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जम्मू-कश्मीर की आतंकरोधी नीति: स्थानीय चरमपंथियों पर नरम, विदेशियों पर निर्मम

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 January 2017, 12:46 IST
(फ़ाइल फोटो )

कश्मीर घाटी में अशांति के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने नई आतंकरोधी रणनीति अपनाई है. इस रणनीति के तहत सुरक्षाबल स्थानीय चरमपंथियों की पहचान कर रहे हैं. दूसरी तरफ विदेशी आतंकी हैं जिन्हें सर्च अभियान में चिन्हित करके बिना किसी मुरौव्वत के सफाया करने की रणनीति है.

सुरक्षा एजेंसियां सतर्कता के साथ स्थानीय चरमपंथियों को बातचीत और काउंसलिंग के जरिए हथियार छोड़ने के लिए समझाएंगी. स्थानीय चरमपंथियों को समझाने-बुझाने में वह उनसे सीधे तौर पर भी सम्पर्क साधेंगी और उनके परिवारों के जरिए भी उन तक पहुंच बनाएंगी. राज्य सरकार का मकसद है कि सुरक्षा बल स्थानीय चरमपंथियों को समझा-बुझाकर आत्मसमर्पण के लिए तैयार करें और उन्हें मुख्यधारा में शामिल होने के लिए राजी करें.

इस रणनीति के तहत अब तक छह स्थानीय चरमपंथियों से हथियार डलवाए जा चुके हैं जिन्होंने हाल की अशांति के दौरान अपने हाथों में हथियार उठा लिए थे. मुठभेड़ के दौरान उनसे हथियार डलवाने में उनके परिजनों की भी मदद ली गई. 

इसी क्रम में तुज्जर शरीफ, सोपोर का रहने वाला 23 वर्षीय उमर मीर है जिसने अपने पिता अब्दुल खालिक मीर की सलाह मानकर आत्मसमर्पण करने का फैसला लिया. जिस घर में उमर छिपा था, सुरक्षाबलों ने उस घर की घेरेबंदी की गई. उमर को समझाने के लिए उसके पिता अब्दुल खालिक को बुलाया गया.

खालिक घर के अंदर गए और उसे हथियार छोड़ देने के लिए तैयार किया. थोड़ी देर बाद पिता-पुत्र दोनों घर के बाहर आए. उमर की आंखों में आंसू थे. इसके बाद पुलिस ने उमर को अपनी हिरासत में ले लिया. इन छह नौजवानों में से तीन उत्तरी और तीन दक्षिणी कश्मीर के हैं.

महबूबा का मरहम

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हाल में दिए गए अपने भाषण में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि उन्होंने अपनी पिछली एकीकृत कमान की बैठक में सुरक्षा बलों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे स्थानीय चरमपंथी युवाओं को आत्मसमर्पण करवाने को प्राथमिकता दें और ऐसा माहौल तैयार करें जिससे उनके मुख्यधारा में लौटने की संभावनाएं बढ़ें. मुख्यमंत्री ने विधानसभा में यह भी कहा था कि उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को इस मकसद के लिए जरूरी सभी उपाय करने की छूट दी है.

इसके पहले घाटी में अशांति के माहौल पर चिंता और संवेदना जताते हुए मुख्यमंत्री ने जम्मू-कश्मीर पुलिस से कहा था कि सभी स्थानीय चरमपंथियों को राजनीतिक की मुख्यधारा में लौटाने की दिशा में काम करें और यह सुनिश्चित करें कि वे अपने हाथों में 'बैट और बॉल' पकड़ें. उन्होंने इसे तर्कसंगत बनाते हुए कहा था कि मुठभेड़ों में स्थानीय आतंकियों को खत्म करने की बजाय पुलिस उनकी घर वापसी की कोशिश करे. 

पुलिस स्मृति दिवस पर उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि हमारे नौजवानों का हाथ थामने की जरूरत है जिन्होंने हथियार उठा लिए हैं, वे अपने घरों से लापता हैं. मैं पुलिस से अनुरोध करती हूं कि वह उन्हें वापस उनके घर लाने की कोशिश करें.  मुठभेड़ों में उन्हें मारे जाने की बजाय, अगर उन्हें वापस लाना संभव हो तो, उन्हें मुख्यधारा का हिस्सा बनाएं, उन्हें बल्ले, गेंद दें और उन्हें बंदूकों की बजाय अच्छी शिक्षा मुहैया कराएं. हमें इसके लिए हर तरह के सभी प्रयास करने चाहिए.

सरेंडर पर ज़ोर

यही बात पुलिस महानिदेशक एसपी वैद ने भी कही. उन्होंने एक स्थानीय दैनिक को दिए साक्षात्कार में कहा था कि मुठभेड़ों के दौरान पुलिस के लिए 'पहली मंशा' चरमपंथियों के आत्मसमर्पण कराने की होनी चाहिए और वह उन्हें शांतिपूर्ण जीवन जीने का भरोसा दे. उन्होंने यह भी कहा था कि सभी 10 जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को इस बारे में दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि वे मुठभेड़ से पहले लाउडस्पीकर पर आतंकियों से आत्मसमर्पण करने के लिए कहें. 

वैद ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस अपने ही बच्चों को मुठभेड़ में मार गिराना नहीं चाहती क्योंकि कश्मीर में पहले से ही बहुत खून बह चुका है. यह वह समय है जब उन्हें शांति से रहने का मौका दें. उन्होंने कहा कि हमने उन स्थानीय युवकों के परिजनों तक पहुंच बनानी शुरू कर दी है जिन्होंने हाल में अपने हाथों में बंदूकें उठा ली हैं. हमारी कोशिश उन्हें अपनी राह पर लाने की है ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अशांति के पहले घाटी में 179 आतंकी सक्रिय थे. अब इनकी संख्या 275 और 300 के बीच हो गई है. विधान सभा में विधायक मुबारक गुल के एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए मुख्यमंत्री महबूबा ने खुलासा किया था कि गत 8 जुलाई को आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से 59 युवक आतंकी संगठनों में शामिल हो गए हैं. जिन दो बड़े संगठनों में वे शामिल हुए हैं, उनमें हिजबुल मुजाहिद्दीन और पाकिस्तान का लश्करे-तैयबा है. लश्करे-तैयबा स्थनीय युवकों को अपने गुट में भर्ती कर रहा है.

फिर आया वीडियो

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें स्थानीय चरमपंथिययों का एक समूह एक घर में एक अज्ञात कमांडर से मुखातिब है. माना जा रहा है कि यह घर दक्षिण कश्मीर का कोई घर हो सकता है. इसके पहले एक अन्य वीडियो वायरल हुआ था जिसमें दोनों गुटों का एक समूह बर्फ की सफेद चादरों का मजा ले रहा है. इस तरह के वीडियो चरमपंथ की ओर उन्मुख होने के लिए स्थानीय युवकों को आकर्षित करते हैं. और यह सोशल मीडिया के उस प्रोपेगंडा का उपज है जिसकी शुरुआत आतंक को ग्लेमारइज करने के लिए बुरहान वानी ने की थी.

अशांति के पहले घाटी में 179 आतंकी सक्रिय थे, खुफिया सूत्रों के अनुसार अब इनकी संख्या 275 से 300 हो गई है

बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से कश्मीर में उग्रवाद कितना बढ़ा, आतंकवाद की ओर कितने युवा फिसले, अभी तक वास्तविक संख्या सामने नहीं आ सकी है. बुरहान के मारे जाने के बाद से जो आतंक बढ़ा, पत्थर फेंके जाने की घटनाएं हुईं, उसे रोकने के लिए सरकारी आंकड़ों के अनुसार उसमें 96 लोग मारे गए, पैलेट गन से सैकड़ों लोगों की आंखों की रोशनी चली गई और 14,000 से अधिक घायल हुए हैं.

हालांकि सरकार अब बुरहान की मौत पर पछतावा करती दिखती है. नेताओं ने उसकी हत्या से दूरी बनाए रखने को कोशिशें की हैं. यहां तक कि मुख्यमंत्री ने मीडिया से खुद कहा है कि यदि सुरक्षा बलों को पता होता कि बुरहान घर में है तो वे गोली नहीं चलाते.

हालांकि, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि पुलिस को इस अधार पर दोषी ठहराने की नीति ठीक नहीं है. इस पुलिस अधिकारी का कहना है कि ज्यादातर स्थानीय चरमपंथी आत्मसमर्पण करने से इनकार कर देते हैं और कई बार तो उन्होंने अपने माता-पिताओं की अपील को भी नकार दिया है. पुलिस अधिकारी ने कहा कि चरमपंथी जब हम पर खुली फायरिंग करते हैं, तब हमारे पास उसी भाषा में जवाब देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.

उन्होंने कहा कि स्थानीय चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के बीच परिवार 'बहुत ही नाजुक लिंक' है. आतंकियों के छिपे होने के ठिकानों तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है. उन्होंने कहा कि यह बहुत ही खतरनाक काम है. और इससे जो नतीजे निकलते हैं, उसमें अनिश्चितता काफी रहती है.

First published: 17 January 2017, 12:46 IST
 
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