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हुर्रियत और सिविल सोसाइटी की बैठक बेनतीजा, लोगों के दबाव में बंद जारी

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 November 2016, 8:31 IST

जिस समय सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक और यासीन मलिक कश्मीर के विभिन्न सिविल सोसाइटी समूह के साथ गिलानी के श्रीनगर के हैदरपोरा स्थित आवास पर बैठक कर रहे थे, उस समय बड़ी संख्या में लोग उनके घर के बाहर आजादी समर्थक नारे लगा रहे थे. इन नारों में 124 दिनों जारी बंद को आगे भी जारी रखने सम्बंधी नारे लग रहे थे.

घाटी में 124 दिनों से बंद चल रहा है. अलगाववादी हर्रियत गुटों और सिविल समूह  के साथ यह बैठक दिन भर चली. बैठक के बाद घाटी में बंद जारी रखने का फैसला किया गया. इसके साथ ही बंद समर्थकों की ओर से हुर्रियत नेतृत्व को भविष्य के आंदोलन की रणनीति तय करने का अधिकार भी दिया गया.

यासीन मलिक को बैठक के बीच में ही बाहर आकर लोगों को आश्वासन देना पड़ा कि वे बंद की रणनीति से पीछे नहीं हटेंगे

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुराहन वानी की मौत के बाद से शुरू हुए इस बंद के प्रदर्शन रोस्टर में किसी भी तरह का बदलाव किए जाने के खिलाफ चेतावनी भी दी गई थी. दरअसल, बैठक के दौरान यह अफवाह फैल गई थी कि मलिक और मीरवाइज–प्रतिरोध की रणनीति पर फिर से विचार कर रहे हैं और बंद वापस लिया जा सकता है. इसी नाराजगी में लोग नारे लगा रहे थे.

'भारत का जो यार है, गद्दार है, गद्दार है' इस तरह के नारे लोगों ने गिलानी के घर के सामने लगाए. इनमें से ज्यादातर नेताओं को हाल ही में पुलिस ने हिरासत से रिहा किया है. रिहाई के ठीक बाद बुलाई गई बैठक से लोगों को लगा कि नेता अपनी रणनीति में बदलाव करने जा रहे हैं. इससे उनकी नाराजगी उग्र नारेबाजी में बदल गई.

लोगों का दबाव इतना था कि यासीन मलिक को बैठक के बीच में ही बाहर आकर लोगों को यह आश्वासन देना पड़ा कि वे पिछली रणनीति से पीछे नहीं हट रहे हैं. उन्होंने लोगों को यह कहकर भी आश्वस्त किया कि किसी भी सिविल सोसाइटी अथवा एक्टिविस्ट ने हड़ताल (प्रदर्शन) खत्म करने का प्‌रस्ताव नहीं दिया है.

सिविल सोसाइटी के सदस्यों से बैठक के बाद हुर्रियत ने जो बयान जारी किया उसमें खास कुछ भी नहीं है, बैठक का सारांश यह है कि सभी पक्षों ने उनकी ओर से निर्णय लेने के लिए 'संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व' को अधिकृत किया है.

प्रतिरोध और लड़ाई

बयान में कहा गया है कि सभी पक्षों ने एकसुर से प्रतिरोध नेतृत्व की तारीफ की है और अपना पूरा जनादेश और समर्थन देते हुए संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व को अधिकृत किया है कि वे जोश और धैर्य के साथ आजादी का संघर्ष जारी रखें. बयान में यह भी कहा गया है कि लोगों को अक्षरशः हुर्रियत के कार्यक्रमों का पालन करना चाहिए.

बयान में यह भी कहा गया है कि बैठक में भाग लेने वालों ने आम लोगों विशेषकर पक्षकारों से यह चिन्ता जताई है कि वे किसी भी बहकावे में न आएं. उन्हें विभिन्न तरीकों से बहकाया जा रहा है. बयान में कहा गया है कि आर्थिक नुकसान, शिक्षण संस्थानों का बंद रहना (हाल ही में कई स्कूलों को आग के हवाले भी किया गया है) और सामूहिक हिरासत असल में उनके आजादी आन्दोलन का हिस्सा हैं. हमें सामूहिक रूप से दृढ़ता, इच्छाशक्ति और धैर्य के साथ इससे निपटना चाहिए.

बयान में यह भी कहा गया है कि बैठक में एकमत से निश्चय किया गया कि सामूहिक प्रतिरोध नेतृत्व के कार्यक्रमों का अक्षरशः पालन किया जाना चाहिए. जो कोई इसका उल्लंघन करे, उसे समझाया जाना चाहिए और उसे हमारे आजादी की लड़ाई, जिसे हमारे शहीदों ने अपने खून से पोषित किया है, के बारे में तसल्ली से बताना चाहिए.

बड़ी संख्या में सदस्यों ने भाग लिया

बैठक दिनभर चली. विभिन्न सिविल सोसाइटी समूहों के नेताओं के धाराप्रवाह भाषण हुए. हरेक समूह ने अपने कई सदस्यों को बैठक में भाग लेने के लिए भेजा था. एक अनुमान के अनुसार बैठक में भाग लेने वालों की संख्या दो सौ से ज्यादा थी.

बैठक में कई ख्यातिलब्ध लोगों ने भाग लिया. इनमें घाटी के अग्रणी व्यवसायियों में से एक मुस्ताक छाया भी थे. उन्होंने अपनी बात को अच्छी तरह से रखा और बैठक आगे भी जारी रही. ऐसा ही प्रख्यात बरेलवी विद्वान गुलाम रसूल हामी ने भी किया.

बैठक में सबसे पहले बोलने वालों में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के मियां अब्दुल कयूम थे. सूत्रों के अनुसार उन्होंने आत्मसमर्पण के खिलाफ चेतावनी दी. उन्होंने अपने तर्कों के पक्ष में कुरान की आयातों का भी हवाला दिया. बैठक में भाग लेने वाले एक एक्टिविस्ट ने बताया कि उनके भाषण ने ऐसी दिशा तय कर दी थी कि बाद के वक्ताओं को उनकी कट्टरवादी लाइन से भटकने में कठिनाई आ रही थी.

सिविल सोसाइटी के एक एक्टिविस्ट, जिन्होंने बैठक में भाषण दिया, ने बाद में हमें बताया, 'कोई भी उनकी कट्टरवादी लाइन से अलग बोलना ही नहीं चाहता था. उन्होंने बताया कि मैं नहीं चाहता कि हड़ताल जारी रहे. हड़ताल से केवल लोगों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ता है, लेकिन मैंने अपने संदेश में सूक्ष्म अंतर किया ताकि यह न लगे कि मैं अन्य वक्ताओं के खिलाफ हूं.'

हालांकि, बैठक में भाग लेने वाले लोगों ने कैच से कहा कि इस बैठक में अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति हावी रही है. कोई भी नेता यह नहीं चाहता था कि किसी भी सम्भावित बदलाव और राजनीतिक नतीजों का आरोप उस पर लगे.

बैठक में भाग लेने वाले एक एक्टिविस्ट ने कहा कि हुर्रियत को पिछले चार महीनों से हमसे बात करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. नेता सभी निर्णय खुद ही लेते हैं और अपनी इच्छानुसार कार्यक्रम तय कर देते हैं. जब हालात दुरूह होते जा रहे हैं, तब वे हमें क्यों बुला रहे हैं. उन्होंने पीछे से फायर करने की अपनी रणनीति की शुरुआत कर दी है.

ऐसे में हममें से अधिकांश लोगों ने अपनी गेंद उनके पाले में फिर से डाल दी है. रणनीति में किसी भी तरह के बदलाव का निर्णय उनका खुद का होना चाहिए न कि हमारा. ताकि अगर कल अगर कुछ गलत हो जाए तो उसका आरोप वे हम पर न लगाएं.

First published: 10 November 2016, 8:31 IST
 
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