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देश के सबसे पुराने शरणार्थियों को केंद्र से 2 हज़ार करोड़ का पैकेज, मगर नागरिकता नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:38 IST
(तौसीफ़ मुस्तफ़ा/एएफ़पी)

30 नवंबर को केंद्र सरकार ने पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर आए शरणार्थियों के लिए 2000 करोड़ रुपए का पैकेज मंज़ूर किया. मगर लंबे समय से चल रही उनकी विवादास्पद मांग को नहीं माना. शरणार्थियों की मांग है कि उन्हें राज्य के स्थाई निवासी होने का दर्जा दिया जाए. केंद्र ने उनकी मांग को इसलिए नहीं माना क्योंकि ये यहां विभाजन और बाद के भारत-पाक युद्ध के दौरान आए थे.

एक सरकारी बयान के मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की ओर से 2000 करोड़ रुपए की सहयोग राशि जम्मू-कश्मीर और छंब में पाकिस्तान के 36,384 विस्थापित परिवारों के वन टाइम सेटलमेंट के लिए मंज़ूर किए हैं. इससे पहले पीएम ने नवंबर 2015 में जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए पैकेज की घोषणा की थी.’

मदद या लीपापोती?

यह राशि 80,000 करोड़ रुपए के पैकेज का हिस्सा है, जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2015 में श्रीनगर में घोषणा की थी. हालांकि एक परिवार के लिए 5.5 लाख रुपए की सहयोग राशि भी बहुत कम है क्योंकि संसदीय समिति ने 30 लाख रुपए देने की सिफारिश की थी. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और राज्य के पूर्व राजस्व मंत्री रमन भल्ला ने सहयोग राशि में कटौती को शरणार्थी समुदाय के साथ धोखा बताया है. 

भल्ला ने कहा, ‘वन टाइम सेटलमेंट के लिए प्रति परिवार 25 लाख रुपए के पैकेज के हिसाब से 9000 करोड़ रुपए से ज्यादा होते हैं. इसके साथ ही नेशनल कांफ्रेस की पूर्व सरकार ने केंद्र से कई अन्य रियायतों की सिफारिश की थी. पर भाजपा ने शरणार्थियों के लिए उग्र बयानबाजी के दबाव में महज 2000 करोड़ दिए हैं.’

नागरिकता के विरोधी एनसी-पीडीपी

सहयोग राशि के इस राजनीतिकरण से राज्य में पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी कम चिंतित हैं. वे अपनी प्रस्तावित नागरिकता को लेकर हो रही राजनीति से ज्यादा फिक्रमंद हैं. जहां संघ परिवार उन्हें पूर्ण नागरिकता देना चाहता है, कश्मीर घाटी की अन्य राजनीतिक पार्टियों और अलगाववादियों में इसे लेकर मतभेद हैं. 

सत्तासीन पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस इसके सख्त विरोध में हैं. उसका कहना है कि धारा 370 के हिसाब से जम्मू-कश्मीर में बाहरी शख्स को नागरिकता नहीं दी जा सकती. दूसरी ओर अलगाववादी इसके पीछे राज्य की जनसांख्यिकी को बदलने और मुसलमानों की बहुलता को कमजोर करने की नीयत बता रहे हैं. 

इसीलिए जब 2015 में संयुक्त संसदीय समिति ने इन शरणार्थियों को राज्य की नागरिकता और मत देने के अधिकार की सिफारिश की, जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बवाल मच गया. पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस केंद्र के ‘एकतरफा कदम’ के विरोध में एक हो गए. अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी, मीरवाइज़ उमर फारूक और यासीन मलिक ने आंदोलन की चेतावनी दी. निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद भी यही कह रहे थे. 

संवैधानिक मजबूरी

बाद की राज्य सरकारों का भी तर्क था कि वे उन्हें नागरिकता का अधिकार नहीं दे पाएंगे क्योंकि संविधान से बंधे हुए हैं. जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 6 में 1927 और 1932 में महाराजा हरि सिंह द्वारा जारी राज्य से संबंधित सूचनाओं में पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थियों को स्थाई निवासियों की कैटेगरी में शामिल नहीं किया गया है. भारतीय संविधान की धारा 370 भी इन्हीं प्रावधानों को पुष्ट करती है और उन सबको नागरिकता देने से इनकार करती है, जो यहां के स्थाई निवासी नहीं हैं. जाहिर है इसका मकसद राज्य के जनसांख्यिकी चरित्र को बचाना है.

कितनी है आबादी?

2007 में राज्य सरकार द्वारा गठित जीडी वाधवा समिति ने शरणार्थियों की गिनती करवाई. उनकी रिपोर्ट थी कि 1947 में राज्य में 5,764 शरणार्थी परिवार आए थे, जिनकी कुल संख्या 47,215 थी. पर समिति ने वर्तमान जनसंख्या का आकलन नहीं करवाया. पश्चिम पाकिस्तान रेफ्यूजी एक्शन कमेटी के 2012 के एक अध्ययन का दावा है कि परिवार की संख्या अब बढक़र 18,428 हो गई है और कुल जनसंख्या करीब 1.5 लाख है.

इतिहास और राजनीति

यह बात शायद अजीब लगे, पर सच है कि 1947 से ही जम्मू-कश्मीर में तीन तरह के शरणार्थी आते रहे हैं. पहले वे, जो अगस्त 1947 में विभाजन के दौरान भारत आए. वे पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी हैं. दूसरे वे, जो पाक अधिकृत कश्मीर के शरणार्थी हैं. ये अक्टूबर 1947 में आए, जब पाकिस्तान के सहयोग से कबायलियों ने कश्मीर पर आक्रमण किया था. तीसरे ग्रुप में वे हैं, जिनसे भारत-पाक युद्ध के दौरान 1965 और 1971 में छंब क्षेत्र के गांव खाली करवा दिए गए थे.

हालांकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें नागरिकता का अधिकार देने के लिए एकदम स्पष्ट अंतर रखा है. जो पाक अधिकृत कश्मीर से आए, उन्हें पूर्ण नागरिकता के साथ राज्य में बसने के अधिकार दिए गए, जबकि यही अधिकार पकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को देने से इनकार कर दिया गया. नतीजतन उन्हें भारत की नागरिकता और लोकसभा चुनावों में मत देने का अधिकार तो है, पर जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं, इसलिए ये विधानसभा चुनावों में वोट नहीं दे सकते. 

पिछले कुछ सालों में यह मुद्दा और जटिल हुआ है और राज्य में मतभिन्नता की राजनीति में उलझ कर रह गया है. राज्य सरकार का तर्क है कि धारा 370 के प्रावधान के अनुसार जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में खास दर्जा दिया गया है, इसलिए यह उसे नागरिकता का अधिकार नहीं दे सकता, जो राज्य का स्थाई निवासी नहीं है, और इसमें पाकिस्तान और भारत में बाकी और जगह से आने वाले दोनों तरह के लोग शामिल हैं.

मगर धारा 370 को ही आधार बनाना उचित नहीं है. जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों की समस्या को समझने के लिए उस संदर्भ को समझना जरूरी है, जब ये 1947 और बाद के सालों में आए थे. पाकिस्तान के सांप्रदायिक झगड़ों से हिंदू भारत और जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से में आए. और जम्मू में इसी तरह की हिंसा से मुसलमान पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर जाने को मजबूर हुए.

और अब इस तरह के शरणार्थियों से यहां की जनसांख्यिकी राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील मुद्दा बन गई है. राज्य की मुसलमान बहुल जनसंख्या को डर है कि पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने से राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में जनसांख्यिकी संतुलन बदल जाएगा. अगर कोई राज्य ऐसा फैसला लेता है, तो यह किसी भी राज्य सरकार के लिए खतरनाक स्थिति हो सकती है.

दूसरी ओर अल्पसंख्यक समुदाय जम्मू और कश्मीर के पुनर्वास अधिनियम का जोरदार विरोध कर रहे हैं. यह अधिनियम विभाजन के दंगों के बाद पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर पलायन करने वाले लोगों को राज्य में वापस लौटने का अधिकार देता है. उनमें कश्मीर घाटी के दूसरी ओर से जाने वाले सैकड़ों परिवार हैं. 

First published: 4 December 2016, 8:10 IST
 
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