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महाराजा हरि सिंह: तानाशाह या लोकप्रिय राजा के विवाद में फंसी सरकारी छुट्टी?

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 31 January 2017, 8:12 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

आखिरी डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह के प्रपौत्र अजातशत्रु ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एक निजी प्रस्ताव रखा था कि उनके दादा के जन्मदिन 23 सितंबर पर सरकारी छुट्टी की घोषणा की जाए. विरोध के बावजूद, विपक्ष की गैरमौजूदगी में 25 जनवरी को प्रस्ताव पारित कर दिया गया. इससे राज्य की स्थापना जिस मकसद से हुई थी, उस पर सवाल किए जा रहे हैं. कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां भी इस कदम के लिए जम्मू की पार्टियों का विरोध कर रही हैं.

हरि सिंह एक विवादास्पद राजनीतिक शख्सियत हैं. राज्य के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय उन्हें अलग-अलग राजनीतिक चश्मे से देखते हैं. बहुसंख्यक समुदाय के लिए, खासकर घाटी के लोगों के लिए, वे तानाशाह थे. उनके पूर्वजों ने कश्मीर को अंग्रेजों से खरीदा था. 16 मार्च 1946 के अमृतसर समझौते के अनुसार अंग्रेजों ने, ‘समूचा पहाड़ी या पर्वतीय देश, पूर्व में सिंधु और पश्चिम में रावी नदी सहित उसकी संभावित परिसंपत्ति’ गुलाब सिंह को 75 लाख नानक शाही रुपयों और अन्य वार्षिक भेंट में बेची थी.

हरि सिंह चौथे और अंतिम डोगरा महाराजा थे, जिन्होंने 1925 से 1952 तक शासन किया. 1947 में भारत की आजादी के साथ ही उन्हें लोकतंत्र के पक्ष में राजशाही छोड़ने को कहा गया. इसके लिए शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में दो दशक लंबा संघर्ष चला था. 1948 में अब्दुल्ला स्वायत्त जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री बने. उन्हें ऐसा हीरो माना गया, जिन्होंने राज्य को तानाशाह से मुक्ति दिलाई. वे जितना घाटी के बहुसंख्यक समुदाय के अधिकारों की वकालत करने के लिए उनकी यादों में बसे हुए हैं, उतना ही कश्मीर में भी. 

इसलिए जब हरिसिंह के बेटे कर्ण सिंह सदर-ए-रियासत के तौर पर उनके उत्तराधिकारी बने, नए लोकतांत्रिक कश्मीर ने डोगरा के तानाशाह राज की मुखालिफत की. यह अब ‘नया कश्मीर’ था, शेख ने अपने राजनीतिक घोषणा-पत्र में उसे ऐसा ही परिभाषित किया था. घोषणा-पत्र में उन्होंने कश्मीर के निरंकुश शासन से संवैधानिक लोकतंत्र में तब्दील होने और उसके आर्थिक विकास की विस्तृत योजना की रूपरेखा दी थी.

दक्षिणपंथ का उभार

कश्मीर में डोगरा शासन की तुलना, भारत के बाकी जगहों के अंग्रेज शासन से की जा सकती है. पर जम्मू में नहीं. इसके कुछ हिस्से, 1947 के बाद की व्यवस्था में, राजतंत्र की समाप्ति को कश्मीर में राजनीतिक शक्ति का हृास मानते हैं. राजनीतिक रूप से प्रभावहीन होने के इस एहसास ने राज्य में प्रजा परिषद जैसे दक्षिणपंथी धार्मिक संगठनों को जन्म दिया.

परिषद ने 1949 में कश्मीर के वर्चस्व के विरोध का नेतृत्व किया. उसने कश्मीर के लिए पृथक संविधान, राष्ट्रीय झंडा और 370 धारा का विरोध किया, जो कश्मीर को विशेष दर्जा देती है और राज्य के बाहरी लोगों को भूमि के स्वामित्व से इनकार करती है. 

भाजपा के प्रारंभिक स्वरूपों में से एक परिषद, शेख अब्दुल्ला की राष्ट्रीय कांफ्रेंस के भी सख्त खिलाफ थी. उनका आरोप था कि यह केवल कश्मीर के मुसलमानों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है. शेख पर आरोप था कि वे कश्मीर केंद्रित नीतियों से राज्य का मुसलमानीकरण कर रहे हैं. दरअसल जब 50 के दशक में नेशनल कांफ्रेंस का झंडा एक स्थानीय कॉलेज में फहराया गया तब प्रजा परिषद ने काफी बवाल मचाया था. 

इस तरह हरि सिंह की जयंती पर छुट्टी की घोषणा एक तानाशाह की उनके खुद के राज्य में अच्छे ऐतिहासिक शख्स के तौर पर पुन:प्रतिष्ठा ही नहीं है, बल्कि एक समानान्तर ऐतिहासिक कथा को मुख्यधारा में लाना भी है. यह राज्य के शासन में समान साझेदारी के आग्रह का भी प्रतीक है. अब जम्मू और कश्मीर दोनों, शेख और हरि सिंह की जयंती पर छुट्टी रखना चाहेंगे. इस तरह सरकार की नजरों में वे एक ऐतिहासिक हीरो और खलनायक को समान दर्जा दे रहे हैं.

प्रपौत्रों ने रखा था प्रस्ताव

छुट्टी का प्रस्ताव भाजपा सदस्य अजातशत्रु ने रखा था और समर्थन पीडीपी एमएलसी विक्रमादित्य ने किया था. दोनों हरिसिंह के प्रपौत्र और कांग्रेस नेता कर्ण सिंह के बेटे हैं.

हालांकि पीडीपी नेता और शिक्षा मंत्री नईम अख्तर ने अजातशत्रु से प्रस्ताव वापस लेने का आग्रह किया था. प्रस्ताव पर विचार करने के आश्वासन के बावजूद वे नहीं माने. बाद में जुबानी मतों से उसे पारित कर दिया गया. इस दौरान विपक्ष कांग्रेस और इसकी खिलाफत कर रही राष्ट्रीय कांफ्रेंस दोनों मौजूद नहीं थे. 

शुक्रवार को जब विधानसभा का सत्र शुरू हुआ, नेशनल कांफ्रेंस के सदस्यों ने सरकार पर उनकी गैरमौजूदगी में छुट्टी की घोषणा का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया. वे उसके विरोध में विधान परिषद से बाहर निकल गए. नेशनल कांफ्रेंस ने प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की, यह कहते हुए कि यह ‘गैरलोकतांत्रिक है और कानून का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया था.’

स्वतंत्र विधायक इंजीनियर रशीद ने भी छुट्टी पर हंगामा किया. ‘हम शेख साहब (शेख मोहम्मद अबदुल्ला) और महाराजा (हरि सिंह) की तारीफ एक ही समय कैसे कर सकते हैं?’, रशीद ने विधानसभा में व्यंग्यात्मक टिप्पणी की. उन्होंने भाजपा से पूछा कि क्या वे हरि सिंह के शासन के खिलाफ संघर्ष में मरे कश्मीरियों को श्रद्धांजलि देते हुए 13 जुलाई को शहीद दिवस मना सकते हैं. 

सत्तासीन पीडीपी ने राज्य में मौजूद छुट्टियों की लंबी सूची के साथ एक अनावश्यक छुट्टी जोडऩे के विरोध में इस छुट्टी को कम महत्व दिया था. पर कुछ नेताओं ने इस मुद्दे पर चुतराई से राजनीतिक जाल बुनने की कोशिश की. पीडीपी एमएलसी फिरदौस टाक ने कहा, ‘महाराजा हरि सिंह एक अहम ऐतिहासिक शख्सियत हैं. उन्होंने धारा 370 से हमें पहचान दी है.’

शायद यह सही भी है. ये हरि सिंह ही थे, जिन्होंने 1947 में पाकिस्तानी सेना और छापेमारों द्वारा राज्य पर हमला करने के बाद भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. विलय तीन विषयों तक सीमित था सुरक्षा, विदेशी मामले और संचार. बाद में विलय की शर्तें भारतीय संविधान की धारा 370 में जोड़ दी गईं.

First published: 31 January 2017, 8:12 IST
 
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