि इससे उन्हें कोई राजनीतिक फायदा होने वाला नहीं है. फिर भी वे जैसे हैं, वैसे ही हैं.

फ़ायदा उठाने की कोशिश

अब्दुल्ला का यूं सक्रिय राजनीति में लौटना काफी सोच समझ कर उठाया गया कदम है. वे सत्ताधारी पीडीपी का जनमानस में खोया विश्वास देखते हुए उस खाली जगह में खुद को फिट करना चाह रहे हैं. घाटी में मौजूदा संकट के दौरान हुई मौतों के लिए जनता कहीं न कहीं पीडीपी को कसूरवार मानती है और उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इसी बीच मौके का फायदा उठाने के लिए अब्दुल्लाह भी मैदान में कूद पड़े. 

पीडीपी को अलग-थलग कर नई दिल्ली को ललकारने की आड़ में उन्होंने हुर्रियत को यह भी जता दिया कि नेशनल कांफ्रेंस उसके साथ है. ऐसा केवल फारुक़ ही कर सकते थे क्योंकि कश्मीरी बोली में जो महारत उन्हें हासिल है, उनके बेटे उमर को नहीं है. फारुक़ अब्दुल्लाह के मुक़ाबले उमर उस कला में भी कमतर हैं कि जनता के साथ कैसे खुद को जोड़ना है. 

उपचुनाव पर नज़र

अब्दुल्लाह के राजनीति में वापसी की एक और वजह अनंतनाग और श्रीनगर की दो सीटों पर होने वाले लोकसभा उपचुनाव हैं. दोनों सीटें पीडीपी की वजह से खाली हुई हैं. पहली तो मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती की सीट थी और दूसरी यानी श्रीनगर लोकसभा सीट पीडीपी के ही तारिक हमीद कर्रा की. तारीक़ ने घाटी में फैले तनाव के बीच सरकार की ढिलाई के विरोध में इस्तीफा दे दिया था. घाटी में यह तनाव उग्रवादी बुरहान वानी की मौत के बाद से ही पसरा हुआ है. 

लड़ सकते हैं चुनाव

अब्दुल्ला श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार हो सकते हैं. इस प्रतिष्ठित सीट पर ही पिछले चुनाव में कर्रा ने अब्दुल्लाह को बुरी तरह से हराया था. उसके बाद से ही अब्दुल्लाह कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य से गायब थे. बीच में वे किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लंदन भी चले गए थे. अब वे फिर से अपना वजूद हासिल करने के लिए चुनाव मैदान में उतरने की कोशिश में हैं. इसके लिए वे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. यहां तक कि अपनी पार्टी के केंद्र समर्थक होने की छवि से छुटकारा पाने के लिए वे अलगाववादियों के साथ खड़े होने को भी तैयार हो गए.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्यालय नवा-ए-सुबह पर हाल ही एक बैठक आयोजित कर उन्होंने कहा था कि आगामी चुनाव में वे आखिरी बार मैदान में उतरेंगे. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, ये उनके लिए आखिरी चुनाव होंगे, जब आप अप्रैल में वोट दें तो इस बात का खयाल रखें. हालांकि पिछली बार की बजाय इस बार सारी स्थितियां अब्दुल्ला के पक्ष में हैं. कश्मीर को बांटने का उनका राग भले ही इतना काम न आए लेकिन हाल ही में पीडीपी की साख को जो बट्टा लगा है, निश्चित तौर पर अब्दुल्ला को उसका फायदा होगा.

First published: 8 December 2016, 7:49 IST
 
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