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जानिए इंजीनियरिंग में फेल होने के बाद मूसा कैसे बना आतंकी

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 May 2017, 9:52 IST
Zakir Musa

जाकिर राशिद उर्फ कमांडर मूसा कश्मीर घाटी में आतंक का सबसे खतरनाक चेहरा है जिसने शनिवार को घाटी के अलगाववादियों और आतंकी नेतृत्व से अलग होने का एलान कर दिया.

कमांडर मूसा एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का है और उसकी उम्र महज 23 साल है. आतंक का हाथ थामने से पहले उसने चंडीगढ़ के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी, लेकिन इंजीनियरिंग की परीक्षा में वह फेल हो गया था. 

बुरहान का उत्तराधिकारी मूसा

पुलिस के मुताबिक, कश्मीर में उग्रवादियों को स्थानीय लोगों के बीच बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. हिजबुल कमांडर बुरहान वानी को बहुत पढ़ा-लिखा बताकर पेश किया जाता था, जबकि वह स्कूल ड्रॉप-आउट था.

बुरहान की तरह उसका उत्तराधिकारी मूसा भी ड्रॉप-आउट था. उसने चंडीगढ़ के रामदेव जिंदल कॉलेज में बीटेक में एडमिशन लिया था, लेकिन 2013 के बीटेक एग्जाम्स में वह फेल हो गया था. 

मूसा का असली नाम जाकिर राशिद

जाकिर राशिद का जन्म 25 जुलाई 1994 को अवन्तिपुर के नूरपुर में अब्दुल राशिद भट्ट के घर में हुआ था. मूसा के पिता सिंचाई विभाग में सरकारी कर्मचारी हैं.

मूसा के भाई-बहन पढ़ने में काफी तेज हैं और अपनी लाइफ में अच्छा कर रहे हैं. मूसा का भाई शकीर श्रीनगर में डॉक्टर है, जबकि उसकी बहन जम्मू-कश्मीर बैंक में कार्यरत है.

मूसा को पुलवामा में जवाहर नवोदय विद्यालय में एडमिशन मिल गया था, लेकिन उसने अपने गांव के नूर पब्लिक स्कूल में ही पढ़ाई जारी रखी और 10वीं परीक्षा में 65.4 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. उसके बाद मूसा ने उच्चतर माध्यमिक स्कूल में प्रवेश लिया और 12वीं की परीक्षा 64.8 प्रतिशत अंकों के साथ पास की. 

2013 में हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल

कॉलेज छोड़ने के बाद मूसा ने 2013 में प्रतिबंधित हिजबुल मुजाहिदीन आतंकी संगठन को ज्वाइन कर लिया. बुरहान वानी और इदरीस को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराए जाने के बाद मूसा को कमांडर बना दिया गया. ग्रेनेड हमले और हत्याओं के कई मामले मूसा के खिलाफ दर्ज हैं.

पुलिस ने बताया कि शनिवार को मूसा के संगठन छोड़ने के एलान से पता चलता है कि उसे और उसके समूह को हिजबुल मुजाहिदीन की मदद की जरूरत नहीं थी, वे सुरक्षा बलों से हथियार चुरा रहे थे और बैंकों से पैसा लूट रहे थे, वह खुद अपना संगठन चला सकते हैं.

पिछले साल बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद जाकिर मूसा को हिजबुल का कमांडर बनाया गया था.

मूसा का वीडियो

शुक्रवार दोपहर को जारी पांच मिनट के वीडियो में जाकिर मूसा ने कहा कि उसके संघर्ष का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ इस्लाम का गौरव और शरीया का क्रियान्वयन है. उसने चेतावनी दी है कि उग्रवादी इस लक्ष्य से विचलन कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे.

मूसा ने इस वीडियो में कहा है, "मैं इन लोगों (हुर्रियत नेताओं) को चेतावनी देता हूं कि अगर वे हमारे मार्ग में कांटा बनने की कोशिश करते हैं, तो पहला काम हम जो करेंगे वो यह कि उनको सूली पर टांग देंगे. हम काफिरों से संघर्ष करना छोड़कर सबसे पहले उन्हें टांग देंगे. हम उन्हें चेतावनी देते हैं कि वे अपनी राजनीति खेलना बंद करें."

वीडियो में मूसा ने कहा, "हुर्रियत के लोग हमारे नेता नहीं हो सकते. अगर उन्हें अपनी राजनीति करनी है तो वे हमारे मार्ग में और शरीया के क्रियान्वयन में कांटा बनना बंद करें. अन्यथा हम आपका सिर कलम कर देंगे और आपको लाल चौक पर टांग देंगे."

इस धमकी का महत्व

कश्मीर में 30 साल से चल रहे चरमपंथ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सबसे बड़े स्वदेशी उग्रवादी संगठन के टॉप कमांडर ने हुर्रियत के खिलाफ ही बगावत कर दी और उनको सीधे-सीधे एक वैचारिक टकराव के मुद्दे पर ही जान से मारने की धमकी दी है.

कश्मीर में संघर्ष की आत्मा को बदलने वाली एक शाही जंग आकार लेती दिख रही है. क्या इसे सिर्फ कश्मीरियों के राजनीतिक अधिकारों के लिए चलने वाला आंदोलन बना रहना चाहिए, जैसा कि हुर्रियत चाहती है अथवा इसे खलीफा की स्थापना के लिए एक व्यापक इस्लामिक आंदोलन का हिस्सा बन जाना चाहिए.

बुरहान वानी के उत्तराधिकारी मूसा ने बयान से किनारा करने पर हिजबुल से नाता तोड़ लिया है.

'हमारी जंग इस्लाम के लिए'

इस वीडियो में चेहरा ढके हुए यह कमांडर जनसमूह को संबोधित करते हुए कहता है, "हमारी लड़ाई किसी संगठन या देश के लिए नहीं है, बल्कि इस्लाम के लिए है. कल हमें इंडिया भी जाना होगा और वहां इस्लामिक प्रणाली को कायम करना होगा. पाकिस्तान में भी कोई इस्लामिक प्रणाली नहीं है, इसलिए हमें वहां भी इस्लामिक प्रणाली कायम करना होगी."

वीडियो में नकाबपोश कमांडर यह भी कहता है कि उग्रवादियों के अंतिम संस्कार के दौरान पाकिस्तानी झंडे नहीं फहराये जाएं और लोगों पर इस बात के लिए दबाव डाला गया है कि वे तालिबान के समर्थन में नारे लगाएं. पाकिस्तान स्थित यूनाइटेड जिहादी काउंसिल, सैयद सलाउद्दीन के नेतृत्व में हिजबुल मुजाहिदीन जिसका एक प्रमुख भाग है, ने तुरंत इस अपील को खारिज कर दिया. 

शरीया लागू करने की अपील

यूजीसी के प्रवक्ता सैयद सदाकत हुसैन ने एक वक्तव्य में कहा, "'पाकिस्तानी राष्ट्र और झंडे का विरोध करके और नसीर की कब्र पर मुजाहिदीन का स्वांग रचकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का समर्थन करने वाले इस हथियारबंद समूह ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं."

प्रवक्ता ने आगे कहा कि ये हथियारबंद लोग उग्रवादियों और लोगों के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि इसके बाद वायरल हुए वीडियो में मूसा ने शरीया लागू करने का आह्वान किया था, लोगों ने करीमाबाद के नकाबपोश कमांडर और मूसा के बीच में मनमाना संबंध जोड़ लिया.

क्या यह बगावत है?

मूसा ने इस वीडियो में कहा है, "अगर कश्मीर एक राजनीतिक संघर्ष है तो फिर आप क्यों इस लड़ाई में मस्जिदों का इस्तेमाल कर रहे हैं? आप मस्जिद के मंच पर खड़े होकर अपनी राजनीति कर रहे हैं. आप सड़क पर धरना क्यों नहीं देते हैं? अगर यह इस्लामिक संघर्ष नहीं है, तो आप क्यों इस्लाम के मुजाहिदीन को अपने लोग बताते हैं? आप उनके अंतिम संस्कार में क्यों आते हैं? अपनी यह राजनीति बंद करो."

सैयद सलाउद्दीन इस समय कश्मीर में सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन का चीफ है.

मूसा ने हिजबुल से नाता तोड़ा

इस बीच अलगाववादी नेताओं का सिर काटकर लाल चौक पर लटकाने की धमकी देने वाले जाकिर मूसा के नए ऑडियो संदेश के बाद कश्मीर में आतंकी संगठन दो फाड़ हो गए हैं. हिजबुल मुजाहिदीन ने जहां जाकिर मूसा के बयान से किनारा कर लिया है, वहीं मूसा ने भी संगठन से नाता तोड़ते हुए कहा कि अगर हिजबुल मेरी नुमाइंदगी नहीं करती, तो मैं भी उसका हिस्सा नहीं हूं.

कश्मीर के दो अन्य संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन और तालिबान-ए-कश्मीर मूसा के समर्थन में उतर आए हैं. दोनों संगठनों ने मूसा को सही ठहराते हुए हर प्रकार के समर्थन का भी यकीन दिलाया है.

हिजबुल के शीर्ष नेतृत्व व हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत वरिष्ठ अलगाववादी नेताओं के साथ जाकिर मूसा के मतभेद करीब दो महीने पहले शुरू हुए थे, जब उसने एक वीडियो संदेश में सुरक्षाबलों पर पथराव करने वालों का आभार जताते हुए कहा था कि वह जब भी पत्थर उठाएं, आजादी के नाम पर नहीं इस्लाम के नाम पर ही उठाएं.

First published: 14 May 2017, 15:15 IST
 
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